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रविवार, 18 सितंबर 2022

'च' से चन्दन (भाग ३ )

मैं तो क्या, कोई भी चन्दन को पहचान सकता था | क्या मुश्किल थी इसमें ?  भीड़ हजारों की हो या लाखों की  -  चन्दन अलग ही नज़र आएगा | 

कुल टोटल इसी अदम्य विश्वास के साथ मैं दुर्ग स्टेशन गया था | चन्दन से आखिरी मुलाकात कोई अट्ठाइस वर्ष पूर्व हुई थी | मेरे हाथ में जो मोबाइल फोन था, वह स्मार्ट हरगिज नहीं था | फर्क क्या पड़ता है आखिर ? जब दिल दूसरे दिल को पुकारे तो 'लोकेशन' की जरुरत नहीं पड़ती | जब मस्तिष्क में बसी तस्वीर धुंधली नहीं होती, तो 'सेल्फी' का आदान प्रदान करने की भला आवश्यकता ही क्या थी ? अति आत्मविश्वास का एक और कारण था | अगर मैं चन्दन को नहीं ढूंढ़  पाता  तो चन्दन मुझे खोज ही लेता | कैसे ? अरे वैसे ही, जैसे दशकों पूर्व उसने भिलाई विद्यालय में किया था |

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 मैं तो था छठवीं के वर्ग 'ड' में और वह था वर्ग 'अ' में |  | बाकी सारे के  सारे शाला क्रमांक आठ के मित्रों का जमघट वर्ग 'स' में था | 

दाखिले में जल्दबाज़ी के कारण वह और लेट लतीफी के कारण मैं - एक ही सज़ा भुगत रहे थे | वर्ग  'ड'' में मैं खोज रहा था - कोई एक तो परिचित चेहरा दिख जाए | करीब करीब प्रत्येक छात्र का कोई न कोई प्राथमिक शाला का सहपाठी उस कक्षा में था | अजनबियों के इस समूह में मुझे कोई भी अपना नज़र  नहीं आ रहा था | पहले दिन प्रार्थना के बाद, कक्षा में घुसते ही लोग अपने अपने साथियों के साथ इंतज़ार कर रही खाली डेस्कों की ओर लपक पड़े | मुझे कुछ ऐसे स्वर सुनाई दे रहे थे ,"अबे, इसके साथ में बैठूंगा | तू उसके साथ बैठ  जा |  जा, जा | तीसरी से पांचवी तक हम लोग साथ साथ बैठते थे | ये हम दो लुच्चे लफंगों की बेच है | तुम लोग आगे कहीं बैठो | "

जब सब बैठ गए तो भी मैं इधर उधर नज़रें दौड़ा रहा था - किसी बेंच में कोई अकेला लड़का तो दिखे, जिसके साथ जाकर में बैठ जाऊं | तभी कक्षा शिक्षक आ गए | अब यहाँ प्राथमिक शाला की तरह "खड़े हो, नमस्ते" तो था नहीं | अभिवादन के लिए लोग खड़े हुए और फिर बिना इंतज़ार किये बैठ गए | शिष्टाचार के ये नियम वे विद्यालय में कदम रखने के पूर्व ही जानते थे | किसी के सिखाने की जरुरत नहीं पड़ी | 

काश, मैं भी वर्ग 'स' में होता | 

एकाकीपन तब और काटने दौड़ता, जब  कोई  पीरियड ख़तम होता और दो  शिक्षकों के जाने-आने के मध्य शून्य काल होता | मेरी बेंच पर साथ बैठा सहपाठी भी उठकर अपने परिचित मित्रों से बतियाने उनके पास चले जाता | गर्मी की छुट्टी में बातों का अम्बार जो जमा हो गया  था | 

कोई परिचित चेहरा तो दिख जाए | 

और वह परिचित चेहरा दरवाजे पर दिख गया | 

"चन्दन |" मैं दरवाजे की ओर लपका | 

"तू यहाँ बैठा है ?" वह बोला ,"और कौन है तेरी कक्षा में ?" 

"कोई नहीं यार | " मैंने मरी आवाज़ में कहा | 

"सारे के सारे 'स' में भर गए ?"

"तेरी कक्षा कहाँ है ?" 

"वहां | दो कमरे छोड़ के | सीढ़ी के उस पार | " अचानक वह भाग खड़ा हुआ क्योंकि नया शिक्षक हमारी कक्षा की ओर बढ़ रहा था | 

आधी छुट्टी को हम सारे दोस्त मिले | 'स' वालों के पास तो बातचीत का पिटारा था | "ये सर ऐसे हैं | वो ऐसे |"  और सारे हँस पड़ते  | हिंदी वाली मेडम का नाम राजीव जावले ने पहले ही दिन 'बसंती' रख छोड़ा था चन्दन भी अपने कक्षा "अ " के गणित के सर की मिमिक्री करता | और मैं ?

मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं होता | 

फिर वह क्रम केवल कुछ दिनों तक ही चला | मैं तो जरूर 'स' वालों से मिलता, पर अब चन्दन ने आना कम कर दिया  था | वर्ग 'अ' में ही उसने अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया था | 

मैं किसी तरह, जोड़ तोड़ लगाकर, मिन्नतें करके वर्ग 'स' में पहुँच गया , तब जाकर मानो मेरा नया जीवन शुरू हुआ | तब तक तो वर्ग 'अ' में ही चन्दन ने ढेरों दोस्त और नोक-झोंक करने वाले नए दुश्मन बना लिए थे | वह वहीँ जम गया था | 

मुझ में और चन्दन में ये फर्क तो था | 

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"कहाँ है बे ?" मोबाइल से चन्दन की आवाज़ गूँजी |

कहाँ था मैं ?  चालीस साल पूर्व के भिलाई विद्यालय  के गलियारों में !

"मैं स्टेशन में ही हूँ यार |" मैंने कहा , "बस, अभी अंदर ही आ रहा हूँ |" 

मैंने प्लेटफार्म टिकट जेब में डाला और अंदर चले गया | 

अंदर मैंने प्लेटफार्म का एक चक्कर लगाया | उस अति-आत्मविश्वास का क्या हुआ ?  राम जी,  चन्दन तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है | कहीं वो मुझे तो नहीं खोज रहा है ? यक़ीनन  वही बात है | 

... समय गुजरते रहा | वो चन्दन , जो शाला नंबर आठ में भिलाई विद्यालय के लिए बड़ी दलीलें दिया करता था , यारों की भीड़ के सिवाय कहीं नज़र नहीं आया | मुझे लगता था, वह चन्दन  जो हम लोगों को प्राथमिक शाला में फुटबॉल सिखाया करता था, फुटबॉल के मैदान में मदारी का डमरू बजा देगा | आधे मुरम , आधे घास के उस मैदान में  कहीं नहीं था | चन्दन कोई 'धक्का' खिलाड़ी तो था नहीं , जिसे मैदान में उतारने के लिए हवा भरनी पड़ती थी | फुटबॉल देखते ही उसकी बांछें खिल जाती थी | फिर उसे पिंजरे  में भला बंद किसने कर दिया ?

शाला नंबर आठ में तो चन्दन भिलाई विद्यालय के लिए दलीलें देते समय एन. सी. सी. को परचम  की तरह लहराता था | भिलाई विद्यालय में एन. सी. सी. के द्वार  नवीं में खुलने वाले थे |  

जब छठवीं  में स्काउट में  जिसे कई लोग एन. सी. सी. का विकल्प मानते थे ; जिसमें अंगारे सर की प्रेरणा से वर्ग 'अ' वालों ने धमाल  मचा दिया था ; वह किसी कतार में कहीं नहीं था | सच है कि स्काउट और एन. सी. सी.  में मूलभूत अंतर तो था | गोली चलाने और रस्सी की गाँठ लगाने में काफी फरक था | यह भी सच है कि कई उत्कृष्ट छात्र  स्काउट में सम्मिलित नहीं  हुए थे , लेकिन चन्दन जैसे उत्साही छात्र भी काफी संख्या में, स्काउट में  गोते लगा रहे थे | फिर चन्दन को क्या हुआ ?

तो क्या चन्दन नवीं में एन. सी. सी. में आया ?

एन. सी. सी. आर्मी विंग में - नहीं | 

एन. सी. सी. एयर विंग  में -  कदापि नहीं |  

कहाँ रह गया चन्दन ?

सतपुड़ा सदन की तरफ से मंच पर वाद विवाद में कौशलेन्द्र ठाकुर, आशीष पुरंदरे और मुरली दहाड़ते थे | न कोई अभिनय के क्षेत्र से चन्दन कभी जुड़ा , न गायन में, न चित्रकारी में | 

कहाँ था चन्दन ?

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"कहाँ है यार चन्दन ?" मैंने फोन लगाया | 

मैं अभी भी प्लेटफार्म पर चन्दन को खोज रहा था | 

जब हम लोग दसवीं में थे तो चन्दन एक दिन मुझे घर में ले गया | उसने मुझे एक पारितोषिक शील्ड  दिखाया | 

"क्या है ये ?" मैंने पूछा | 

"तूने क्रिकेट बैलेट  देखा था न ? हम लोगों के सदन का ?"

कुछ देखा कुछ नहीं देखा | उस समय सदन रात्रि में ऐसी भीड़ रहती थी कि पूरा हाल शिक्षकों,मेहमानों और उनके परिवार जनों , कक्षा  कप्तानों और व्यस्थापकों से भरा रहता था  | बाकि सब छात्रों को पीछे खड़े रहना पड़ता था और वह भीड़ हॉल के बाहर निकल जाती थी | अनुशासन ? ये कौन सी चिड़िया का नाम था ? लम्बे चौड़े लड़के आगे खड़े रहते थे | जो अभी मंच पर दिख रहा हो, कोई जरुरी नहीं, वो अगले पल दिखे | सामने कोई न कोई आ ही जाता था | 

तो चन्दन के सदन ने "क्रिकेट बैले" किया था | वैसे "क्रिकेट बैले" एक साल पूर्व ही उनके ही सदन के वरिष्ठ छात्रों ने किया था जिनमें से अधिकतर उच्चतर माध्यमिक की शिक्षा पूरी करके भिलाई विद्यालय से जा चुके थे | तो नए कलाकारों को मौका मिल गया था और उनमें चन्दन भी एक था | 

"आज तक मुझे एक बार भी ईनाम नहीं मिला था ",चन्दन बोला ,"पहली बार मंच पर  चढ़ा और उसके लिए भी जम कर गालियां पड़ी |"

"क्यों ? क्या हुआ था ?"

"कुछ नहीं , बैटिंग करने के समय मुझे गेंद 'प्लेट' करना था | पचासों बार रिहर्सल किया था | फिर भी मैं इतना घबराया हुआ था, कि मैंने गेंद पर शॉट लगा दिया | बाकी  किसी को समझ नहीं आया कि अब क्या करना है ? जल्दी में अंपायर ने भी 'फोर' का सिग्नल दे दिया | इस कारण हम लोगोँ का ग्रुप डांस सेकंड आ गया | "

"होते रहता है यार |"

"हाँ यार | पहली बार स्टेज पर चढ़ा था |"

उसके बाद चन्दन तो स्टेज पर कभी नहीं चढ़ा, लेकिन ज़िन्दगी भर नाटक ने उसका पीछा नहीं छोड़ा | इतना ही नहीं , उसकी स्वाभाविक हरकतों को भी लोग नाटक ही समझते रहे | 

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दुर्ग स्टेशन पर वजन करने की वह मशीन बरसों से लगी हुई थी | जब कभी हम दुर्ग स्टेशन जाते, उसके पायदान में जरूर खड़े होते, भले जेब में सिक्का हो या न हो |  चकरी गोल गोल घूमती  और जब थमती तो हम जेब टटोलते | अगर किसी कोने में सिक्का होता तो उसमें एक रूपये का सिक्का डालते | सफ़ेद रंग का, रेलगाड़ी के टिकट की तरह कार्डबोर्ड का एक टिकट बाहर आता और हम अपना वज़न देखकर कभी खुश होते और कभी उदास | साथ में एक औघड़ सी लेकिन दिलचस्प भविष्यवाणी भी छपी होती थी | 

वज़न मशीन के उसी पायदान पर चन्दन बैठा हुआ था | हाँ, वही तो था | मैंने कहा था न, कोई भी उसे कहीं भी पहचान सकता था | 

वज़न की मशीन के चकरी के इर्द गिर्द छोटी-छोटी बत्तियां झिलमिला रही थी | चकरी धीरे धीरे इधर उधर डोल रही थी | चन्दन अगर उस पर खड़ा हो जाता तो पता नहीं, चकरी कितने चक्कर लगाकर कब रूकती | अगर चन्दन सिक्का डालता तो अपना वज़न देखकर चन्दन के चेहरे पर ख़ुशी या गम, कौन से भाव आते, पता नहीं - पर इस वक्त उसका चेहरा भावहीन था | पता नहीं, भविष्यवाणी उसके लिए क्या कहती - क्योंकि भविष्यवाणी में केवल चमचागिरी भरे शुशनुमा वाक्य ही छपे होते थे | चन्दन के लिए भविष्यवाणी करने के लिए शायद मशीन भी हाथ ऊपर उठा देती |  यह बात भी उतनी ही अनिश्चित थी कि चन्दन को उन बातों पर कितनी दिलचस्पी होती | उसका भावहीन चेहरा डरावना सा लग रहा था | शायद मुझे देखते ही वह उछल पड़ता, पर वह तो मुझे घूरते यूँ ही बैठे रहा | क्या वह चन्दन था ?

"चन्दन?" मेरी पुकार में थोड़ी बहुत शंका समाविष्ट थी | 

"हाँ |" उसने कहा , "इतनी देर कहाँ था बे ?"

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यह शायद केवल भारत में  ही संभव था | चन्दन ने अचानक भीड़ भरी सड़क पर , दाहिनी ओर की द्रुतगामी पक्ति पर अचानक कार रोक दी | 

इसका अर्थ क्या हुआ ? पीछे की सारी  कारों को लेन  बदलकर चन्दन की कार के बायीं ओर से गुज़रना पड़ा-  बस इतना ही  | मेरे दिल में जरूर थोड़ी हलचल सी मच गयी |  मगर चन्दन इतना आश्वस्त और बेफिक्र था कि वह आराम से दाहिनी ओर का दरवाजा खोल कार से बाहर कूद पड़ा |

चन्दन ने ऐसा क्यों किया ? अगर उसे रोकना ही था तो क्या वह कार को सड़क के बाये किनारे  पर खड़ा नहीं कर सकता था ? सड़क के डिवाइडर से चिपकाकर कार खड़ी करने से क्या उसकी लॉटरी लगने वाली थी ?

" दो मिनट रुक | " उसने इतना ही कहा  | और तो और -  उसकी तरफ की कार का डैना खुला ही हुआ था |  इसलिए डिवाइडर के दूसरी और से  विपरीत दिशा से आने वाली कारों को भी थोड़ी सतर्कता से गुजरना पड़ रहा था |

सड़क के मध्य में सफ़ेद  काले रंगों से बने ईंटों की विभाजन रेखा थी, जिसे फुर्ती से लांघकर वह सड़क के दूसरी ओर गया और दूसरी दिशा से आने वाले ट्रैफिक के मध्य से गुजरते हुए सड़क के दूसरी ओर सड़क के किनारे सामान बेचने वालों की भीड़ में खो गया | 

सड़क किनारे के उन विक्रेताओं ने कच्चे-पक्के शेड बना लिए थे | जहाँ तक मैं देख पा रहा था, उसमें से एक शेड के अंदर वह घुस गया जिसके सामने छोटे बड़े गमलों का ढेर लगा हुआ था | हाँ, वही 'ग' से गमला | चन्दन अंतर्ध्यान जरूर हो गया था, लेकिन उसकी आवाज़ अभी भी छन-छनकर आ रही थी | शायद किसी गमले को लेकर वह मोल-भाव कर रहा था |

अगले बीस मिनट तक कार में  मैं दम साधे बैठा रहा | आशंका तो थी ही  कि अमेरिका की तरह कोई ट्रैफिक पुलिस की गाडी बीन बजाते हुऐ पीछे आ जाएगी | ठीक है, यह भारत है | तो फिर क्या पता पीछे से कोई बिगड़ैल सवा सेर आ जाये और सड़क पर बखेड़ा खड़ा कर दे | वैसा कुछ भी नहीं हुआ  | लोग शांति से खड़ी कार से किनारा करके बायीं ओर से निकलते रहे | एक शंका  सी जरूर मन में उठी - क्या सड़क पर चलने वालों को चन्दन की कार का नंबर कंठस्थ हो गया है ?

