शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

गंगा अवतरण

        कभी चमकी फिर हुई लुप्त,
स्मृति पटल से वह गाथा । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [1] कारुण्य

बीत  गए  कई  युग ,
लौ  रही  अब   थरथरा |
डूबी  आकंठ  निराशा  में  ,
  आत्मा  थामे  तृण  आसरा  |

पीढ़ियाँ  आये  गुजर  जाये ,
हर  यत्न  हो  चला  भोथरा  |
बूंद  को  तरसे भगीरथ ,
कब  लाओगे  तुम  जल  धारा ?

आती  जाती  पवन  कह  रही  ,
  तप हो गया तुम्हारा  सफल  |
यूँ  तो  कट  गए  वर्ष  कोटि -कोटि ,
भारी  हो  गया  एक  पल  |

मुक्ति  द्वार  अब  भी  अवरुद्ध ,
  आत्मा  हो  चली  विकल |
अब  विलम्ब  क्यों   हे  प्रौपुत्र  ,
ले  आओ  अंजुरी  भर  जल  |

आशा किरण कभी थिरकती ,
कभी नैराश्य मेघ छा  जाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [2]  अनिश्चितता 

धधक रही ज्वाला ह्रदय में,
पुरखों की हो कैसे मुक्ति ।
चले हिमालय  त्याग  राजसुख,
घोर तपस्या ही थी  युक्ति ।

पत्ते, भस्म, जल , पवन,
सूर्य किरणे - यही था खान  ।
वर्ष सहस्त्र घोर तप  नंतर ,
प्राप्त हुआ ब्रम्ह वरदान ।

अमृत जल राशि से पूर्ण,
गंगा जब हो अवतरित ।
नर्क से मुक्ति सहज मिले,
पुरखे हो तब पाप रहित ।

पर गंगा ठहरी स्वर्ग नदी ,
मृत्यु लोक से क्या प्रयोजन ?
करें  कैसे  प्रोत्साहित चंचला को,
सृष्टि निर्माता यही करें चिंतन ।

अठखेलियां करे चपला से,
नव नृत्य हो अप्सराओं संग ।
विसरित स्मृति  की,
स्वर्गिक आमोद के विविध रंग |

अक्षरशः उतरी आशंका,
रोष, कोप, पुरजोर प्रतिरोध ।
अंतिम शस्त्र  परिजन स्मृति
मानो शांत हुआ तब क्रोध ।

गंगा मनुहार हुआ सफल,
हटी बाधा , पर मार्ग नहीं प्रशस्त ।
हुई  अनावृत्त  बड़ी चुनौती,
सिहर उठा ब्रह्माण्ड समस्त |

गंगा वेग पर कौन संभाले,
संकेत मात्र करें सृष्टि निर्माता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

        [3] आक्रांत 

किसके रोके रुका समय,
शीतल रात्रि या धूप कड़ी  ।
गिरते पड़ते चलते रुकते ,
आ ही गयी विपद घडी |

चारण , सिद्ध देवगण, ऋषि
अस्पष्ट शब्द, अव्यवस्थित आवृति,  ,
कांपे  चरण  अष्ट  दिग्पालों  के ,
ओंठों   पर थी वही स्तुति  |

कार्तिक , बाल  गणपति थामे  आँचल ,
  पूछे  माँ  गौरी  से पल  पल ,
  क्लिष्ट  है उत्तर , बाल सुलभ  प्रश्न सरल ,
  क्या  धरा  चली  आज  रसातल   ?