जब चन्दन कुटिया के बाहर निकला तब स्पष्ट हो पाया कि चन्दन ने सड़क के बीचों-बीच विभाजन रेखा के बगल में कार क्यों खड़ी की थी |  उसके पीछे- पीछे एक बच्चा हाथ में एक भारी भरकम गमला उठाये आ रहा था |  विभाजन रेखा के बगल में कार खड़ी करके चन्दन ने उसे एक दिशा से तेज़ रफ़्तार से  आते हुए ट्रैफिक को पार करने से बचा लिया था | पर 'डिवाइडर'  के दूसरी ओर से, सामने आने वाले ट्रैफिक का क्या किया जाए ? 

चन्दन तो फुर्ती से सड़क के इस पार आ गया, लेकिन वह लड़का सड़क के उस ओर ही ठिठका खड़े रहा | 

"अबे, वहीँ अटका हुआ है ?" चन्दन ने उसे झिड़का , "चल जल्दी आ |"

लड़का एक कदम आगे बढ़ता और फिर पीछे हट जाता | चन्दन के पास धैर्य की कमी तो हमेशा से ही थी | 

"अबे डर रहा है क्या ?" वह चिल्लाया और फिर सडक के दूसरी ओर के ट्रैफिक को लाँघ कर वह लड़के के पास जा पहुंचा ,"चल मेरे साथ चल |" 

क्या वह अपना चिर परिचित पुराना  चन्दन नहीं था ? दुर्ग स्टेशन से अब तक चन्दन के बगल में उसकी कार में बैठकर मैं थोड़ा असहज महसूस कर रहा था | क्या समय के थपेड़ों ने चन्दन को  नम्य , कमजोर, रहस्य्मय बना दिया है ? अभी तो वह मुझे अपने घर ले जा रहा था, पर कितने देर मैं उस अजनबी को झेल पाऊँगा  ?

अब पुराने चन्दन को देखकर मैंने राहत की साँस ली |  

चन्दन अब सड़क के बीचोंबीच खड़े हो गया और उसने सामने से आने वाले ट्रैफिक का प्रवाह रोक पूरी तरह रोक दिया | 

"जल्दी जा बे |" उसने ठिठकते हुए गमले वाले लड़के को आवाज़ दी," कार की डिक्की खुली है | जल्दी कर ||"

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 एक-एक सीढ़ी चढ़कर हम चन्दन के द्वार तक पहुंचे किन्तु अंदर नहीं घुसे | चन्दन ने बाहर की बत्ती जला दी थी और प्रांगण में गमलों पर उगे पौधे स्पष्ट दिखने लगे |  वो मुझे एक-एक पौधों के बारे में काफी रूचि लेकर बता रहा था | मैं सोच रहा था, चन्दन का यह वनस्पति प्रेम कब से जागृत हुआ ? मुझे फ़ूल -पत्तों की कोई खास जानकारी तो नहीं थी | बताते-बताते अचानक वह रुक गया और मेरी ओर देखने लगा | 

"क्या सोच रहा है ?"

"सोच रहा हूँ कि यार, नए गमले को कहाँ रखूं ?" प्रांगण तो पूरी तरह गमलों से भरा हुआ था | 

"कहीं भी |" मेरे मुँह से अनायास ही निकला और ये जवाब चन्दन को बिलकुल पसंद नहीं आया | 

उसके चेहरे के भावों से मैंने भांप लिया कि मेरा जवाब चन्दन को पसंद नहीं आया | आखिर चन्दन कब से सुनियोजित , सुव्यवस्थित हो गया ? फिर वह मुझे बताने लगा, उस गमले में वह क्या लगाना चाहता है ? उसकी बेलें कहाँ तक फैलेगी ? उसे कितनी धूप की जरुरत पड़ेगी | 

अगर मेरी पहली सलाह बेस्वाद थी, जिसे उसने किसी तरह आत्मसात कर लिया था, तो दूसरी सलाह तो नीम के काढ़े की तरह कड़वी निकली ,"यार, फिर तो कुछ पौधों को हटाना पड़ेगा |"

चन्दन ने किसी तरह इस सलाह को भी आत्मसात किया ," यार मैंने इन सब पौधों को बड़े जतन  से लगाया है | एक पत्ता भी सूखता है तो मुझे लगता है कि क्या हो गया ? मेरे बच्चों को सारे के सारे पौधे प्यारे हैं | "

कुछ क्षण योन ही ख़ामोशी छायी रही | वह वाक्य मानो तीव्र प्रकाश से जगमगा उठा - "जो तस्वीरें चन्दन के दिल के करीब होती हैं, उन पर थोड़ी सी खरोंच भी चन्दन बर्दाश्त नहीं कर पाता था | " किसी भी क्षण वह ठेस गुस्से में बदल सकती थी | 

अब मैंने काफी सोच समझकर कहा ,"फिर तो बच्चों से पूछना ही बेहतर है |"

यह गनीमत रही कि यह बात चन्दन को जँच गयी और मेरे साथ उसने भी राहत की साँस ली | 

"एक गलती हो गयी यार |" वह बोला ,"गमला थोड़े दिनों बाद लेना था | आज छोटी लड़की को भी स्टेशन में छोड़ कर आया हूँ |  अब घर में कोई नहीं है | "

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घर में वाकई में शायद कोई भी  नहीं था | जब चन्दन ने अंदर घुसकर सामने के कमरे की बत्ती जलाई, तब कहीं जाकर घर में रौशनी आयी | अब मैं किसी से कभी पूछता तो हूँ नहीं कि श्रीमती जी कहाँ हैं ? कहीं भी हो सकती हैं - मायके से लेकर ब्यूटी-पार्लर तक | जाहिर है, अभी कुछ मिनट पहले बरामदे मं जो कुछ हुआ, मैं इस स्थिति में था भी नहीं | 

"तू चाहता क्या है ? " शुक्र है, चन्दन ने काम की बात छेड़ी ,"सूर्य का फ़ोन आया था | तू लोगों से मिलना चाहता है | क्या  करना चाहता है ?"

"कुछ नहीं , सोचता हूँ, एक बार लोगों से मिल लिया जाए | बस !"

"क्या बोलते है उसको - गेट टुगेदर ?" 

"हाँ, कुछ वैसे ही समझ ले |"

"प्राथमिक शाला नंबर आठ ?"

"हाँ | या तो फिर भिलाई विद्यालय |"

"पहले प्राथमिक शाला के बारे में सोचते हैं यार |" चन्दन बिलकुल सही पटरी पर चल रहा था | 

चन्दन ने मुझे कागज़-कलम पकड़ा दिया और एक छोटी डायरी निकाली ,"लिख - प्रमोद मिश्रा .. ."

"ठीक है |" मैंने उसका नाम लिखा | 

"उससे बात करेगा ? उससे भी तुझ" बहुत सारे नंबर मिल जायेंगे |"

और मेरे 'हाँ' या 'न' कहने के पहले ही उसने प्रमोद मिश्रा को फोन खडका दिया | पहले उसने खुद ही उससे बात की ,"तेरे पास कालकर बहनजी की कोई खबर है क्या ? " फिर उसने बात आगे बढ़ाई ,"मेरे पास विजय सिंह बैठा है | ले उससे बात कर |"

ना जाने कितने वर्षों बाद  - शायद भिलाई विद्यालय से निकलने के बाद पहली बार - मैं प्रमोद मिश्रा से बातें कर रहा था | वही प्रमोद, जो प्राथमिक शाला में मेरे साथ बेंच पर बैठा करता था | 

"विजय, कालकर बहन जी की उम्र काफी हो गयी है |" प्रमोद मिश्रा ने कहा ," अभी कहाँ रहते हैं, पता नहीं | उसका लड़का अपने  साथ पढता था न ?"

"संदीप ?"

"हां संदीप | उससे दो तीन बार मुलाकात हुई थी | उसने ही बताया था | शायद उसका नंबर भी होगा कहीं  | देखता हूँ |"

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"तू चाय पियेगा ?" चन्दन ने पूछा ,"चल मैं चाय बनाकर लाता हूँ |"

"छोड़ यार चन्दन | मैं चाय तो पीता नहीं |"

"तो क्या पियेगा ? कॉफ़ी ?"

"कॉफी भी मैं नहीं  पीता |"

"तो फिर क्या ?" 

"कुछ नहीं | पानी ठीक है |" 

अगले पांच मिनटों में जो कुछ हुआ उसने मुझे तो क्या , चन्दन को भी चौंका दिया | 

अभी तक मैंने आश्वस्त था कि चन्दन के घर में कोई नहीं है | हम दोनों मित्र करीब करीब उसी भाषा में बात कर रहे थे जैसे हम प्राथमिक शाला में करते थे | अब वह भाषा कई बार शालीनता की सीमा लाँघ जाती थी  मैं  वैसे ही उच्छृंखल ठहाके लगा रहा था और चन्दन की भी ओढ़ी  हुई प्रौढ़ता को काटने की कोशिश कर रहा था | हालाँकि चन्दन जरूर काफी संयत था | 

एकाएक पर्दा हिला और चन्दन की धर्मपत्नी ने एक ट्रे में पानी लेकर कमरे में प्रवेश किया |  सर्वथा अनपेक्षित था यह | परिकल्पना के एकदम विपरीत ! मुझे काटो तो खून नहीं | 

विषम परिस्थिति में पड़े चन्दन ने किसी तरह उनका परिचय कराया | 

"नमस्ते |" मेरे मुँह से निकला ,"मैं चन्दन का बचपन का दोस्त हूँ |  मेरा नाम विजय है |" किसी  तरह कुछ शब्दों को संयोजित करके मैंने वाक्य बनाया | 

"नमस्ते |" उन्होंने कहा | 

""कैसे हैं आप ?" मैंने पूछा | मुझे एक अपराधी-भाव सा  महसूस हो रहा था | 

"ठीक | बिस्किट लीजिये न | " 

अब मेरा ध्यान ट्रे की ओर गया जहाँ पानी के गिलास के साथ कुछ बिस्किट भी थे | अपराधी भाव अब भी मेरे मन में समाया हुआ था | मुझे पता ही नहीं चला कि कब श्रीमती दास कमरे के बाहर चले गयी और मैं और चन्दन स्तब्धता की एक  भारी परत से दबे हुए थे | बातचीत का वह क्रम पूरी तरह छिन्न भिन्न हो गया था | 

"चल, जूस पीकर आते हैं |" अंततः चन्दन ने कहा | 

सीढ़ियों से हम नीचे आये | तब चन्दन से मैंने शिकायत के लहजे में कहा, "यार तूने बताया ही नहीं कि  ...  मुझे लग रहा था , घर में हम दोनों ही हैं ... "

रास्ते में चन्दन से जो बातें हुई, मैंने उसे गंभीरता से नहीं लिया | कितने लोगों से मिल चुका था मैं | उम्र के इस पड़ाव पर आते-आते छोटी-मोटी पारीवारिक समस्याएं तो लगी रहती है | 

"छोड़ न यार चन्दन | ये सब तो लगे रहता है | "

मेरी अनिच्छा को देखकर उसने भी हथियार डाल दिए | क्या वह कुछ कहना चाहता था ? क्या वह दिल खोलना चाहता था ? मगर नहीं | मेरे सामने नहीं | मैं इस मामले में कोई सलाह देने के योग्य नहीं था | 

ओह, तो कितने सारे तो दोस्त थे चन्दन के | उसकी डायरी में अनगिनत लोगों के नंबर थे | क्या किसी और से चन्दन ने बात की ? या फिर वो एक भीड़ में अकेला ही था ? 

बस, केवल इतना ही विचार मेरे मन मेँ आया | इस सन्दर्भ में संजीदगी का पूर्ण अभाव था | 

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मुझे पता ही नहीं चला कि पिछले वर्षों में, बल्कि दशकों में सिविक सेंटर का स्वरुप कितना बदल गया था | लेकिन हम सिविक सेण्टर की चकाचौंध करने वाली बत्तियों में नहीं, वरन उसके साये में बैठे थे - यानी कि सेन्ट्रल एवेन्यू के दूसरी ओर - जहाँ अँधेरे का साम्राज्य था | 

और उस अँधेरे में चन्दन फल के रस बेचने वाले को हड़का रहा था , "अँधेरा है, तो ये मत समझना मैं अंधा हो गया हूँ | जूस में पानी बिलकुल मत मिलाना | समझे न |"

और वे चन्दन को छू-छू कर कसमें खा रहे थे , "नहीं साहब | हम तो जूस में कभी पानी मिलाते ही नहीं | "

"उस दिन मेरे सामने मिलाया था | मिलाया था न ? " फिर वह हादसा मुझे बताने  लगा, "उस दिन क्या हुआ था - मैं अपने सामने जूस निकलवा रहा था | मुझे कोई भरोसा नहीं है इन पर - बिलकुल नहीं | ऊपर पेड़ में कोई कौवा बोला | ये बोलै,"देखो सर कौवा रात में बोल रहा है | जैसे ही मैंने ऊपर देखा, उसने फट से पानी मिला दिया | फट से ... एकदम फट से पानी मिला दिया ... | " 

चन्दन की बातें सुनकर आपको लग रहा होगा, उस समय मुझे हँसी आ रही होगी | नहीं - मेरा दिल आशंका से धड़कने लगा | चन्दन की ये बातें मुझे बहकी- बहकी सी लग रही थीं | अभी तक तो चन्दन ठीक से बातें कर रहा था और हम जूस की ही दुकान में  दाखिल ही हुए थे | अचानक चन्दन को क्या हो गया ?

मैंने बातों को पटरी पर लाने के लिहाज से कहा, "ठीक है भैया | पानी मिला देना, पर साफ़ पानी मिलाना | "

फलों के रस की उस दुकान पर अगले एक घंटे सिर्फ रस्साकशी ही चली | 

भले चन्दन ने यहाँ भांप लिया था कि उसकी तत्कालीन परिस्थिति में मेरी कोई रूचि नहीं है | फिर भी मुझे लगता था, उसे किसी संजीदा व्यक्ति की सख्त आवश्यकता थी | उसे मुझमें एक आशा की किरण दिख रही  थी, क्योकि शायद उसे रिश्तो की गली में मेरी परिस्थिति का ज्ञान था और उसने मुझे हमदर्द मान लिया था | दूसरी तरफ मैं उस वार्तालाप में संलग्न होने से बचना चाहता था, क्योंकि कभी न कभी उसकी उंगली मेरी ओर भी उठेगी | वो सवाल उठेंगे जिसके जवाब देते देते मैं इतना थक गया था कि हर परिचित से , जो लम्बे समय बाद मिल रहा हो, मैं मिलने से कतराता था |  और वह समस्या का अंत हुआ कहाँ था ? वह एक नए रूप में मेरे सामने खड़ी थी , जिसके संघर्ष का उल्लेख मैं किसी से करना नहीं चाहता था | 

तो चन्दन बातचीत के जिस क्षेत्र में मुझे खींच रहा था , उसके ठीक विपरीत दिशा में मैं उसे खींच रहा था - बचपन के वे सुनहरे दिन , वो प्राथमिक शाला और भिलाई विद्यालय , वो दोस्त , वो शिक्षक, वे दिन | यह वह क्षेत्र था, जहाँ चन्दन से बात करने में मैं सुविधाजनक और आश्वस्त महसूस कर रहा था |

अँधेरे में शायद चेहरा नहीं दिख रहा था , इसलिए हम एक दूसरे के चेहरे के भाव पढ़ नहीं पा रहे थे | यह अच्छी बात थी | 

"क्या हुआ था ?" चन्दन ने पूछा | 

कब तक मैं इसी बात का जवाब देते रहूँगा ? मैंने अति संक्षेप में चन्दन को बात बताई | दो क्षण चुप्पी सी छायी रही, मैंने उस झुलसते हुए क्षेत्र से छलांग मारने की कोशिश की ," राजीव सिंह की कोई खबर है ?"

"उसका भाई मिलते रहता है यार | " चन्दन बोला ,"घर चलकर उसको फोन लगाता हूँ | " 

एक दो क्षण की ही खामोशी और दिल में उथल पुथल ....| मैं सोच ही रहा थी कि अगला प्रश्न क्या पूछा जाये ताकि बातचीत का तारतम्य इस क्षेत्र में ही बना रहे | आशंका यह भी थी कि इस रिक्तता पर वह अधिकार न जमा ले | छोटा सा जवाब और फिर वही भयावह स्तब्धता... ! इससे पहले कि अगला  बम फटता  , शुक्र था कि जूस वाला फलों का रस लेकर उपस्थित हो गया | 

"विनोद धर का क्या हाल है ?" मैंने पूछा | 

"बहुत दिनों से मिला नहीं यार उससे | उसका नंबर भी मेरे पास है | भिलाई में कब आता है, कब जाता है , कुछ पता नहीं चलता | " 

"क्यों ? कहाँ काम करता है ? "

"काम तो अच्छा ही है | नोट भी अच्छा कमाता है | कभी-कभी प्लांट में भी दिखता है |" फिर वह बड़बड़ाया,"बड़ा आदमी बन गया है साला |"

तो ऐसा नहीं था कि वर्तमान से कहीं दूर, सुनहरे दिनों के उस क्षेत्र में चन्दन परम शांति  महसूस नहीं कर रहा था | वह भी यादों में खो जाता था | बस, यही तो मेरी भी इच्छा थी | क्या फर्क पड़ता है बाकी बातों से | हमारी दुनिया वही तो थी | 

एक बार फिर भयावह रिक्तता मुँह बाए खड़ी थी | इससे पहले कि चन्दन मुझे वापिस रिश्तों की भूलभुलैया वाली गली में घसीट लाता,  जूस वाला फिर हाज़िर हो गया ,"सर, कुछ और चाहिए ?"