प्रचंड  प्रलय  पवन  सम  प्रश्न ,
  होता  प्रतिध्वनित  पग  पग ,
सुर  असुर यक्ष ,गण , बलिष्ठ  नाग ,
  गन्धर्व  वानर , मानव   खग  मृग |

पखारती  चरण लक्ष्मी उद्धिग्न,
हुआ प्रश्न मुखरित अनायास,
  करती व्यक्त वही आशंका,
  उत्तर पाने का विफल  प्रयास |

विश्राम मुद्रा में  लीन जगदीश
काश - लेती पढ़ वह मन्दहास |
सरल प्रश्न , तो सहज ही उत्तर ,
आस न निराश, गूढ़ न उपहास |

हो प्रलय आसन्न तब  ,
नाम एक ही मुख  पर आता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [3] अभ्युदय 
किया  सहज  ही  गरल  पान ,
  जिसने तब  तारी  थी  सृष्टि , ,
सहेज  पाएंगे क्या  अमृत  प्रवाह ,
उन  पर है आज  सर्व  दृष्टि  |

होता  दीप्तमान  कैलाश  शिखर ,
प्रदीप्त  हो  जाता  मान  सरोवर ,
जटा   जूट  भी  स्वर्णमय  होता ,
सुशोभित  करता  जो  शिव  शंकर |

पर रश्मिरथी रवि कहाँ
हो  चला रहस्मयी ढंग से  लोप,
अपरान्ह की उस कठिन  बेला
  में छाया तिलस्मयी  घटाटोप |

मेघ आवरण से आच्छादित आकाश,
करें पृथक भुवन से भूतल |,
पृथ्वी  रक्षा  का बाल  प्रयास,
  पर हुई अगोचर अंतरिक्ष हलचल |

नंदी  और मरुद्गण संग ,
लिए हाथ त्रिशूल और दंड,
प्रतीक्षारत  शम्भू  निहारे ,
मेघाच्छादित  आकाश  खंड |

प्रति  क्षण तीव्र  कर्कश ध्वनि,
मानो शिलाएँ होती चूर ।
अगले क्षण क्षीण हो जाती ।
मानो अश्व दल जाए दूर |

आशाओं  के केंद्र बिंदु पर,
बने कैलाशपति भाग्य विधाता,
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [4] पराकाष्ठा

नीरवता सर्वत्र विराजित ,
जमी  वायु है  शांत गगन,
न  हलचल  , न  कोई  ध्वनि ,
क्या चंचल गंगा का लड़कपन ?

प्रतीक्षारत पथराई आँखें,
उहापोह और तर्क वितर्क
कहाँ  हो  बेटी  गंगा  ?
शंकर  करें  मानसिक  संपर्क |

वेग  सहेजो बेटी  गंगा  ,
क्षुब्ध  शम्भो की हुंकार क्रुद्ध,
मृत्यु लोक यह ,देवलोक  नहीं ,
  बसते यहाँ मानव क्षुद्र |

लघु जीवन ,त्रुटि  की  मूर्तियां ,
निर्बल मन  पाप  संलिप्त ,
पुरखों  को  दें  तर्पण  ,
आशा है उनकी संक्षिप्त |

स्नान  करें  तेरे  जल  से
  हो  पाप  मुक्त अनायास  ,
कृषक सींचें  खेत  धारा से ,
बुझाएं वनचर अपनी प्यास  |

हो तू  सुगम  यातायात साधन ,
पाएं जलचर तुझमें निवास |
माँ  की ममता पाकर तुझसे ,
करें समृद्धि  और विकास |

हो  कल्याण  तेरा गंगे ,
हो जीवन  दायिनी  पतित  पावन | .
मृत्युलोक  की मरुभूमि  में,
कर दे तू नव जीवन  सृजन |

आशा दीप  कर दे प्रज्ज्वलित, 
शिव विमर्श गगन गुंजाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता ।
        *******************

अकस्मात् गिरी उल्काएं,
गुंजायमान  तड़ित अगणित ।
तिरस्कारिणी, इतराती ,
गंगा वाणी हुई  प्रतिध्वनित ।

प्रकृति से बंधी हूँ मैं,
क्षमा करें मुझको त्रिपुरारी
नियम बंधन के सृजनकर्ता ,
विपरीत अनुदेश क्यों अपरम्पारी ?