"तू जा बे |" चन्दन चिल्लाया ,"पता नहीं क्या, ये अमेरिका से आया है ?"

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और चन्दन ने 'वन वे ' वाली सेन्ट्रल एवेन्यू में उलटी दिशा में अंधाधुंध कार दौड़ा दी | उसके या भारत के यातायात अनुशासन का एक नमूना तो मैं सायं देख ही चुका था | किन्तु इस बार मेरी सांस ही अटक गयी | द्रुतगामी कार, उलटी दिशा में - क्या होगा अगर कोई दूसरी ओर से यातायात के नियमों पर चलते हुए कोई वाहन आ जाये ..... | 

"चन्दन", मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गयी ,"क्या हुआ  ?"

चन्दन ने कोई जवाब नहीं दिया | चौराहे पर सड़क  का विभाजक भी ख़त्म हो गया | अब चन्दन जरूर सड़क के बांयी ओर आएगा | पर यह क्या ? चौराहा ख़त्म करके भी चन्दन उलटी दिशा में ही चलते रहा |  सड़क  का विभाजक पुनः प्रारम्भ हो गया | 

"चन्दन, हम लोग 'रॉंग साइड' में नहीं चल रहे हैं ?"

चन्दन ने कोई जवाब नहीं दिया | शायद उसने मेरी बात का जवाब देना भी उचित नहीं समझा | क्या वह मुझ पर ही क्रोधित तो नहीं है ?

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नहीं, चन्दन क्रोधित तो नहीं था | 

"तो राजीव सिंह के भाई से बात करना है  ?" घर पहुँचते ही चन्दन ने पूछा | 

"गुल्लू ?" राजीव सिंह के भाई का मुझे वही नाम याद आता है | जब हम लोग शाला नंबर आठ में थे तब वह हम लोगों से तीन कक्षा पीछे पढता था | शांत स्वभाव के राजीव सिंह के विपरीत वह  अव्वल दर्जे का शैतान  और दुस्साहसी था  - उसके चेहरे से शरारत हरदम टपकते रहती थी | और उसका पक्का दोस्त था, कालकर बहनजी का सबसे छोटा लड़का बॉबी , जो उससे भी ज्यादा शैतान था | 

"हाँ, वही | प्लांट में अक्सर मिलते रहता है | "

चन्दन ने फोन लगाया | रिंग बजते रही | चन्दन झल्ला गया ,"साला, फोन नहीं उठा रहा है |" उसने दुबारा कोशिश की और फिर तिबारा | लेकिन असफलता ही उसके हाथ लगी | 

तभी किसी का फ़ोन आया | 

"प्रमोद मिश्रा |" वह बोला | फिर उसने फ़ोन मुझे थमा दिया | 

"विजय, अभी मेरी कालकर बहन जी के लड़के से बात हुई है |" प्रमोद मिश्रा की आवाज़ में एक पल का विराम लगा ,"कालकर बहनजी का देहांत हो गया है |"

"ओह |" इससे ज्यादा उदगार  प्रकट करने के लिए शब्द ही नहीं सूझ रहे थे | फिर शांति छा गयी | एक युग का अंत ... | 

सुनकर चन्दन भी काफी देर तक खामोश बैठे न जाने क्या सोचते रहा | फिर बोला ,"पता नहीं | साहू सर कहाँ होंगे ? और बिजोरिया बहनजी ?"

अचानक फोन की घंटी बजी | राजीव सिंह का भाई गुल्लू था | 

"कहाँ है बे ? फोन क्यों नहीं उठाता ?" चन्दन जिस लहजे में बोला, उसमें झिड़की से ज्यादा आत्मीयता का पुट था | 

गुल्लू शायद कोई सफाई दे रहा था |  फिर चन्दन ने पूछ लिया ,"राजीव सिंह कहाँ है ?"

उसका जवाब सुनकर उसने शायद कोई बात दोहराई ,"तो वो नहीं आ सकता ?"

उस फोन के बाद एक बात तो तय हो गयी | 

"न तो कालकर बहनजी है , न राजीव सिंह ही |"

"हाँ यार |" चन्दन ने कहा ,"प्राथमिक शाला का "गेट टुगेदर" बाद में कभी कर लेंगे | पहले 'भिलाई विद्यालय' का कर लेते हैं |"

भिलाई विद्यालय के दोस्तों की सूची बनाना अपेक्षाकृत आसान था | शाला क्रमणक आठ की अपेक्षा भिलाई विद्यालय के कम मित्र ही धुंधलके में अंतर्ध्यान हुए थे | बाकि सब, इधर उधर अक्सर चन्दन से टकराते रहते थे | फिर लड़कियाँ भी तो नहीं थी | 

"कौशलेन्द्र याद है ?" चन्दन ने पूछा | 

"झा सर का लड़का ?"

"हाँ , वही | सेक्टर ९ अस्पताल  में बहुत बड़ा डॉक्टर है |"

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भिलाई विद्यालय में कौशलेंद्र को भला कौन भूल सकता था ? 

तिलक जयंती हो, शिक्षक दिवस हो, सम्भाषण हो या वाद-विवाद | अगर कौशलेन्द्र मंच पर न दिखे तो लोग पहले आँखें मलते थे, फिर सर खुजलाते थे | छोटा कद, घुटा हुआ सर, जिसमें एक चोटी परिलक्षित होती थी | ऐसा चेहरा-मोहरा उन दिनों काफी कम देखने में आता था | मुझे याद है, जब दादा और दादी की मौत हुई थी और मेरा मुंडन हुआ था, मैं गाँधी टोपी या काली टोपी पहन कर शाला जाता था | लेकिन कौशलेन्द्र को इसमें कोई भी असुविधा नहीं थी | उस पर कोई कुछ भी कहे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था | और जब वह मंच पर आता था, तो लोग दम साधे उसकी बाते सुनते ही रहते थे | 

अचानक झा सर के खुशहाल परिवार पर एक गाज़ सी गिरी | कौशलेन्द्र की बड़ी बहन की डॉक्टरों की लापरवाही के कारण अकाल मृत्यु हो गयी थी | 

"...कौशलेन्द्र आजकल बहुत उदास रहता है। ..|" चन्दन ने बताया था ,"डेस्क में सर छुपाकर कुछ-कुछ संस्कृत के श्लोक कहते रहता है | तू बात करेगा उससे ?"

तब तक कौशलेन्द्र से थोड़ी बहुत बातचीत जरूर थी | इस दुखद समाचार को घर में बाबूजी ने खुद ही बताया था | मेरी बड़ी बहन भी उन्हीं की कक्षा  में पढ़ती थी | इस तरह  इस दुखद समाचार की मुझे जानकारी अवश्य थी, लेकिन किसी मित्र को, जिसने अपना परिजन खोया हो, सांत्वना देने का ये मेरा प्रथम प्रयास था | ऊपर से कौशलेन्द्र से आज तक मैंने कभी आमने-सामने बात ही नहीं की थी | था भी तो वह था चन्दन के वर्ग  'अ' में | इसलिए कभी मुलाकात की गुंजाइश आधी छुट्टी या पांच मिनट के लघु अवकाश में ही हो सकती थी कौशलेन्द्र स्वाभाव से काफी हँसमुख लड़का था | उसके चेहरे पर मैंने हरदम हँसी ही देखी थी | कई बार मुझे लगता था कि सख्त झा सर ने अपने घर में हँसने पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, इसलिए कौशलेन्द्र अपनी हसरत विद्यालय में ही निकालता था | उसके आलावा कौशलेन्द्र मंच पर हमेशा छाया रहता था, इसलिए काफी लोकप्रिय था | ऐसे लोग हमेशा मित्रों से घिरे रहते हैं | ऐसा हो ही नहीं सकता था कि आप ऐसे लोगों से बातचीत करें  और बातचीत में तीसरा, चौथा और कई बार कोई पाँचवां सम्मिलित न हो | 

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी | दूसरी मंज़िल के कोने वाले कक्ष में सातवीं 'अ' की कक्षा लगती थी |  चन्दन ने मुझे छोर की दीवार के पास इंतज़ार करने का इशारा किया | 

"बात करेगा ? दो मिनट रुक | मैं बुला कर लाता हूँ |" 

पाँच मिनट का लघु अवकाश था | भिलाई विद्यालय की नई इमारत की वह दूसरी मंज़िल थी | चन्दन कौशलेन्द्र को बुलाकर लाया जरूर ,पर वह खुद खिसक गया | 

"सुनकर बड़ा दुःख हुआ |" मैंने शब्द पिरोने की कोशिश की , "कैसे हो गया ?"

ये वो शब्द थे , जो न जाने मैंने कितने बार सुने और खुद भी दोहराये थे | 

...सात तरु मार्ग और सेन्ट्रल एवेन्यू बारिश में चांदी की तरह चमक रहे थे | जिस जगह वे मिल रहे थे, उस चौराहे पर  २५ मिलियन टन का प्रतीक चिन्ह लगाया गया था | 

बरसती वर्षा की पृष्टभूमि के सम्मुख कौशलेंद्र की आंखों में मैंने उस दिन दृढ संकल्प, उद्देश्यों का  निर्धारण  और अदम्य , अटूट निश्चय की एक झलक देखी थी | 

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मेरे कुछ कहने के पूर्व ही चन्दन ने डॉक्टर कौशलेन्द्र को फोन लगा दिया | रिंग बजते रही और फिर बंद हो गयी 

"तू उससे बाद में बात कर लेना |  ले, नंबर नोट कर ले |" 

"अब कौन ?"

"चल, तुझे मुरली से मिलाता हूँ  |" चन्दन ने कहा |  वही तो वे शब्द थे, जो उसने मुझसे वर्षों पहले कहे थे |

एक मिनट ..  एक मिनट ... सीधे मुरली क्यों ? बीच का एक बड़ा सा खाना मुझे रिक्त  दिखा | 

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मुरली कौन ?

मुरली ने जब भिलाई विद्यालय में कदम रखा तो एक तहलका सा मच गया था | 

"अबे , उसने वाजपेयी सर को भी चैलेंज कर दिया |" चन्दन की आँखों में चमक थी | 

सातवीं कक्षा के वर्ग 'अ' में वाजपई सर अंग्रेजी के सबसे ज्यादा सम्मानित शिक्षक थे | वर्ग 'ब' के अंग्रेजी शिक्षक लम्बे चौड़े सिख - शेर सिंह रंधावा सर थे और हमारे अंग्रेजी के शिक्षक मज़ेदार , लेकिन कड़क गोस्वामी सर थे | 

मुरली के सम्बन्ध में कई तरह भ्रांतियां और किंवदंतियां हवा में तैर रही ी, जो थमने का नाम नहीं ले रही थी | सबसे पहले ये सुनने में आया कि उसके पिताजी "स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड" पर एक बहुत बड़े पद पर थे और स्थानांतरित होकर आये थे | घर में अंग्रेजी का माहौल था | मुरली फर्राटेदार नहीं, बल्कि झन्नाटेदार अंग्रेजी बोला करता था | कुछ किस्से ऐसे थे कि पहले मुरली को सेक्टर ४ और सेक्टर १० के अंग्रेजी विद्यालयों में प्रविष्टि दिलाने की कोशिश की गयी, लेकिन अँगरेज़ के बेशरम वंशज नियम और कायदे कानून दिखाने लग गए | तब मुरली के पिताजी ने ताल ठोंककर कहा, ठीक है, मेरा लड़का हिंदी माध्यम में  पढ़कर ही तुम्हे आइना चमकाएगा | 

और आते ही साथ मुरली ने डंका बजाना शुरू किया |  अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय भी अपने यहाँ अंतर-शालेय सम्भाषण , वाद विवाद की प्रतियोगिताएं रखा करते थे | जाहिर है, उनकी प्रतियोगिताएं अंग्रेजी में ही होती थी | वे खानापूरी के लिए हिंदी माध्यम की शालाओं में भी आमंत्रण भेजते थे | और खानापूरी के लिए ही हिंदी माध्यम वाले अपने प्रतियोगी भेजा करते थे | उच्चतर कक्षाओं  में अंग्रेजी के एकाध वक्त जरूर थे, लेकिन माध्यमिक कक्षाओं  में दूर दूर तक कोई नहीं था | अब इन सब बातों का जवाब मुरली था | 

१९७७-७८ को भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा चल रहा था | जेफ़ थॉमसन को संसार का तेज़ गेंदबाज़ माना जाता था | 

चन्दन बहुत उत्साहित था "अबे | लोग बोलते हैं, उसकी बॉल नहीं दिखती | बैट्समेन लोग बॉल की धूल देखकर मारते हैं | "

दूसरा कहता, "बेदी तक की बॉल नहीं दिखती | इतनी तेज़ बॉल आती है | साइट स्क्रीन में देखना पड़ता है |"

बात चल ही रही थी कि चन्दन ने मुझे एक ओर  खींचा | 

"चल, तुझे मुरली से मिलाता हूँ |" चन्दन बोला  |  मन के एक कोने से आवाज़ उठी,"क्यों ,क्यों, क्यों ? मैं वैसे ही ठीक हूँ | "

"ठीक है |"मरी आवाज़ में मुँह से यही निकला | 

चंदन मुरली को लेकर आया | 

तो ये मुरली है | दुबला पतला, थोड़ा सामने झुका हुआ | यानी थोड़ी सी कूबड़ निकली हुई | करीने से इस्तरी किये हुए वस्त्र | मैंने तपाक से हाथ बढ़ाया ,"मुरली मियां | बढ़ाओ दोस्ती का हाथ |" 

तो जब मुरली ने अंग्रेजी माध्यम की शालाओं में विभिन्न प्रतियोगिताओं  में झंडे गाड़ने शुरू किये तो भिलाई विद्यालय के अंग्रेजी विभाग में नए जीवन का संचार हुआ | अब मुरली के जोड़ीदार की तलाश शुरू हुई जो अंग्रेजी के वाद-विवाद में मुरली के साथ मिलकर भिलाई विद्यालय की चुनौती पेश कर सके | उनको ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी | उन्हें मुरली के टक्कर का तो नहीं, पर उतना प्रबल  वक्ता तो मिल ही गया जो मुरली के साथ वाद-विवाद का दूसरा पक्ष संभाल सके | 

मुरली की इस सफलता ने दूसरे वर्ग के लोगों को भी प्रोत्साहित किया | वर्ग 'ब' में अंजय और शरद निगम को शेर सिंह सर ने चाभी भरी | वे भी मैदान में आये, लेकिन मुरली और उसकी जोड़ी बदस्तूर जमी रही | लेकिन वह तो न केवल अंग्रेजी वरन हिंदी का भी अच्छा वक्ता था | 

"और आशीष ?आशीष पुरंदरे ? " मैंने पूछा | 

"आशीष तो ख़तम हो गया |" चन्दन ने जवाब दिया | 

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"चल, मैं बाकी सब से बात कर लूंगा |" चन्दन ने थोड़ी ख़ामोशी के बाद कहा | कहीं न कहीं से टपकती कोई बुरी खबर से वह भी परेशान हो गया | 

तभी दरवाजे पर खटखट हुई | चन्दन ने दरवाजा खोला | 

"अभी आ रहा है बे ?" चन्दन बोला,"तीन दिन से खटिया तोड़ रहा था ? वो तो हॉस्टल भी चले गयी | चल, बहाना बना फ़टाफ़ट |"

"सर, मैं बस आ ही रहा था | " दाढ़ी वाले ने हँसते हुए कहा | 

"कौन है ये ?" मैंने पूछा | 

"इंटरनेट वाला |" चन्दन बोला ,"बहुत लूटते हैं साले | अपने को तो पता नहीं चलता | जब बच्चे आते हैं तो बोलते हैं, पापा इंटरनेट बहुत धीमा है | सेल, पैसे लेंगे राकेट का और स्पीड देखो तो बैलगाड़ी की |" 

"नहीं सर, स्पीड तो अच्छी ही है |"

"चुप बे | " 

"अभी टेस्ट कर लेते हैं |" मैंने कहा ,"चन्दन, किधर है तेरा कंप्यूटर ?"