न कोई आरोह अवरोह स्वर्ग में ,
  न कोई पापी संसारी ।
न कृषक करें मार्ग अवरुद्ध ,
न प्यासे  वनचारी जलचारी ।

हूँ  उन्मुक्त  स्वच्छंद  अबला,
प्रकृति  नियम  से  बेबस नारी ।
युगों  से  विलग  मैं परिजन  से ,
विरह  अग्नि समझें हे त्रिपुरारी |

उच्छृंखलता मेरी क्षमा करें प्रभो
इन लहरों पर कैसा बंधन |
हो सके सम्भालो  वेग मेरा,
प्रतीक्षारत हैं मेरे स्वजन |

हुआ  कोलाहल क्रमशः  तीव्र
छोड़ा गगन पथ , चली  द्रुत गति । ,
ज्यों  ज्यों  आवर्धित  प्रचंड  शब्द  ,
  त्यों त्यों प्रखर  हुई  स्तुति |

तुषारापात गंगा का यह ,
शिव शक्ति का उपहास उड़ाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [5] संघर्ष

मेघाच्छादित सा  निस्तब्ध नभ ,
ध्वनि दिलाये अस्पष्ट आभास ।
शम्भू करें स्थिति संवरण,
क्षीण त्रुटि हो भीषण विनाश ।

हुआ प्रचंड घोर शब्द ,
तब देखा जगत ने अकस्मात् ।
प्रकट हुआ मेघ मध्य ,
भीषण श्वेत प्रलय  सा प्रपात |

नारी  का  अभिमान था वह,
या चिर  विरह की पीड़ा ।
देव  नदी  का  प्रबल  आवेग ,
या  थी  उच्छृंखल  क्रीड़ा  |

छोड़  चली  गंगा  देवलोक ,
श्वेत   शक्ति  पुंज  सी  जलधार  |
त्वरित  गति , अथाह  जल ,
त्रिभुवन  कर  उठा  हाहाकार  |

स्तुति शब्द मध्य अमृत 
जल मृत्यु राग सुनाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 
        *************

आँखें  मीचे  होड़  लगाए ,
लहरें  शिखर  पर  उतर  पड़े ,
सतह  स्पर्श  होते  ही दर्प  से
चूर, मोती जैसे बिखर पड़े  |

  था नहीं  वह  कठोर  धरातल ,
मखमली  बिछौने  सा  सौम्य  |
तीव्र जल राशि दबाव के सम्मुख,
श्याम सघन वन हो चला नम्य ।

  शक्ति विकट लहरों पर लहरें,
तलहीन  कुण्ड में जाए धंसती ।
श्याम रज्जु के जाल में
,निमिष मात्र में जाएँ  फंसती ।

अकस्मात् खो बैठी नियंत्रण,
मानो यंत्रवत कठपुतलियां
संचालक खींचे अब  डोर,
बंधी समस्त मुक्त अठखेलियाँ ।

मजबूत वृक्ष सघन वन,
हर धारा सहस्त्र धारा में विभक्त ।
गति मंद बल हुआ क्षीण,
विकराल लहरें हुईं अशक्त  ।

नीलकंठ का जटाजूट वह,
तिलस्म और रहस्य से पूर्ण ।
भूलभुलैया, अगणित कंदराएँ ,
विस्तृत निकास कहीं, कहीं संकीर्ण ।

कहीं आरोह, कहीं अवरोह ।
कहीं घुमाव, क्षणिक कहीं ठहराव |
भंवर पार कहीं लहरें मिलतीं,
पल भर में पुनः अलगाव ।

तलहीन  ताल हैं यत्र तंत्र ,
जिसमें सम्पूर्ण नीर समाता ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [6] समर्पण  
अंतहीन दुर्गम सुरंगमयी पथ ,
अतिकाय लहरों ने ठानी ।
स्वर्गिक   लहरें , ये  दुर्गति ,
करें  इतिश्री  यह  कहानी  |

बूँद बूँद में नयी स्फूर्ति,
संयोजा लहरों ने शेष बल ।
किया संकल्प बहा दें बाधाएं,
कर दें इस वन को समतल ।

लहरों ने थामा लहरों को,
बना संगठन हुआ विलय,
चट्टान भेदी प्रहार पर प्रहार,
जागृह हुआ प्रसुप्त प्रलय |