कमरे के एक कोने में एक डेस्कटॉप था | जिसके मॉनिटर पर धूल से बचाने के लिए कवर  लगा था | चन्दन ने कपड़ा हटाते हुए कहा ,"अमेरिका से मेरा दोस्त आया है | अभी पता चल जायेगा |"

कम्प्यूटर के चालू होने में ही बहुत समय लग गया | 

"आपका कम्प्यूटर ही पुराना है सर |" 

"चुप बे | बच्चों के पास लैपटॉप है |" चन्दन ने डपट दिया | 

घरेलू कामों के लिए कम्प्यूटर का 'कॉन्फिगरेशन'  कोई बुरा नहीं था | 'ए.  एम. डी.' का प्रोसेसर था | रेम भी चार जी. बी. का था |  

"ठीक है | 'यू ट्यूब' चालू कर |" मैंने कहा | 

"क्या ?" चन्दन कुछ समझा, कुछ नहीं , "तू इधर आ | बैठ इधर |"

उसने मुझे डेस्कटॉप के सामने बैठा दिया | दिसंबर की ठण्ड में उसने एक मिनट के पंखा चालू किया और फिर बंद कर दिया | मैंने इंटरनेट चालू किया और पुरानी अमिताभ बच्चन वाली "डॉन" का गाना  खोजकर चलाने की कोशिश की | गाना थोड़ा 'बफर' हुआ, चला, फिर रुक कर बाकी हिस्सा 'बफ़र' होने लगा | 

"देख लो भइया |" मैंने इंटरनेट सर्विस वाले को कहा | 

"सर आपका कम्प्यूटर पुराना हो गया है |"

इससे पहले मैं कुछ कहता, चन्दन भड़क गया | मैंने बात संभाली,"ए. एम. डी. प्रोसेसर और चार जी बी 'रेम' ... | "

चन्दन ने भी सुर बदला,"अबे, मेरा दोस्त अमेरिका से आया है |"

"सर, आपके कंप्यूटर में 'मालवेयर' होगा |"

"वो सब हम बाद में देख लेंगे | तुम अपनी 'स्पीड चेक' कर लो | या हम इस 'पुराने' कम्प्यूटर पर 'स्पीड टेस्ट' करें ?"

उसने आखिरी दांव खेला,"सर, आपका प्लान इतने का ही है | आप ऊँचा वाला प्लान ले लो |"

चन्दन ने कागज़ पत्र खंगाले और सर्विस एग्रीमेंट निकाल लाया | घरेलु उपयोग के लिए वह पर्याप्त था | 

"इसमें जितने एम्.बी.पी.एस. लिखा है, उतनी स्पीड दिखाओ |" मैंने कहा | 

"सर, ये तो सबसे ज्यादा स्पीड है | ऊपर नीचे तो होते रहता है | जैसे आप गाड़ी खरीदते हैं तो जितना माइलेज लिखा रहता है, उतना ... "

"कहाँ की बात कहाँ भिड़ा रहे हो यार ?"

अब चन्दन को शह मिल गयी  ,"चल तो बे , अपने मालिक को फोन लगा | जबान लड़ाता है ?"

हारकर इंटरनेट वाले ने स्पीड चेक की | वाकई काफी धीमी स्पीड निकली | 

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इंटरनेट वाले के अकस्मात् आगमन का फल यह हुआ कि बातचीत की दिशा ही बदल गयी | 

"तू 'फेसबुक' उपयोग करता है ?" चन्दन ने पूछा ,"करता ही होगा |"

"हाँ |", मैंने कहा | 

"बड़ी लड़की ने मेरा अकाउंट बनाया है |" चन्दन बोला | 

"ओह अच्छा | तब तो हम दोनों को दोस्त बन जाना चाहिए - 'फेसबुक' में |"

"एक मिनट रुक | मैं तुझे अपना एकाउंट नाम बताता हूँ | मैंने संभाल कर रखा है |" चन्दन डायरी के पन्ने उलटने लगा | 

"उसकी जरुरत नहीं है | मैं तुझे खोज लेता हूँ |" मैंने कहा | 

मैंने 'फेसबुक' के 'सर्च बार' पर "चंदनदास + भिलाई " टाइप किया | दो-तीन चेहरे फुदककर बाहर आये | उसमें चन्दन का प्रोफाइल एक था | 

"ये तू है ?" मैंने चन्दन पूछा | 

चन्दन हैरानी से मेरी ओर देख रहा था ,"तूने ये कैसे किया ? हाँ , हाँ | मैं ही हूँ |"

मैंने चन्दन को एक 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' भेजी ,"मैं तुझे एक 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' भेज रहा हूँ | जब तू 'लॉग ऑन' करेगा तो मेरा 'रिक्वेस्ट' 'एक्सेप्ट' कर लेना |"

"क्या करना है ?"

"कुछ नहीं | 'एक्सेप्ट' बटन दबा देना |"

"उससे क्या होगा ?"

"कुछ नहीं | हम दोनों दोस्त बन जायेंगे - 'फेसबुक' में | "

ओह, मैं स्क्रीन पर देखते हुए उससे बातें किये जा रहा था | मुझे उसका चेहरा तो एक बार देख लेना था, जहाँ पहेलियों का अम्बार जमा हो गया था | 

"ठीक है | एक काम करते हैं |" मैंने कहा,"तू अपना "युसर नाम और पासवर्ड लेकर आ और यहाँ बैठ |"

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"आजकल बच्चे लोग भी कहाँ बताते हैं यार ?" चन्दन भुनभुना रहा था | 

"क्या ?" मैं चन्दन की बात सुनी-अनसुनी कर रहा था ,"देख भाई | बच्चों ने ही तो तेरा 'फेसबुक' अकॉउंट बनाया है | हाँ या नहीं ? "

क्या ये वही चन्दन था ? चन्दन तो कभी लचर नहीं था | 

"कुछ नहीं रखा इन सब में चन्दन भाई | अरे, जब त्रिकोणमिति, क्षेत्रमिति , गुणात्मक और हरात्मक श्रेणी के भारी-भरकम सवाल  हल कर डाले हैं अपन ने तो ये बटन दबाना कौन सी बड़ी बात है ? मैं हूँ न | तू मुझे बता, तू चाहता क्या है ? मैं तुझे अभी तोप बना देता हूँ | " 

"तू लोगों  को खोज कैसे लेता है ?"

"देख वो खाली डब्बा दिख रहा है ? वही जिसके बगल में आवर्धक लैंस की तस्वीर बानी है ? वहां कोई भी नाम टाइप कर |"

"कोई भी नाम ? "
 
"हाँ | लेकिन उसका फेसबुक में खाता भी तो होना चाहिए |"

अब चन्दन थोड़ा सोच में पड़  गया | वैसे भी वह एक-एक अक्षर खोज खोज के एक उंगली से टाइप कर रहा था |  उसने जो दो चार अक्षर टाइप किये थे, उसे मिटा दिया और कुंजी-पटल मेरी ओर खिसकाते हुए बोलै,"तू टाइप कर यार |"

"क्या टाइप करूँ ?"

"जो बोल रहा हूँ , टाइप कर .... एन.  ए. एन... | "

मैं काँप गया | 

राजीव जावले बचपन का दोस्त था | प्राथमिक शाला से ही चन्दन और वह सहपाठी थे | भिलाई विद्यालय में भले अलग-अलग वर्ग में थे, लेकिन जब कोचिंग-कक्षाएं प्रारम्भ हुई तो चन्दन और वो  फिर एक छत के नीचे आ गए | आगे दुर्ग पॉलिटेक्निक में भी साथ में थे | तो दूसरे वर्ष के शुरू में रैगिंग लेने के दौरान चन्दन ने राजीव जावले को जम कर पीटा | प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि चन्दन के सर पर मानो खून  सवार हो गया था | 

जो मुझे कारण पता चले, उसमें मुझे चन्दन की लेशमात्र भी गलती नहीं दिखी | चन्दन की जगह मैं , आप या कोई और भी होता तो अगर हाथापाई नहीं तो कम से कम कहा-सुनी अवश्य हो जाती |  और चन्दन तो वह था, जो दिल के पास रखी तस्वीरों पर हलकी सी खरोंच भी बर्दाश्त नहीं कर पाता था | 

हुआ यह कि रैगिंग के दौरान सेक्टर चार के अंग्रेजी माध्यम विद्यालय से एक छात्र दुर्ग पॉलिटेक्निक में आया था | यह सामान्य सी बात है कि रैगिंग के दौरान लोग खूबसूरत लड़कियों की बातें बीच में ले ही आते हैं और फिर जूनियर के चेहरे पर उतरते-चढ़ते भावों को देखकर प्रफुल्लित होते हैं | जब उसको पता चला कि पंछी सेक्टर चार अंग्रेजी माध्यम विद्यालय से पंख फड़फड़ाकर आया है तो उस आशिक मिज़ाज़ी राजीव जावले ने बातों-बातों में पूछ लिया ,"तू  एन. डी. को जानता है ?" और रैगिंग लेने वाले लड़कों की उस छोटी सी भीड़ में चन्दन भी था .... | 

नाम टाइप करते समय मेरी उंगलियां मानो जवाब दे रही थी | मेरे सर पर वह बब्बर शेर खड़ा था जिसने जावले का भुर्ता बना दिया था | किसी तरह टाइप करके मैंने 'इंटर' की कुंजी दबाई | काश, उसकी प्रोफाइल ना हो | जितने भूले भटके चेहरे सतह पर उभरे , मैं उन्हें ऊपर सरकाते जा रहा था | 

"रुक | रुक.... | अबे रुक बे ...| हाँ, उस फोटो पर क्लिक कर .... |"

वह एक क्षण फोटो देखते रहा | फिर मुझसे बोला ," तू अमेरिका में कहाँ पर रहता है ?"

"मैं ? कैलिफ़ोर्निया एक प्रदेश है ... |"

"ये भी कैलिफोर्निया में रहती है | तू कौन से शहर में रहता है ?"

"मैं तो प्लीसैंटॉन में रहता हूँ |"

"फ्रीमोंट वहां से कितनी दूर होगा ?"

"मैं प्लीसैंटॉन में रहता हूँ और ऑफिस सांता क्लारा में है | दोनों के बीच में फ्रीमोंट है |"

"ये मेरे चाचा की लड़की है |"

मेरे मुँह से निकला ,"मैं जानता हूँ |" फिर तुरंत संभल कर बोला ,"हाँ | तूने मुझे स्कूल के दिनों में बताया था |"

"हाँ-हाँ | सेक्टर चार में थी | "

चन्दन के जीवन में किसी  ने गहरा प्रभाव डाला था , बल्कि एक उद्दंड बालक के मन में पढ़ाई के प्रति रुझान अगर किसी ने उत्पन्न किया था , तो वही थी जिसकी  प्रोफ़ाइल सामने खुली थी | चन्दन बोले जा रहा था, " पति- पत्नी ने मिलकर एक कंपनी खोली है | तूने '...... ' का नाम तो सुना ही होगा ?"

चन्दन कुछ बोल रहा था, मुझे कुछ और याद आ रहा था | शायद दसवीं में चन्दन मुझसे भौतिक के 'कारण बताओ' जैसे कुछ प्रश्न पूछता था और मैं उनके जवाब दे दिया करता था , क्योंकि वे प्रश्न रुसी पुस्तक 'मनोरंजक भौतिकी' से होते थे , जो मैं बीच बीच में पढ़ लिया करता था | 

चन्दन को कई बार आश्चर्य होता ,"तुझे कैसे मालूम ?"

"पता नहीं यार  | जिसने तुझे प्रश्न दिया और तू जिससे वह प्रश्न पूछ रहा है, हो सकता है, दोनों ने एक ही किताब पढ़ी हो |"

चन्दन ने आगे पूछा, " नहीं सुना ?"

"हाँ | हाँ , सुना है यार |" मैंने कहा, " सिलिकॉन वैली' में बड़ा नाम है | तेरी तरफ से इसको 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' भेज दें ?"

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अगर इस 'सर्च' से मुझे पांव के नीचे से ज़मीन खिसकती  महसूस हुई थी तो चन्दन के अगले 'सर्च' की फरमाइश ने तो मुझे चारों खाने चित्त कर दिया | 

चन्दन एक-एक अक्षर बहुत ही सावधानी से धीरे धीरे बोल रहा था , मानो दीवारों के भी कान होते हों | हो सकता है, दीवारों के भी कान होते हों | मुझे क्या पता था ?

"यार, घर में हम लोग सब काले हैं |"

"अरे छोड़ न यार चन्दन |" मैंने तत्काल प्रतिवाद किया , "क्या फरक पड़ता है यार ?"

"नहीं यार | चाचा के बच्चे देखो | कैसे गोरे- चिट्टे हैं, रशियन जैसे | इसलिए पिताजी चाहते हैं कि हम लोगों की शादी गोरी लड़की से हो ताकि हमारे बच्चे भी गोरे हों | "

अब भिलाई विद्यालय में वयः संधि की उम्र थी | सपने देखने पर कोई टैक्स तो था नहीं | पर मुझे क्या मालूम था, बल्कि यूँ कहूं कि मुझ अनजाने को छोड़कर सारे जहान को मालूम था कि चन्दन भाई मुहब्बत की गिरफ्त में   फँस  चुके हैं | 

पता नहीं, मुहब्बत में शायद वो शक्ति होती है जो किसी को भी या तो काफी सबल बना देती है या काफी कमज़ोर | यह काफी हद तक संभव था कि वह चन्दन के लिए उन दिनों  किसी प्रेरणा शक्ति का काम करते रही |
 
मगर अब ? इस समय ? हाँ | संयोग से वह प्रोफाइल भी 'फेसबुक' में दिख गया | 

न तो मैंने कुछ पूछा , न उसने कुछ कहा | एक आशंका सी रही कि वह कहीं 'फ्रेंड रेकवेस्ट' भेजने न कह दे | अगर वह कहता तो भी मैं मना कर देता | दीवाना वह था, मैं नहीं | 

हो सकता है, मैं कुछ ज्यादा ही सोच रहा था | 

क्या रस्साकशी में चन्दन जीत गया था ?

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वे विलुप्त लोग, अदृश्य हुई छाया , खोयी हुई छवि ....

क्या सब आएंगे ? के कोई आएगा भी ? क्या कुछ लोग आएंगे और कुछ संकोच की जंजीरें तोड़ नहीं पाएंगे ?
क्या लोगों के चेहरे बदल गए होंगे  ?  क्या चेहरे वही होंगे और आवाज़ बदल गयी होगी ? या आवाज़ ही पहचान होगी ? हो सकता है, चेहरे और आवाज़ दोनों बदल गए होंगे | 

सब से पहले भौला गिरी मिला , जिसकी न तो आवाज़ बदली थी और न ही चेहरा |

भिलाई विद्यालय में एक-एक करके सारे मित्र इकठ्ठा होने लगे | 

समय तो दिया गया था नौ बजे और मैं नौ बजे पहुँच भी गया | लोग तो नहीं आये , हाँ किसी किसी के फोन जरूर आ रहे थे, "कितने लोग आये ? क्या सब लोग आ गए ? कितने बजे शुरू होगा ?" अंत में , "मैं बस अभी निकल ही रहा हूँ |"

एक मिनट - क्या वो भोला गिरी है ? हाँ , वह भोला गिरी ही तो था | प्राथमिक शाला में उसकी गतिविधियां  देखकर कोई भी भविष्यवाणी कर सकता था कि वह बांका कसरती जवान होगा | पर ये क्या ? भोला तो दुबला पतला .. ऊंचाई भी कोई ख़ास नहीं बढ़ी | चेहरे और चेहरे की मुस्कान देखकर ही ज्ञात होता था कि यह भोला ही है | 

मैं और भोला एक कमरे में बैठे थे | उस चौगड्डे का एक प्रमुख सदस्य - भोला , लगता था , किसी बोझ से दबे जा रहा था | उसके पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था |  उसके पास पूछने की भी शक्ति तो नहीं थी | वह केवल सुनना चाहता था | 

जिस तरह मेरा मन पीछे भाग रहा था, शायद उतनी ही तेज़ी से उसका मन भी अतीत में कुछ टटोल रहा था | 

"विजय भाई, पिछले दिनों मैंने अखबार में एक खबर पढ़ी थी | किसी शाला के कुछ लोग पैंतीस साल बाद एक दूसरे से मिले |"

"चालीस साल तो अपने को भी हो गया है यार - प्राथमिक शाला से निकले |" 

"क्यों न हम लोग भी अपने प्राथमिक शाला का सम्मिलन आयोजित कर लें ? मज़ा आ जायेगा गुरु ||  "

"पहले मैंने और चन्दन ने वही सोचा था कि पहले प्राथमिक शाला के लोग ही मिल लें  | लेकिन राजीव सिंह तो अभी यहाँ है नहीं | उसके बिना कोई कार्यक्रम आयोजित करने की सोच भी नहीं सकते |"

राजीव सिंह का नाम सुनते ही उसकी आँखों में चमक आ गयी | चन्दन का उल्लेख आते ही उसके हाथों में हरकत सी हुई | लग रहा था, मन के किसी कोने में प्रसुप्त बालक भोला गिरी अंगड़ाई ले रहा है | 

"विनोद धर कहाँ है विजय भाई  ? प्रमोद मिश्रा तो कभी कभी दिख जाता है | एक बार मनमोहन को दूर से देखा था | बहुत लम्बा हो गया है |"

भोला के साथ बातें करते-करते समय का पता ही नहीं चला | नीचे भिलाई विद्यालय के लॉन में, जिसमें हमें बागवानी के पीरियड में घास उखाड़ने का अनुदेश मिलता था,, एक कोलाहल सा हुआ और फिर हम लोगों की तन्द्रा टूटी | 

ढेर सारे लोग इकठ्ठा हो गए थे | कुछ लोग पहचान में आ रहे थे , कुछ नहीं |  अंगारे सर की बात याद आ रही थी,"जिनके बाल पकते नहीं, उनके बाल झड़ जाते हैं | 
हाथ में पट्टी बाँधे सुरेश बोपचे खड़ा मुस्कुरा रहा था | विनोद धर किसी के साथ ठिठोली कर रहा था | भोला गिरी को देखते ही दोनों उसकी ओर लपके  | अचानक भोला के उत्साह से बढे कदम कुछ धीमे पड़  गए | 

पर चन्दन  कहाँ था ?

न जाने कितने चिर परिचित चेहरे इतने वर्षो के बाद दिख रहे थे | शरद निगम, प्रदीप पाटिल, अंजय, राणा प्रताप, वज़ी, सूर्य, इंद्रजीत , रामवृक्ष, अप्पाराव , अनिल नारखेडे, कृष्णेश्वर, अजय कौशल, गौर, मनमोहन ... | 

पर चन्दन कहाँ था ? 

उसको फोन लगाया पर उसका फोन 'ऑफ' था | 

जब हर्षोल्लास थोड़ा सा शांत हुआ, तब प्रतीक ने कहा," चलो, झा सर को लेकर आते हैं |" जो कार लेकर आये थे, उन्होंने अपनी कार की पेशकश  की | अब  तय हो रहा था कि किसकी कार इस कार्य के लिए सर्वोत्कृष्ट  है |   

तभी अचानक जोर का कोलाहल हुआ और चन्दन आ गया | 

चन्दन के आते ही मानो महफ़िल में नया रंग छा  गया | सब के सब चन्दन पर टूट पड़े | 

लम्बे अंतराल के  बाद  चौगड्डा आज फिर इकठ्ठा हुआ था - भोला गिरी, सुरेश बोपचे , विनोद धर और चन्दन |  प्लास्टर बंधे हाथ को हिलाकर सुरेश बोपचे ने किलकारी भरी | चन्दन अपनी मुस्कान छिपाने की भरपूर कोशिश कर रहा था | ख़ुशी किसी भी क्षण फूट कर बाहर आने ही वाली थी | 

ठिठोली की मुद्रा में बाहें फैलाये, विनोद धर नाटकीय अंदाज़ में आगे बढ़ा ,"कालू मेरे दोस्त |"

अचानक सब कुछ ठहर सा गया | चन्दन के आँखें गुस्से से लाल हो गयी | उसके कदम ठिठक गए थे | 

मेरे लिए यह दृश्य कोई नया नहीं था | प्राथमिक शाला में अनेकों बार इसकी पुनरावृत्ति हुई थी | अब चन्दन विनोद धर को कस के मुक्का जमायेगा | विनोद धर खींसे निपोरेगा और इधर उधर भागेगा |  भोला गिरी बीच बचाव करेगा , सुरेश बोपचे चन्दन के गले में हाथ डालकर समझायेगा | विनोद धर बेशर्मी से हँसते ही रहेगा और फिर चन्दन भी मुस्कुरा देगा | बिलकुल यहीहोने वाला है ... | एक, दो, तीन... !

ऐसा कुछ नहीं हुआ | विनोद धर जरूर बेशर्मी से हँसते रहा | चन्दन की मुट्ठियां भीजी  जरूर | लेकिन यह क्या ? भोला गिरी मानो सकपकाया सा खड़ा था | माना कि सुरेश बोपचे का हाथ जरूर टूटा था, पर वह निर्विकार सा खड़े रहा | 

क्या इन दशकों में इनके बीच इतनी ऊँची-ऊँची अदृश्य दीवारें खिंच गयी हैं ?

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"तू कहना क्या चाहता है ?" सूर्य प्रकाश ने मुझसे पूछा | 

काफी समय बाद हम इस बात की विवेचना कर रहे थे | 

"मुझे मालूम है यार | विनोद धर मज़ाक ही तो कर रहा था | अरे वैसे ही यार, जैसे हम स्कूल में ... "

"टूल्लू , एक बात कहूं ? " सूर्य बात काटकर बोला ,"अब हम लोग प्राथमिक शाला में नहीं है | और यही सच्चाई है |"

हाँ, यही तो सच्चाई थी | उन चारों में भोला गिरी सबसे पीछे छूट चुका था | अगर विनोद धर अभी भी बच्चा ही था तो क्या , चन्दन को परिस्थितियों ने प्रौढ़ बना दिया था |  और सुरेश बोपचे ने फैक्टरी चलाते-चलाते इतना तो सीख ही लिया था कि अपने काम से ही काम रखना चाहिए | 

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तो सम्माननीय शिक्षक झा सर थे | कौशलेन्द्र के पिताजी , संस्कृत वाले झा सर नहीं, रसायन वाले झा सर | 

 शिक्षक की कुर्सी पर झा सर बैठे थे | एक-एक करके छात्र आते और भिलाई विद्यालय से सम्बंधित अपने अनुभव सुनाते | प्रतीक भोई ने शुरुआत की | अजय पोफली ने उसे आगे बढ़ाया | हर वक्ता के वक्तव्य ख़त्म होने पर मांग उठती -"'चन्दन', 'चन्दन' | कहाँ है चन्दन ?"

कहाँ था चन्दन ? मैं अपना वीडियो कैमरा शूटिंग के लिए ले गया था और चन्दन कैमरे के पीछे छिप गया था | वह शूटिंग कर जरूर रहा था, लेकिन अपने-आपको जरुरत से ज्यादा व्यस्त भी दिखा रहा था |

हर जाने वाले वक्त के साथ "चन्दन", "चन्दन" की आवाज़ जोर पकड़ते जा रही थी | और झा सर भी मुस्कुरा देते थे | क्या झा सर के मुस्कुराने और चन्दन के मंच पर ना जा पाने में कोई तार-तम्य था ?

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अगर किसी को बंदूक से गोली दागनी हो तो चन्दन का कन्धा हमेशा हाज़िर रहता था | ग्यारहवीं कक्षा ऐसी थी जब हर छात्र , या यूँ कहा जाये तो विज्ञानं- और खासकर गणित पढ़ने वाला एक मध्यम श्रेणी का छात्र - तीन विषय - भौतिक, रसायन और गणित कम से कम दो शिक्षकों से पढता था | एक- कक्षा के अंदर और दूसरा कक्षा के बाहर | गणित के लिए सिन्हा सर और त्रिपाठी सर इस सन्दर्भ में विख्यात और कुख्यात थे  | संयोग से दोनों अच्छे मित्र भी थे | वैसे देखा जाए तो गणित के ही गनी सर की अलग ही धाक थी | 

कक्षा के अंदर शिक्षक अपनी नौकरी बजाते थे और कक्षा के बाहर वे ट्यूशन पढाते थे | ट्यूशन के मामले में त्रिपाठी सर और सिन्हा सर दोनों पक्के व्यवसायी थे और इसलिए त्रिपाठी सर का तबादला राजहरकी शाला में कर दिया गया | लेकिन त्रिपाठी सर तिकड़म भिड़ाकर भिलाई वापिस आ गए थे | 

तो ट्यूशन को इज़्ज़तदार नाम देने के लिए त्रिपाठी सर ने कृष्णा कोचिंग सेंटर की स्थापना कर दी | प्रारम्भ  में उसमें दो ही शिक्षक थे | त्रिपाठी सर खुद गणित और भौतिक पढ़ाते थे और उनके छोटे भाई, रसायन पढ़ाते थे | 

तो हमारी कक्षा के कई छात्रों ने कृष्णा कोचिंग में प्रवेश लिया | त्रिपाठी सर की ख्याति हिंदी माध्यम शालाओं में- खासकर भिलाई विद्यालय में काफी ज्यादा थी | राजीव जावले,  रवींद्र कर्मकार,अजय कौशल, ललित -सब कृष्णा कोचिंग में थे | चन्दन तब तक पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर हो गया था | सबके साथ बहते हुए उसने भी कृष्णा कोचिंग में दाखिला ले लिया | 

अब आता है, कढ़ी में उबाल | हुआ यह कि त्रिपाठी सर भौतिक और गणित भले ही अच्छा पढ़ाते हों, लेकिन उनके भाई रसायन के उतने अच्छे शिक्षक नहीं थे || फलतः छात्रों में असंतोष बढ़ते गया | यह स्वाभाविक भी था | पिताजी के खून पसीने की कमाई का पैसा था और चन्दन जैसे छात्रों के लिए तो ये बहुत ही मायने रखता था | 

जब असंतोष काफी बढ़ गया तो निश्चय लिया गया कि क्यों न त्रिपाठी सर से ही सीधे बात की जाये | लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? एक सम्मिलित मोर्चा बनाने के लिए भी छात्र तैयार नहीं थे | एक ही तो छात्र था, जिसमें हवा भरी जा सकती थी | वह खड़ा भी हो गया और सब उसकी आड़ में छिप गए | 

त्रिपाठी सर से एकांत में मिलकर चन्दन ने छात्रों की व्यथा उनसे बयान कर दी | कुछ भी कारवाही करने के बजाय त्रिपाठी सर बिफर गए | 

"अगर तुम्हें लगता है कि कृष्णा कोचिंग से तुम्हें अच्छी सेवाएं नहीं मिल रही हैं तो तुम बाहर जाने के लिए स्वतंत्र हो | मैं तुम्हारा पैसा वापिस कर दूंगा |" 

और एक व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने वाले त्रिपाठी सर ने, इससे पहले कि कोई विद्रोह भड़के, चन्दन को कृष्णा कोचिंग से मुक्त कर दिया | इतना ही नहीं, उन्होंने भिलाई के सबसे अच्छे रसायन के शिक्षक सेक्टर १ के वर्मा सर और भौतिक के लिए भिलाई विद्यालय के ही हल्दकार सर को अनुबंधित कर लिया | 

त्रिपाठी सर के प्रतिद्वंदी थे- सिन्हा सर | लेकिन उनके अच्छे मित्र भी थे | चन्दन तैश में भी था और अति आत्मविश्वास में भी | खुले आसमान पर उड़ने वाले चन्दन को  उस वक्त  धरती घूमती हुई नज़र आयी जब सिन्हा सर ने उसे गणित के लिए ट्यूशन देने से मना कर दिया | 

त्रिपाठी सर ने चन्दन को सन्देश भिजवायाथा कि अगर वह चाहे और आगे पंगे न लेने का आश्वासन दे तो कृष्णा कोचिंग के द्वार  उसके लिए अब भी खुले हैं | मगर चन्दन के स्वाभिमान ने उसे पलटना नहीं सिखाया था | उसका दृढ निश्चय था कि अगर जरुरत पड़ेगी तो वह खुद ही, अकेले तैयारी करेगा | चन्दन की इस हठधर्मिता से मानो भगवान भी नए पुल बनाने  पर मज़बूर हो गए | 

संयोग यह कि उन्हीं दिनों रसायन के झा सर, गणित के गनी  सर और भौतिकी के त्रिपाठी सर ने मिलकर अपनी कोचिंग संस्था खोल ली | 

चन्दन के लिए यह वरदान ही था कि वह कक्षा के अंदर  भी झा सर और गनी सर से पढता था और कक्षा के बाहर भी | अतएव भ्रम की कोई स्थिति नहीं थी | उस साल प्री -इंजिनीयरिंग में गिने चुने लोगों को दाखिला मिला था |  जब परिणाम निकला तो चन्दन ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था ," पी.  ई.  टी. में तो नहीं हुआ पर पी. पी. टी. में हो गया ... | " वाकई एक ही शिक्षकों से पढ़ने का सुअवसर देकर भगवान् ने उसकी मदद ही की थी | 

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तो सार यह था - वह चन्दन ही था जिसने सब लोगों को मिलाने का कार्य किया था | लेकिन जहाँ सब लोग जमा हुए, वह स्वतः अलग हो गया |  

दिन के सम्मिलन के बाद सबने योजना बनाई कि सब मित्र शाम को पुनः मिलेंगे | कौशलेन्द्र किसी कारणवश सुबह आ नहीं पाया था | इसलिए उसने ही शाम को 'भिलाई क्लब' में, जिसका वह अध्यक्ष था, फिर से मिलने की पेशकश की | 

ऐसा नहीं था कि सारे लोग, जो सुबह मिले थे, शाम में भी आये | बहुतों ने मना कर दिया | मना करने वालों के अपने-अपने दर्द  थे | कुछ लोगों ने पारिवारिक कारण बताया क्योंकि यह कोई पारिवारिक सम्मिलन नहीं था | वैसे भिलाई विद्यालय के छात्रों का पारिवारिक सम्मिलन कभी हो भी नहीं सकता था | वैसे कुछ लोगों का मानना था कि 'भिलाई क्लब' में सांध्य - मिलन का कार्यक्रम आयोजित करना  एक गलती की , क्योकि अधिकांश  भिलाई विद्यालय के मित्र भिलाई इस्पात संयंत्र में अफसर नहीं थे | सामान्य दिनों में भिलाई क्लब के द्वार अफसरों के लिए ही खुलते थे | इसलिए, वे मित्र असहज महसूस कर रहे थे | 

चन्दन के न आने का कारण सबसे जुदा  था | चन्दन अफसर श्रेणी में भी था, उसका कोई पारिवारिक कारण भी नहीं था और वह कौशलेन्द्र के काफी करीब था - भिलाई विद्यालय के दिनों से ही | उस समय भांप पाना कठिन था, लेकिन सच तो यह था कि विनोद धर के मज़ाक से, जिसे वह प्राथमिक शाला में किसी तरह आत्मसात कर लेता था,  वह काफी आहत हुआ था | 

जब रात के अँधेरे में, भिलाई क्लब के एक कोने में बैठे मित्र पुराने दिनों की चीर-फाड़ कर रहे थे , यह असंभव था कि चन्दन का उल्लेख न आये | कुछ अति उत्साही लोगों ने आशा नहीं छोड़ी थी | जब भी चन्दन का उल्लेख आता , उसे फोन खड़का देते थे | धाक के तीन पात - चन्दन का  फोन शाम से ही बंद था | 

"छोड़ न यार, चन्दन को |"

और लोग चन्दन  को छोड़ देते | मगर फिर बेताल की तरह चन्दन महफ़िल में लौट आता | जिनको चढ़ चुकी थी , वे अपने किस्से सुना रहे थे | जो नहीं पी रहे थे, वे उन किस्सों में सच्चाई और 'फोक' का प्रतिशत निर्धारित करते थे | 
बात मारपीट पर आयी | डी. मधु ने एक किस्सा सुनाया कि कैसे उसने तीन सर लोगों की एक साथ पिटाई की थी | मारपीट के वार्तालाप के इस दौर में चन्दन का लौटना स्वाभाविक था | तब उसने चन्दन का एक किस्सा सुनाया ... | यकीन मानिये, लोग दम साधे सुनते रहे ... |  जो चौथे आसमान में उड़ रहे वे भी, सातवीं आसमान वाले भी और जो धरातल पर थे वे भी ... | किस्सा ख़त्म होने के बाद भी कुछ समय तक ख़ामोशी छायी रही | 

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विनोद धर वहीँ नहीं रुका | उसके अंदर का बच्चा हमेशा सक्रिय रहा | सम्मिलन के बाद सूर्य ने सभी छात्रों के फोन नंबर लिए और विद्यालय के मित्रों का एक व्हाट्स -एप ग्रुप बना डाला | सूर्य खुद ही उसका संचालक बन गया | चन्दन के प्रति विनोद धर की चुहल जारी थी | संचालक होने के नाते सूर्य ने अनेकानेक बार विनोद को टोका, पर विनोद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था | कई बार उसके इन चिढ़ाने वाले सन्देश में आत्मीयता और अंतरंगता झलकती थी ,"कालू मेरा भाई है| " एक बार उसने रंग पर न चिढ़ने के लिए चन्दन को नसीहत दे डाली," अरे गर्व से कहो, हम काले हैं तो क्या हुआ, दिल वाले हैं | तुम हम पर भरोसा कर सकते हो, क्योंकि हम काले रंग नहीं बदलते हैं |"

विनोद को समझाने वाले सूर्य ने कुछ समय बाद खुद ही ग्रुप छोड़ दिया, लेकिन सब कुछ बर्दाश्त करके भी चन्दन जमे रहा | वैसे सूर्य के ग्रुप छोड़ने के पीछे चन्दन के अलावा दूसरा कारण  भी था | कई लोग सांप्रदायिक और विद्वेष फैलाने वाले सन्देश ग्रुप में प्रेषित करते थे | उनकी संख्या दिन दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रही थी | कुछ सन्देश तो इतने ज्यादा उद्वेलित करने वाले थे कि मैंने भी लोगों को मना किया | और एक दिन अटकलों का भण्डार पीछे छोड़कर स्वयं  संचालक ने ही ग्रुप छोड़ दिया | 

सूर्य के जाने के बाद विनोद ने चन्दन के प्रति व्यक्तिगत टिप्पिणी करना करीब करीब बंद कर दिया | हाँ, अब वह भी सांप्रदायिक सन्देश भेजने वालों की सूची में शामिल हो गया | बल्कि कुछ ही दिनों पश्चात् वह सांप्रदायिक विद्वेषपूर्ण सन्देश भेजने में सबको मीलों पीछे छोड़कर काफी आगे निकल गया | 

चन्दन के सन्देश ज्यादातर अग्रेषित ही होते थे, जिनमें संयंत्र की अलग-अलग गतिविधियों का जिक्र होता था | ज्यादातर सन्देश अफसरों के कार्यक्रम, कार्यवाही और क्रियाकलाप के ही होते थे, जो मेरे कभी पल्ले नहीं पड़ते थे | शायद जो लोग भिलाई इस्पात संयंत्र के बाहर थे, उनमें से किसी को भी उन खबरों से न तो कोई सरोकार था और न ही कोई दिलचस्पी | मगर बिना पढ़े सन्देश मिटाने के लिए प्रयास ही कितना पड़ता है ? वैसे चन्दन को किसी ने टोका तो नहीं, मगर मैं किसी भी दिन टपकने वाली मुसीबत स्पष्ट देख रहा था | 

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देखते ही देखते एक साल और गुज़र गया | जब मैं सर्दियों में भारत आया तो मन में एक उत्साह सा था कि एक बार फिर पिछले साल की तरह सम्मिलन आयोजित किया जाए | पिछले वर्ष कई ऐसे मित्र थे जो सम्मिलित नहीं हो सके थे | इस बार सारे लोग मिलते हैं | फिर दूसरा विचार यह भी मन में आया कि शाला क्रमांकआठ के सहपाठी ही मिल लेते हैं | 

इन कर्यकलापों के लिए एक ही संपर्क सूत्र मेरे दिमाग में था - चन्दन | पिछली बार की तरह वही सबकी खोज खबर ला सकता है | अगर शाला नंबर आठ के मित्र मिल पाएं तो अति उत्तम, वरना भिलाई विद्यालय का आयोजन तो कहीं गया नहीं है | 

दांतों के दर्द ने मुझे अमेरिका में काफी परेशान किया था | इस बार मैंने सोचा था कि भारत के ही किसी दन्त चिकित्सक को दिखा दिया जाए | अगर शल्य क्रिया की आवश्यकता पड़ी, तो वह भी करा लिया जाए | अभी डॉक्टर दंपत्ति को आने में थोड़ा समय था | दूसरी तरफ की सीढ़ियों के पास खड़े होकर मैंने चन्दन को फोन लगाया |  मैंने तो दोस्त चन्दन को फ़ोन लगाया था, लेकिन दूसरी तरफ से बिफरे हुए शेरू की आवाज़ सुनाई दी | 

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मुझे पूरा विश्वास था कि चन्दन भले भिलाई विद्यालय के पुनर्मिलन के लिए न माने, लेकिन प्राथमिक शाला क्रमांक आठ के लिए अवश्य मान जायेगा | उसे मैं मना लूंगा | उसे समझा लूंगा कि विनोद  के मन में कोई दुर्भाव नहीं है | उसके मन में शाला क्रमांक आठ का शरारती बच्चा अभी भी बैठा है | अगर वह चन्दन का मज़ाक उड़ाता था तो उसमें उसका प्यार भी शामिल था | साथ मुझे सूर्य प्रकाश की ये बात भी ध्यान में थी कि "शाला क्रमांक आठ काफी पीछे छूट गया है | वो जो हम थे, वो अब नहीं हैं |" इस गलत-फहमी को दूर करने का पहला और आखिरी मौका भिलाई विद्यालय के पिछले वर्ष का 'गेट-टुगेदर' ही था, जब इस मन मुटाव ने जन्म ही लिया था | मैंने उसे हलके में लिया था | अब उसे मिटाने का एक ही तरीका था कि दोनों की आमने-सामने मुलाकात करा दी जाये | और इसके लिए शाला क्रमांक आठ का पुनर्मिलन आवश्यक था | शायद उस इमारत की छाया में, शायद खेल के मैदान के घास की खुश्बू में, शायद राजीव सिंह की उपस्थिति में  बात बन जाए | 

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लेकिन चन्दन की कार में हम कहाँ जा रहे थे ?

"यहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र के बड़े-बड़े अधिकारी रहते हैं | "सी ईओ, एम  डी, इ डी ...  | कभी आया था यहाँ ?"

अगल-बगल बड़े अधिकारियों के बड़े-बड़े बंगले थे | सच बात तो यह थी कि मुझे यह भी पता नहीं था  कि ऐसा कोई क्षेत्र भी भिलाई मेँ  है | इन गलियों से तो मैं कभी गुजरा नहीं था | लेकिन चन्दन कब से इन गलियों से गुजर रहा है ?  जितना मैं उसको जनता था, ये तो कभी भी उसके स्वाभिमान और स्वच्छंद प्रकृति से मेल नहीं खाता था | 

कार चलाते-चलाते चन्दन ने मुझे झकझोरा | 

"अबे, बोल तो - हाँ या ना ?"

"क्या ? क्या हुआ ?"

मैं हड़बड़ाकर बोला | चन्दन कुछ पूछ रहा था | 

"पांडेय सर से मिल लें ?"

"कौन पांडेय सर ?"

"प्लांट के ई. डी. | तुझसे मिल कर खुश हो जायेंगे | उनकी  लड़की  भी अमेरिका में है |"

"पर वो तो समय लेना पड़ेगा ? नहीं?"

"अरे तू क्या बात कर रहा है बे ? ज्यादा अँगरेज़ बन गया है | " 

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उसने गाड़ी एकदम गेट के पास खड़े की और बंद दरवाजे के एकदम पास चले गया |   दरबान चन्दन को देखकर देखकर मुस्कुराया ,"साहब तो अभी गाड़ी लेकर निकल गए हैं |"

"कहाँ ?"

"नौ बज गया सर | प्लांट ही गए होंगे |"

चन्दन को थोड़ी निराशा जरूर हुई | फिर वापिस आकर उसने गाड़ी बढ़ाई , "चल, तुझे सेनगुप्ता से मिलता हूँ |"

" छोड़ यार चन्दन | तेरी लड़की की  ट्रेन का टाइम हो रहा है |"

"चल | पांच मिनट बैठेंगे | सेनगुप्ता से अपने फॅमिली जैसे सम्बन्ध हैं |"

यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सेनगुप्ता सर दिल्ली गए हुए थे | मैंने चन्दन को फिर उसकी पुत्री की रेलगाड़ी की याद दिलाई | 

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चन्दन से यह सवाल पूछने की प्रबल इच्छा हुई थी कि उसके व्यवहार में इस तरह का काया-कल्प अचानक कैसे हो गया ? क्या उसने अपने व्यवहार में आमूलचूल परिवर्तन ही स्वीकार किया है या ये उसका बाह्य रूप ही है ? ये दोनों ही विकल्प मेरे लिए काफी आश्चर्यजनक थे | चन्दन जैसे अंदर था, वैसे ही बाहर था | जो दिल में बात होती थी, वही जुबान पर होती थी | और जो जुबान पर होती थी, वह व्यवहार में होता था | बचपन से ही चन्दन ऐसा था | 

तो क्या उसने यह परिवर्तन ही आत्मसात कर लिया है ? पर कैसे ? अपने स्वाभिमान को चन्दन ने कहाँ रखा होगा ? वह तो इतना बड़ा था कि छुपाये नहीं छुप सकता था ? अचानक ये कैसे हो गया ? 

अचानक मुझे  पिछले वर्ष 'भिलाई क्लब' में डी. मधु की बताई हुई घटना याद आ गयी .... | 

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 जब से चंदन अधिकारी वर्ग में आया था, कोई न कोई अपशकुन उसके पीछे लगा ही हुआ था | अब जब से वह "स्टील मेल्टिंग शॉप -१" में आया था, यह अफवाह जोरों पर थी कि एस. एम. एस. -१ अंतिम साँसें गिन रहा है | किसी भी दिन इसे बंद किया जा सकता है | ऐसा नहीं था, कि अगर यह हो जाता तो चन्दन की नौकरी चले जाती | उसे किसी अन्य डिपार्टमेंट भेज दिया जाता | लेकिन अब वह इधर से उधर फुटबॉल की तरह स्थान्तरित किये जाने से थक चुका था | 

ऊपर से एस. एम. एस. -१ में उसका पाला केसरी साहब से पड़ गया जो उसे फूटी आँखों नहीं सुहाते थे | चन्दन के उग्र स्वभाव के विपरीत केसरी साहब बड़े ही शांत स्वभाव के थे | इतने शांत स्वभाव के कि उनके मातहत उन्हें "गऊ" समझते थे | और यही सब चन्दन को बिलकुल पसंद नहीं था | भला शांत स्वभाव वाला अधिकारी काम कैसे करा सकता था ? तिस पर  उनकी मुस्कान - 'आ हा हा" , क्या कहने ? हर बात का जवाब एक मुस्कान ... | कई बार उसके मन में आया , घुमा के एक झापड़ दे | 

एस. एम. एस. -१ में मधु भी था | हालाँकि मधु का 'हाउस कीपिंग' से दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं था | चन्दन का कार्य क्षेत्र हाउस कीपिंग तक ही सीमित था | वैसे "एस. एम. एस." जैसी जगह में वह भी कोई कम थकाने वाला काम नहीं था | गरमागरम धातु का छलकना आम बात थी | जिस पात्र में पिघली धातु डाली जाती थी, उस पात्र, "लैडल" का पंक्चर हो जाना आम बात थी | ऊपर से चन्दन चुप बैठने वाला इंसान नहीं था | किसी काम में अनुमान से ज्यादा समय लगने पर उसका पारा चढ़ जाता था |  

अगर उसके अंतर्गत काम करने वाले कर्मचारी उसकी तुलना केसरी साहब से करते थे तो कोई गलत नहीं था | लेकिन उनकी कानाफूसी चन्दन के गुस्से में आग में घी का ही काम करती थी | एक न एक दिन टकराव होना ही था | 

शुरू के दिनों में चन्दन को जब मधु ने पुकारा तो चन्दन ने कोई ध्यान नहीं दिया | उसके अभिवादन को भी वह नज़रअंदाज़ कर देता था | मधु को थोड़ा अजीब लगता था, लेकिन इन सब बातों की उसे आदत सी हो गयी थी | चन्दन कोई अकेला नहीं था  और मधु कोई तोप भी तो नहीं था, जिसके अभिवादन का कोई अधिकारी जवाब भी दे | भिलाई विद्यालय की दोस्ती अब सिर्फ याद ही बन कर रह गयी थी | 

फिर धीरे धीरे मधु से चन्दन ने वार्तालाप करना प्रारम्भ किया | जब उसे पता चला कि मधु ट्रेड यूनियन से जुड़ा है, तब वह उससे थोड़ी बहुत बातें करने लगा | वैसे भी मधु उसके अंतर्गत कार्यरत नहीं था और चन्दन को अपनी कुश्किल कहने के लिए किसी अंधे कुएँ की तलाश थी | शाला की दोस्ती में वह अदृश्य ताकत होती है जो किसी भी कृत्रिम भेदभाव को अंततः पिघला ही देती है | 

एक दिन 'एस. एम. एस. -१' में एक लैडल का हत्था टूट गया और ढेर  सारी  पिघली धातु फर्श पर बिखर  गयी | सुरक्षा पर जब प्रश्न चिन्ह तो लगे ही , यह तय था कि अगले कई दिनों तक बड़े-बड़े अधिकारियों का ताँता  "एस. एम. एस. -१"  में लगे रहेगा | यानी "एस. एम. एस. -१" की कार्यशाला एक दर्पण की तरह चमकनी चाहिए | 
और केसरी साहब मुस्कुराये जा रहे थे | चन्दन ने उनसे क्रेन  माँगी | भारी भरकम  लैडल को हाथ से तो नहीं सरकाया जा सकता था |  अब जैसे चन्दन को अपना इलाका चमकाना था, वैसे ही केसरी साहब को भी  अपने क्षेत्र की सफाई करनी थी | 

"लंच के बाद दे दूँ तो चलेगा ?"

"ऐसा कौन सा पहाड़ हटा रहा तू ? " चन्दन बोला | 

अब केसरी फिर मुस्कुराया तो चन्दन भुनभुनाते हुए चले गया |  

लांच के बाद चन्दन फिर हाजिर हो गया | हवा में  अफवाह तैर रही थी  कि दिल्ली से भी कोई टीम आने वाली थी | 
केसरी साहब ने इधर-उधर देखा, फिर मुस्कुराते हुए बोला ,"अरे वर्कर अभी सुस्ता रहा है |"

"कितने बजे मिलेगी क्रेन ?" चन्दन उसकी मुस्कान से अच्छा खासा परेशान था | 

"तीन बजे तक खाली हो पायेगा |" 

"और चार बजे छुट्टी हो जाएगी ?"

जब चन्दन अपने क्षेत्र में लौटा तो देखा, उसके कर्मचारी ताश खेल रहे थे | उसे देखते ही आनन-फानन में लोग खड़े हो गए | उनकी गलती ही क्या थी ? क्रेन तो मिली नहीं थी | 

"अबे चार बजे के पहले आज कोई हिलेगा नहीं |"

"ओवरटाइम मिलेगा बॉस ?" एक कामगार थोड़ी हिम्मत जुटाकर बोला |

चन्दन ने बड़ी मुश्किल से अपना गुस्सा काबू किया | 

 
...और दिन के ठीक तीन बजकर दो मिनट पर ज्वालामुखी फट पड़ा | 

"साले तू अपने आदमियों से काम नहीं करा सकता ? हरामखोरी करता है ?" चन्दन ने एक  फौलादी मुक्का केसरी को जड़ दिया |
 
चन्दन की गमगमाती आवाज़ से डी. मधु वैसे भी चन्दन को शांत कराने उसकी ओर बढ़ ही रह था | अब जब उसने चन्दन को घूंसा जमाते देखा तो डी. मधु  सरपट भागा | वैसे डी. मधु शाला के दिनों में हमारी अजेय १०० मीटर रिले रेस टीम का सदस्य था , फिर भी जब तक वह चन्दन तक कुछ सेकण्ड में पहुँच पाता , चन्दन ने दो भारी भरकम घूँसे  और जड़ दिए | 

"चंदन | क्या कर रहा है यार ?"  डी. मधु ने उसे कस  कर पकड़ लिया | अब तक आस-पास के जो कर्मचारी तमाशा देख रहे थे या  हतप्रभ थे या पद का लिहाज़ करके किंकर्तव्यविमूढ़ थे, उनकी चेतना लौटी और उन्होंने दोनों गुत्थमगुत्था हुए अधिकारियों को अलग किया | 

चन्दन की आँखों से अब भी अंगारे बरस रहे थे | वह बार-बार मधु की गिरफ्त से अपने आप को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था | 

मधु उसे अपने साथ लेकर श्रमिक कक्ष के अंदर घुसा | पीछे-पीछे श्रमिकों के झुण्ड के साथ मधु के बॉस पांड्या साहब भी कमरे में चले आये | 

"चन्दन, पानी पियेगा ? " मधु ने उसे बिठाते हुए पूछा | 

"पानी लाओ रे | मेरे रूम से ठंडा पानी लाओ | " चन्दन के जवाब का इंतज़ार किये बिना पांड्या जोर से चिल्लाया | 

"रिलैक्स सर |क्या हुआ सर ? "  पंड्या साहब ने नरमी से पूछा | 

"सर वो हमको काम के लिए क्रेन नहीं दे रहे थे | " चन्दन का एक श्रमिक बोला | 

"अरे सर | हमको बोलना था | हमारा क्रेन ख़ाली था |" पांड्या बोला ," हम कोई बाहर के थोड़ी हैं सर |"

"सर, ये मेरे स्कूल का दोस्त है |" मधु बोला ,"बहुत अच्छा स्टूडेंट था सर | और  जो  हुआ, काम को लेकर ही हुआ सर | क्यों चन्दन ?"

तब तक एक कामगार ट्रे में कांच के गिलास में पानी लेकर आया |

"ले , पानी पी चन्दन |" मधु ने चन्दन को पानी का गिलास दिया, "बाहर जाओ रे , चलो बाहर | पंड्या सर आप भी बाहर जायेंगे सर ? मैं एक मिनट चन्दन से बात करना चाहता हूँ | प्लीज सर |"

जब सब बाहर निकल गए तब मधु चन्दन के सामने आकर बैठ गया | अब तक चन्दन का पारा कुछ नीचे जरूर गिरा था , लेकिन दिमाग अभी भी गरम था , "साले , सब नौटंकी करते हैं | कौन उनको अधिकारी बना देता है बे ? मुझे बोल | शॉप में एक्सीडेंट हो गया, उसको दिखाई नहीं देता ? "

मधु चुपचाप उसके सामने बैठकर चन्दन की बातें शांति से सुनते रहा | फिर वह नरमी से बोला ,"चन्दन, अपने भाई की एक बात मानेगा ?"

चन्दन उसकी ओर नज़र उठाकर देखा  | एक पल खामोशी छायी रही | उसने भांप लिया कि क्रुद्ध चन्दन के सोचने-समझने की शक्ति धीरे-धीरे वापिस आ रही है | अब उससे व्यवहारिकता की बातें की जा सकती हैं |  कुछ सोचकर फिर मधु बोला ,"तू उससे माफ़ी मांग ले |"

चन्दन बिफर गया ," क्यों? क्यों माफ़ी मांगू ? क्या गलती है मेरी ?अबे, तू पागल हो गया है क्या ?"

"हाँ यार चन्दन | मैं पागल हो गया हूँ | तू माफ़ी मांग ले यार |" 

"क्यों ?"

फिर ख़ामोशी छायी रही | मधु बोला , "तूने देखा न, मैंने सब लोगों को इस कमरे से बाहर भेजा | अपने बॉस को भी | जानता है क्यों ?"

चन्दन ने उसकी ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखा | 

"क्योंकि ये बात मैं उनके सामने नहीं बोल सकता था, जो अब बोल रहा हूँ |"

"कि मैं उससे माफ़ी मांग लूँ ?" चन्दन ने आधे व्यंग्य से कहा | 

"हाँ | माफ़ी मांग ले और मामला ख़तम कर |"

"इन्क्वारी बैठती है तो बैठने दे | मैं डरता नहीं हूँ | क्यों माफ़ी मांगूं ?"

मधु थोड़ा आगे झुककर धीमी आवाज़ में बोला ,"क्योंकि वो 'जाति' वाला है |"

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जाति' एक ऐसा ब्रह्मास्त्र था , जिसने चन्दन को भी सन्न  कर दिया | हिंदुस्तान में 'अनुसूचित जाति' एक ऐसा शब्द है, जिससे लोग थर्रा उठते हैं | चाहे कैसी भी जांच कमिटी बैठे , चाहे उसमें धर्मराज युधिष्ठिर ही क्यों न सम्मिलित हो जाएँ , अगर उसमें एक ओर , केवल एक ही ओर कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति बैठा हो, सबको ज्ञात होता है कि न्याय का पलड़ा किस और झुकेगा ? और ये तो मारपीट का वह मामला था, जिसमें चन्दन चाहे कितना भी कर्तव्यनिष्ठ क्यों न हो , मामले की शुरवात उसने ही की थी | शुक्र था, कि केसरी के सम्बन्ध में जिस बात से  एक विभाग में रहते हुए भी वह अनभिज्ञ  था, वो अन्तर्यामी मधु को ज्ञात थी | 
 
अगले दस मिनटों में लोगों ने 'गऊ' केसरी को भी मना लिया | 

"अब कुछ नहीं होगा |" सारे श्रमिक खड़े थे | मधु ने केसरी का एक हाथ  पकड़ा और चन्दन की ओर बढ़ा दिया | केसरी की मुस्कान पूरी तरह गायब थी | जब दोनों ने हाथ मिलाया तो उसमें गर्मजोशी का पूरी तरह से अभाव था |
 
"अरे ऐसे क्या मुर्दे जैसे हाथ मिला रहे हो ? मर्द जैसे मिलाओ |" एक मज़दूर पीछे से चिल्लाया | 

अगले ही क्षण दोनों की पकड़ मज़बूत हुई | 

"फोटो खींचो रे |" एक मज़दूर चिल्लाया ," गले भी मिल लो साहेब |"
और अगले ही क्षण दोनों गले मिल रहे थे | मज़दूरों ने जोर से 'हो, हो' की आवाज़ की सारे गले शिकवे धुल रहे थे | कुछ लोग काल्पनिक कैमरे से तस्वीर लेने का अभिनय कर रहे थे |  अचानक चन्दन को जोश आ गया | उसका वह जोश शाला नम्बर आठ के उस जोश से मिलता जुलता था, जब नाराज़ चन्दन को भोला गिरी या सुरेश बोपचे मनाते थे और वह विनोद धर को हवा में उठा लेता था | 

ठीक वैसे ही चन्दन ने अभी किया | जैसे होली में दोस्त एक दूसरे को जोश में उठा लेते हैं वैसे ही चन्दन ने केसरी को जोश में उठा लिया | 

...और तभी, ठीक उसी क्षण , एक भूकंप आया जिसने चन्दन की ज़िन्दगी की चूलों को हिला दिया ... | 

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प्राथमिक शाला क्रमांक आठ के प्रमोद मिश्रा की तो आप भूले नहीं होंगे | (देखें , 'च' से चन्दन - भाग १ , भाग-२ )

दिन भर का काम ख़तम करके  प्रमोद मिश्रा घर जाने की तैयारी कर ही रहा था कि उसके फोन की घंटी घनघना उठी | दूसरी तरफ से मधु की घबराई हुई आवाज़ थी | 

"क्या कहा ? चन्दन ने पटक दिया ? " प्रमोद मिश्रा कुछ समझा नहीं | 

"नहीं यार | जान बूझकर नहीं पटका | समझौता होने के बाद कुछ ज्यादा जोश में आ गया था | ख़ुशी से उसने केसरी को हवा में उठाने की कोशिश की | मगर केसरी भारी था |चन्दन भी तो मोटा ही है | चन्दन खुद भी गिरा और केसरी को भी पटक दिया |"

"और केसरी का पाँव टूट गया ?"

"उसने  सब कुछ कागज़ पर लिखकर छावनी थाना में एफ. आई. आर. के लिए फैक्स कर दिया है यार |   'एफ. आई. आर. के बाद चन्दन बुरी तरह फँस जाएगा |"

"हाँ यार | केस लम्बा खिंच जाएगा |"

"केसरी 'जाति' वाला है |"

"क्या ?" प्रमोद को मानो बिच्छू ने डंक मारा हो | 

"' हाँ यार | केसरी' जाति' वाला है | अगर कोर्ट केस हो गया तो ... "

आगे कुछ भी कल्पना कर पाना मुश्किल था | प्रमोद तुरंत घटना स्थल के लिए निकल गया | 

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चन्दन के दो भाई याद हैं आपको या भूल गए ? चन्दन और विजन ? जिन्होंने उसे पहली कक्षा में बहुत बड़े संकट से बचाया था  (  'च' से चन्दन - भाग १ )? कहना मुश्किल है कि वह संकट ज्यादा गहरा था  या यह संकट ?दोनों ही मौकों 'विशेष ' लोग ही चन्दन के क्रोध का शिकार हुए थे |  पर एक बार फिर दोनों भाइयों के कन्धों पर बहुत भारी जिम्मेदारी आ गयी थी | 

ट्रेड यूनियन में सक्रिय होने के कारण प्रमोद मिश्रा की भी बड़े-बड़े  अधिकारियों से जान पहचान थी | उसने भी मामले को ठंडा करने के लिए पूरी जान लगा दी | 

दोनों भाई तरक्की की सीढ़ी पर एक -एक कदम रखते हुए काफी ऊँचे पहुँच गए थे | इतने ऊपर कि मैनेजमेंट में उनकी अच्छी साख थी - ठीक वैसे ही साख, जैसे प्राथमिक शाला में बड़ी बहनजी के सम्मुख थी | 

लेकिन काम उतना आसान भी नहीं था |  पुलिस तो भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं आती थी - वह कार्यवाही करने को स्वतंत्र थी | बात अभी तक 'जाति' वालों की संस्थाओं तक नहीं पहुंची थी | समय बहुत कम था | अगर सूचना-माध्यम के ठेकेदारों को भनक भी लग जाती तो बवाल मचना स्वाभाविक था | पूरे क्षेत्र में बात फ़ैल जाती और हो सकता था कि इसकी आंच राज्य की सीमायें लांघकर राष्ट्र तक पहुँच जाती | 'जाति' से सम्बंधित मुद्दे स्वतः ध्यान आकृष्ट कर लेते हैं | चाहे समाचार प्रकाशित-प्रसारित करने वाले हों, राजनीतिक दल हों या समाज सेवी संस्थाएं | 

विपत्ति का समय था और 'गऊ' केसरी टस से मस नहीं हो रहे थे | पांव से ज्यादा उनके दिल पर चोट लगी थी | 

उसको इस बात से कोई मत्तमतलब नहीं था कि किस स्तर की जाँच कमिटी बनती है | उसकी नज़र में यह जाँच का विषय था ही नहीं | इतने सारे प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य थे तो 'नाटक' की क्या जरुरत थी ? चन्दन को तत्काल बर्खास्त करके जेल भेजा जाए | 

चन्दन को बर्खास्त तो नहीं किया गया, पर तत्काल प्रभाव से लम्बे अवकाश पर भेज दिया गया | प्रमोद मिश्रा ने अपने निजी संपर्क का उपयोग करके छावनी थाना पर एफ. आई. आर. दर्ज होने से रुकवा दिया | अपने 'ट्रेड यूनियन' के कार्यकर्ताओं को सचेत करके रखा कि वे अखबार के संवाददाताओं पर निगाह रखें और अगर कोई आस-पास फटकता नज़र आये तो उसे तुरंत सूचित करें | 'ट्रैड यूनियन' में संलग्नता के कारण प्रबंधन के कई उच्च अधिकारीयों से उसकी जान-पहचान थी | उनसे वह चन्दन की बात रखने गया | उसके मिलने के पूर्व ही दीपक और विजन उनसे मिल चुके थे | इसलिए उसे चन्दन की उत्कृष्ट छवि रखने में आसानी ही रही | 

अब 'गऊ केसरी' को मनाना था | 'दंड' और 'भेद' का यहाँ  काम नहीं था | 'साम' का उपयोग करके उसे बताया गया कि चन्दन उसके समानांतर कार्य नहीं करेगा | उसका स्थानांतरण किया जा रहा है | अगर केसरी चाहे तो उसे दूसरे स्टील प्लांट भेजा जा सकता है पर उसकी दो छोटी बच्चियां हैं | 

फिर 'दान' का उपयोग किया गया | भिलाई इस्पात संयंत्र में पदोन्नति एक बहुत बड़ा प्रलोभन होता है | केसरी को कहा गया कि उसकी  त्वरित  पदोन्नति की जायेगी | और न जाने क्या क्या ? 

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एक लम्बे अंतराल के बाद चन्दन काम पर लौटा | केसरी को दिए आश्वासन के अनुसार उसका विभाग अब बदल दिया गया था | प्रमोद मिश्रा ने अनुरोध किया था कि उसकी अन्य परेशानियां देखते हुए उसे कोई 'हलके' विभाग में डाल दिया जाए | अब वह सुरक्षा विभाग में था | उसे अब सब कुछ नया नया और खोया खोया सा लग रहा था | 'एस. एम. एस. -१' में वह अपना सामान लेने आया था | उसके अंतर्गत जो कर्मचारी थे, वे अभी किसी और के नीचे काम कर रहे थे | सभी अपने काम में व्यस्त थे | कोई उससे नज़रें नहीं मिला रहा था, या यूँ कहा जाए, चोरी छिपे नज़रों से देख रहा था और  उसके मार्ग से अलग हट जाता था | 

कोई तो उसे पुकारे | कोई तो उसका हाल-चाल पूछे | 

"चन्दन", दूर से मधु ने आवाज़ दी | 

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एक बार फिर मधु के कर्मचारी कक्ष में मधु और चन्दन अकेले ही बैठे थे | चन्दन सुबह से अलग-अलग लोगों की अलग-अलग बातें सुन रहा था | किन्हीं की बातों में नसीहत थी तो किन्हीं की बातों में धमकी | चन्दन के लिए दोनों तरह की बातें अस्वीकार्य थी पर उसने कड़वे घूँट की तरह उन्हें पी लिया था ,क्योंकि वे सब शीर्ष अधिकारी थे | पहली बार कोई निचले स्तर का व्यक्ति उससे बात कर रहा था | 

"जाने दे यार चन्दन | अब अपना काम कर | पर काम के लिए जान मत दे दे | और  किसी के मुँह क्या लगना भाई ?  अब तू अधिकारी वर्ग का है यार | ये सब क्यों करता है ? ऐसी-वैसी को बात हो तो हमको बता न भाई | हम लोग किस लिए हैं ? देख, हम लोग तो मज़दूर थे , मज़दूर हैं  और एक दिन मज़दूर रह  कर ही रिटायर भी हो जायेंगे | है कि नहीं ? हम लोगों को कोई डर नहीं, कुछ ऊपर नीचे हुआ तो हमारे पीछे यूनियन खड़ी है | इसलिए हम चिंता नहीं करते | मगर तू अपना देख ले भाई | तेरे पीछे कौन खड़ा है ? "

पीछे  ... कौन  .... खड़ा .... है ....?
कौन  .... खड़ा .... है ....?
कौन .... ?
.....??

चन्दन ने महसूस किया | हाँ, वह अकेला ही तो खड़ा था | उसके सामने एक लम्बा रास्ता है | पर वह अकेला नहीं खड़ा है | उसके एक ओर उसकी छोटी लड़की है और दूसरी ओर बड़ी लड़की | और पीछे ? पीछे तो कोई नहीं है | 

अचानक चन्दन को अपने कन्धों पर दर्द महसूस हुआ | उसके कंधे पर मानो कई टन भार रखा है | वह अहसानों के बोझ से दबा हुआ है | शीर्ष प्रबंधन के कई अधिकारियों के अहसानों का बोझ !! 

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तो चन्दन के अगल-बगल खड़ी दो बच्चियों में से एक, अपने  बैग के साथ हमारे साथ स्टेशन जा रही थी | चन्दन कार चला रहा था | चन्दन की सुपुत्री सूचना तकनीकी में स्नातक की पढ़ाई कर रही थी | क्रिसमस और नए वर्ष की छुट्टी के पश्चात् वह छात्रावास वापिस जा रही थी | चन्दन ने मुझसे कहा था कि मैं उसे भविष्य के लिए कुछ मार्गदर्शन दे दूँ | मैं भी उससे बीच बीच में पढ़ाये जाने वाले विषयों में सम्बन्ध में पूछ रहा था | सूचना तकनीकी ऐसा क्षेत्र है , जिसमें अभी तक स्थावित्व नहीं आया है | किसी भी विषय के अप्रचलित होने में वक्त नहीं लगता | चन्दन का भय अपनी जगह सही था | बच्चों को वो विषय न पढ़ाने जाने चाहिए | यदि पढ़ाये जाते हैं तो बच्चे उन विषयों से दूर रहें | और अगर बाकी बच्चे वे विषय ले रहे हैं तो अपने बच्चे सजग रहें | मैं उससे कुछ पूछ रहा था और उसका जवाब सुनकर बीच -बीच में चन्दन कुछ प्रश्न करता तो हम दोनों उसे समझाने की कोशिश करते | 

आधा रास्ता निकल चुका था | अचानक चन्दन की सुपुत्री ने कहा,"पापा, मैं अपने कमरे की चाभी भूल गयी | "

"ओह", चन्दन ने बहुत ही प्यार से पूछा ,"क्या करें बेटा ?"

वह काफी सकपकाई हुई थी | 

"वापिस चलें ?" चन्दन ने पूछा | 

कोई जवाब नहीं ....| 

"कहीं रेलगाड़ी न छूट जाये | "मैंने सलाह दे डाली ,"रूममेट के पास तो होगी न चाभी ? वहाँ पहुंचकर डुप्लीकेट बनवा लेना |"

कोई जवाब नहीं ...| 

चन्दन ने घड़ी में समय देखा और आगे के चौक से गाडी मोड़ ली | फिर विपरीत दिशा में तेज़ गति से गाडी दौड़ा दी | 
घर पहुँचकर चन्दन ने कहा, "जाओ तो बेटा | देखो तो चाबी कहाँ है ? अगर पाँच मिनट में न दिखे तो लौट आना |"

चन्दन की बात ख़तम होने के पहले ही वह अंदर दौड़ पड़ी और अगले ही क्षण चाभी लेकर आ गयी | 

"मिल गई पापा |"

चन्दन ने कुछ नहीं कहा और तेजी से गाड़ी स्टेशन की ओर दौड़ा दी | देखते ही देखते हम लोग स्टेशन पहुँच गए | 
गाडी स्टैंड पर लगाकर चन्दन ने बेटी का बैग पकड़ा और पार्किंग का टिकट लिए बिना प्लेटफार्म की ओर लपका | मैं देख कर हैरान था | इतने मोटे  चन्दन में यह फुर्ती और ऊर्जा कहाँ से आ गयी | 

सूचना पटल पर ट्रेन के  प्रस्थान समय में कोई अंतर नहीं था | 

"मैं पलटफोर्म टिकट लेकर आता हूँ |" मैंने कहा | 

चन्दन ने मेरी बात सुनी-अनसुनी की और वह तेज़ी से स्टेशन के अंदर चले गया | 

मैं दो प्लेटफार्म टिकट लेकर अंदर पहुंचा | सीढ़ियां चढ़ते उतरते  जब ट्रेन के पास पहुंचा तो एक डिब्बे के बाहर चन्दन पसीना पोंछते दिख गया |  उसने हाथ उठाकर मुझे आवाज़ दी | 

उसने अपनी सुपुत्री से काफी कोमलता से इतना ही कहा ,"ऐसा नहीं करते बेटा |"

थोड़ी ही देर में मंथर गति से ट्रैन चल दी | चन्दन उदास आँखों से उसे जाते हुए देखता रहा | क्या ये वही चन्दन नहीं था जो बचपन में उस दिन बिजोरिया बहनजी की बिटिया की रुलाई नहीं देख पाया था ?

करीब एक वर्ष पूर्व मैं चन्दन से इसी रेलवे स्टेशन पर एक लम्बे अंतराल के बाद पहली बार मिला था | आज मैं चन्दन के साथ उसी प्लेटफार्म में चलकर वापिस जा रहा था | मुझे थोड़ा भी गुमान नहीं था, कि ये मेरी चन्दन के साथ आखिरी मुलाकात है | 

"ठीक है यार चन्दन |" मैंने कहा,"मैं टेम्पो पकड़ कर जाता हूँ |"

"अरे चल बैठ |" चन्दन बोला ,"तुझे मैं छोड़ देता हूँ |"

"नहीं यार |" मैंने कहा, "तुझे भी प्लांट जाना है | मैं निकलता हूँ |"

"ठीक है |" चन्दन ने ज्यादा प्रतिवाद नहीं किया ,"अपन फिर मिलेंगे | अब मैं जाऊँ ?"

और चन्दन निकल गया - अपने चिर-परिचित रास्तों पर | 

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चिर-परिचित रास्तों पर - वे शुरू में चन्दन के लिए अनजान ही थे | जिन रास्तों पर चन्दन ने चलना शुरू किया , वह कोई गैर कानूनी नहीं था | न ही किसी दृष्टि से अनैतिक था | सवाल सिर्फ इतना ही था कि क्या वह चन्दन की स्वच्छंद और स्वाभिमानी प्रकृति से मेल खाते थे | 

मधु ने चन्दन को अहसास करा दिया था कि उसके पीछे कोई नहीं है | श्रमिक वर्ग का ख्याल तो श्रमिक संगठन रख  लेते हैं | जो लोग सीधे प्रबंधन वर्ग में आते हैं उनका अपना ही वर्ग रहता है | ठीक है, उनमें जबरदस्त प्रतिद्वंदिता रहती है , लेकिन वे एक दूसरे का हाथ पकडे रहते हैं | एक साथ तैरते हैं, एक साथ डूबते हैं, एक साथ उबरते हैं | ठीक सिन्हा सर और त्रिपाठी सर जैसे !

 लेकिन जो परिश्रम करके अपने सामर्थ्य के बल पर अधिकारी बनते हैं, उनका कोई नहीं होता | न तो वे श्रमिक जिनके बीच से वे ऊपर उठते हैं, उनके अपने  होते हैं और न ही ऊपर से टपके अधिकारियों का  वर्ग उन्हें स्वीकारने को तैयार होता है | उन्हें अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है | चन्दन ने यह देख ही लिया था | सिर्फ संपर्क की वजह से वह एक दुष्चक्र में फंसने से बचा था | अब उसे उन संपर्कों को और प्रगाढ़ करना था | 

भारत में प्रबंधन में जमे लोगों को ऐसे ही वर्ग की तलाश रहती है | उनके कार्य कलापों की सूची में एक कार्य हरदम जुड़ा रहता है - राजनीति | 

उन्हें ऐसे पदोन्नति प्राप्त अधिकारियों की सख्त आवश्यकता होती है जो श्रमिकों और उनके बीच एक सेतु का काम कर सकें | ताकि वे उनकी आवाज़, लक्ष्य, मंसूबे श्रमिकों तक पहुंचा सकें और श्रमिकों की भावनाएं , समस्याएं ,'मूड' उन तक पहुँचा सकें | क्योंकि पदोन्नति से बने अधिकारी  श्रमिकों के बीच से ही ऊपर उठते  हैं , उनके संवाद और सूचनाएं ज्यादा विश्वसनीय होती हैं | 

लेकिन होता यही है कि फिर उनकी खुद की छवि संशय के दायरे में आ जाती है | उनकी कोई भी उपलब्धि को उपहास के चश्मे से देखा जाता है | 

लेकिन मधु ने ठीक ही तो कहा था | अगर सीढ़ी में ऊपर चढ़ना है तो नीचे नहीं देखना चाहिए | चढ़ते सूरज को नमस्कार करने वाले लोगोँ  की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है | 

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एक दिन ये होना ही था | 

अमेरिका के पश्चिमी तट पर उस दिन सुबह ही हुई थी |  भारत में  शाम हो रही थी | उठकर एक आदत सी बन गयी है | भगवान से पहले "व्हाट्स -एप" याद आता है | जैसे ही मैंने "भिलाई विद्यालय" के सन्देश देखे, तो चौंक गया | संदेशों का एक बड़ा पुलिंदा मेरी नज़रों के सामने था | अब भी तीव्र गति से सन्देश आ रहे थे | मैं संदेशों को सरकाते हुए जड़ तक जा पहुँचा | दरअसल चन्दन ने किसी अधिकारी से सम्बंधित कोई सन्देश अग्रेषित किया था | 

कोई बहुत अजूबा हो ऐसी बात नहीं थी | चन्दन अक्सर ऐसा  करते रहता था | मैं ही नहीं, अधिकतर लोग बिना पढ़े ही मिटा देते थे | लेकिन इंदरजीत ने कोई टिप्पिणी कर दी और चन्दन को वह बात नागवार गुज़री  | चन्दन ने चाहे जितना अपने आपको परिवर्धित किया हो, अपनी चमड़ी मोटी नहीं कर पाया था | उसने अपनी तरफ से चुभने वाला कोई उत्तर दिया जो न केवल इंदरजीत बल्कि कई अन्य लोगों को चुभ गया | बस फिर क्या था ? सब चन्दन पर टूट पड़े थे | बाकी सब तो कुछ देर में हट गए, लेकिन चन्दन और इंदरजीत का द्वंद्व चलते रहा | जैसे जैसे मैं संदेशों के ढेर में नीचे उतरते गया, मैंने देखा अब वह कीचड उछालने से ज्यादा निचले स्तर पर उतर गया था | अब वह पद के अभिमान, जलन से नीचे उतर कर "औकात" और "बेलचागिरी" पर आ गया था | हालाँकि ये दोनों अपने-आप में भारी भरकम शब्द थे और सामान्य सार्वजानिक वार्तालाप में कम ही प्रयोग में आते हैं , लेकिन अभी तो धड़ाधड़ उछल रहे थे | मसलन दोनों एक दूसरे को 'औकात' दिखा रहे थे | 

"क्या कर रहे हो यार ? क्यों लड़ रहे हो ? तुरंत बंद करो |" मैं बीच में कूदा | 

प्रतीक भोई उस समय भिलाई विद्यालय ग्रुप का संचालक था | वह भी तुरन्त हरकत में आया | 

"गलत बात मित्रों | " प्रतीक भोई ने लिखा ,"कृपया संयम बरतें |" 

वहाँ जहाँ गोलियां चल रही हों, वहाँ शांति की अपील भला कितनी प्रभावशाली होती | 

"एडमिन यार | इन्हें कुछ समय के लिए बाहर कर दो |" मैंने सुझाव दिया | 

तुरंत चन्दन का जवाब आया,"विजय भाई | मुझे बाहर निकालो | ये सब मेरी तरक्की से जलते हैं @#@$ |"

अगले ही क्षण प्रतीक भोई ने चन्दन को बाहर कर दिया | 

"चुप बे @#$@ |" इंदरजीत ने अपनी रौ में जवाब दिया | और अगले ही क्षण प्रतीक भोई ने इंदरजीत को भी बाहर कर दिया | 

ग्रुप में सुई-पटक सन्नाटा छा गया | उसके बाद चन्दन से पूरी तरह संपर्क टूट गया | काफी दिनों बाद इंदरजीत तो ग्रुप में वापिस आया लेकिन चन्दन ने मना ही कर दिया | बीच बीच में विनोद धर जरूर मांग करता था, "यार मेरे दोस्त चन्दन को वापिस ले आओ | " शायद चन्दन का चुप रहना उसे भी खल रहा था | लेकिन चन्दन वापिस नहीं आया | 

एक दिन वह ग्रुप ही समाप्त हो गया | जिस तरह से खतरनाक राजनैतिक सन्देश उसमें आया करते थे, किसी भी दिन उसका दम निकलना स्वाभाविक था | 

उसके बाद मुरली ने एक दिन सबको इकठ्ठा कर लिया | और एक नया ग्रुप बनाया | चन्दन को भी किसी तरह उसने मना लिया | इंदरजीत भी उसमें था और विनोद भी | 
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चन्दन जिस पर जान छिड़कता था, उससे उसका भरपूर लगाव होता था | याद है, दिल के करीब की तस्वीरें ?
और डॉक्टर कौशलेन्द्र उसका सबसे करीबी मित्र था | डॉक्टर कौशलेन्द्र  चुनाव में खड़े हुए थे | चन्दन ने उनका पोस्टर एक दिन "व्हाट्स-एप" ग्रुप में डाला | फिर दूसरे दिन और फिर तीसरे दिन ... | यह तो निश्चित था कि  हमारे ग्रुप के सारे लोग, जिन्हें मताधिकार प्राप्त था , डॉक्टर कौशलेन्द्र को ही अपना मत देते | वोट कहीं जा भी नहीं सकते थे |  डॉक्टर कौशलेन्द्र को हम लोग भिलाई विद्यालय के दिनों से जानते थे | कोई भी प्रत्याशी उससे ज्यादा कर्मठ और ईमानदार हो ही नहीं सकता था | 

लेकिन चन्दन था कि डॉक्टर कौशलेन्द्र का विज्ञापन व्हाट्स-एप में प्रतिदिन डाले ही जा रहा था | 

एक दिन मैंने चन्दन के पोस्टर को टैग करके मज़ाक में  लिख मारा ,"देख लेना | चुनाव के बाद कौशलेन्द्र बदल जायेगा |"

और चन्दन मुझ पर बरस पड़ा ,"विजय तुम दोस्त हो या दुश्मन ? तुरंत अपना पोस्ट डिलीट करो |"

अब चन्दन का गुस्सा तो जग जाहिर था | मैंने हँसते-हँसते पोस्ट हटा भी दिया | 

दिल में सिर्फ यही कसक रही, ये चन्दन के साथ मेरा आखिरी संवाद था | पता भी नहीं चल पाया कि चन्दन ने माफ़ किया या नहीं | 

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महाप्रयाण के मात्र चार दिन पूर्व मुरली और अजय कौशल की चन्दन से मुलाकात हुई थी | 

न तो कोई प्रयोजन था और न कोई उद्देश्य | बस, घूमते फिरते चन्दन के  घर जा पहुँचे | घर में अन्धकार था | मुरली ने घंटी बजाई | फिर एक बार घंटी बजाई | तीसरी घंटी में उसकी श्रीमती जी ने दरवाजा खोला | 

"शायद अपने भाई के घर गए हैं |" उन्होंने सूचित किया | 

वे घर से निकलने ही वाले थे | फिर सोचा उससे फोन पर ही बात कर ली जाये | तब जाने किस अँधेरे कोने से चन्दन प्रकट हुआ | 

वे तो उस चन्दन से मिलने गए थे जो सामान्य परिस्थितियों में जिंदादिल था | ठीक है, वह ठहाके नहीं लगाता था, लेकिन उसकी बातें हमेशा दिलचस्प लगती थी | मगर उस दिन चन्दन बुझा-बुझा सा लग रहा था | उसकी बातें इस कदर नैराश्य से भरी थी कि एक क्षण अजय कौशल को लगा कि चन्दन मज़ाक कर रहा है | 

"यार, अब मैं बहुत मोटा हो गया हूँ |" किसी सन्दर्भ में चन्दन बोला | 

""कोई जिम ज्वाइन कर ले |" अजय ने सुझाव दिया | 

"जिम सब दूर दूर है यार |"

"सायक्लिंग कर न  | अब तो बारिश भी ख़तम हो गयी है|" मुरली ने सलाह दी | बहुत से लोग साइक्लिंग करते हैं - विनोद, सुबोध .. |"

"नहीं यार मुरली | मैं साइकिल नहीं चला सकता | मैं साइकिल तोड़ दूंगा |"

"अरे नहीं भाई | तू इतना भारी भी नहीं है |" अजय बोला ,"तो एक ट्रेक सूट खरीद और रनिंग चालू कर दे |"

"नहीं यार मैं दौड़ नहीं सकता |" चन्दन का जवाब था | 

"तो ठीक है | पहले वाकिंग करना शुरू कर दे |"

"नहीं यार , मैं चल नहीं सकता | जल्दी थक जाता हूँ |"

के ये वही चन्दन था जो पहली कक्षा में एक बेंच से दूसरे बेंच उछल उछल कर दौड़ते हुए पूरी कतार ख़त्म कर देता था ? वही चन्दन है जो सुरेश बोपचे के साथ त्रि-टंगी दौड़ दौड़ता था ? अगर मैं रहता तो मैं उसे जरूर याद दिलाता | 
"तो थोड़ा-थोड़ा चल | फिर बढ़ाते जाना | पहले सौ कदम , फिर दो सौ |"

"नहीं यार मैं चल ही नहीं सकता |"

"अच्छा, दस कदम ?" 

"एक कदम भी नहीं |" हठीले बच्चे की तरह चन्दन ने कहा | 

"डॉक्टर क्या कहते हैं ? किसी  डॉक्टर को दिखाया ?"

"डॉक्टर कहते हैं हरी सब्जी खाओ |"

"तो फिर हरी सब्जी खाओ - पालक, मेथी, टिंडा, लौकी | क्या परेशानी है ?"

"कौन पकायेगा यार ?"

"श्रीमती जी | "

"अरे नहीं | वो नहीं पकाएगी |"

"तो फिर तू खुद पका ले | क्या परेशानी है ?"

"नहीं यार | मुझे खाना बनाना नहीं आता |"

"तो एक खाना बनानेवाली रख ले |"

"खाना बनानेवाली मिलती कहाँ है ?"

"बोल |  तो मैं खोज के रखता हूँ |"

"नहीं यार |"

ऐसे नकारात्मक उत्तरों की पूरी श्रृंखला चल रही थी कि अजय कौशल को लगने लगा, चन्दन बड़ी गंभीरता से मज़ाक कर रहा है | 

ये वो चन्दन था जो किसी भी ग़मगीन माहौल में भी ख़ुशी खोज़ लेता था | कितने ऐसे मौके आये थे | कक्षा की जान था वह | कभी किसी को निराश नहीं देख पाता था | नहीं - चन्दन जरूर मज़ाक कर रहा था | 

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सूरज अस्त जरूर हो चुका था लेकिन लालिमा अभी भी बिखरी हुई हुई थी | अक्टूबर का दूसरा सप्ताह अभी शुरू ही हुआ था | कैलेंडर के अनुसार शिवनाथ नदी का बहाव काफी तेज़ था | बल्कि नदी उफन रही थी | चन्दन यंत्रचालित क़दमों से नदी की ओर बढ़ रहा था | आज उसके मन में न कोई उलझन थी और न ही कोई झिझक | न तो कोई डर था , न कोई मोह  | 

कोई उसे पुकारने वाला भी तो नहीं था | अब न तो बिजोरिया बहनजी की लड़की ही थी जिसकी आवाज़ से चन्दन पलटकर  देखे | शांत चित्त . . . सतत अग्रसर पग ..

. अगर कोई पुकारता तो शायद उसे जवाब मिलता ," कहीं और जा के खोज बे | मैं चन्दन नहीं हूँ |" 

वह नव-दुर्गा का प्रथम दिवस था और लगता था, मानो माँ दुर्गा ने ही उसे बुलाया था | वह तर्पण के लिए निकला था - पुरखों को आहुति देने .... 

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"तुझे विश्वास नहीं होगा विजय  |" सूर्य प्रकाश फोन पर बोल रहा था, "जब चन्दन का क्षत-