शालीन श्याम वृक्ष हुए नम्य ,
गहरी जमी रही , पर जड़ ।
अगले क्षण फिर खड़े हो गए,
पड़ी लहरों को उलटी थपड ।

होश खो बैठी लहरें,
हुआ संगठन पल में विघटित ।
करने लगे प्रहार अंधाधुंध,
दर्प  होने लगा कुछ खंडित |

जटाजूट जल द्वंद्व मध्य ,
शिव स्तुति जाप प्रभाव जमाता  ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो
गागर में सागर हे  ज्ञाता ।

समतल करने की कौन कहे ,
सरपट भागने का खोजें मार्ग  ।
वही  तिलस्म , और भूलभलैया,
मुंह से निकलने लगी अब झाग |

होने लगी लहरें अब पस्त
यत्न निष्फल , नैराश्य ह्रदय |
ओंठों पर आई वही स्तुति ,
समर्पण भाव का हुआ उदय |

ले लो मुझे छत्रछाया में ,
हुई प्रभु मैं शरणागत ।
करो मुक्त इस जंजाल से,,
रहूँ  सदा आपसे सहमत |

हुई परिवर्तित कातरता हर्ष में ,
शब्द वही पृथक भाव दर्शाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [6] प्रयाण

स्तुति से गुंजायमान व्योम,
पिछले पैरों पर नंदी खड़े।
यक्ष, देव ऋषि गन्धर्व,
करें स्तुति हाथ जोड़े ।

शंख ध्वनि , पुष्प वृष्टि चहुँ  ओर ।
स्वर्ग नदी अब हुई समर्पित ।
छोड़ी तब एक धार शम्भू ने,
किया उसे धरा को अर्पित |

स्वागत  स्वागतम्   सुस्वागतम ,
हे नन्ही बालिका सुस्वागतम,
तैयार खड़े श्वेत  अश्व , कांतिमय  स्वर्ण रथ,
मृत्यु लोक की अनजान डगर अनजान पथ,
मार्ग  प्रशस्त को तत्पर भगीरथ,
ऋषि मुनि राजा रंक  - सब हैं प्रतीक्षारत
हर वाद्य पर एक ही सरगम ।
स्वागत  स्वागतम्   सुस्वागतम |

पाँव थिरक थिरक जाये रे मितवा ।
मन मुदित भरमाये रे मितवा ।
तन पुलकित हर्षाये रे मितवा ।
लहर लहर जहाँ लहराए रे मितवा ।
नर नारी तहँ तहँ  गाये रे मितवा  ।
क्यारी फुलवारी मुस्काये रे मितवा |
अगणित दीप जगमगाये रे मितवा |

         [7]भरतवाक्य 
             साठ सहस्त्र सुत सगर के ,
             हुए दग्ध कपिल कोप दृष्टि से ।
     अस्थिर आत्माएं, अतृप्त पिपासा  ,
     न  हो शांत   किसी वृष्टि  से |


स्थित पाताल में भस्म अवशेष  ,
उद्विग्न हो उठे भगीरथ.|
स्वर्ग से धरती से पाताल ,
गंगा चलती रही अविरत ।

मृतप्राय पक्षी  समूह मरू भूमि में,
झुलसे पंख मूँदते नेत्र ।
जलती भूमि , धूल भरे बवंडर ,
सदियों से शापित शुष्क  क्षेत्र ।

पड़ी शीतल फुहार,  अकस्मात ,
  दृश्य सम्पूर्ण  परिवर्तित पल में ।
करे किल्लोल आल्हादित खग दल,
भस्म अवशेष समाहित जल में ।

नूतन पंख, परिपूर्ण उमंग ,
नील गगन का खुला आमंत्रण  ।
होते ओझल  देखें निर्निमेष  
भरी आँखें  खो  बैठी नियंत्रण |

छलके आंसू विलीन हुए,
निर्झर निर्मल  जल धार में ।
देते तर्पण भार मुक्त  भगीरथ,
लौट आये तिलस्मी संसार में |

कभी देखें मुड़ भगीरथ प्रयत्न,
अथाह मनोबल की गौरव गाथा ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता ।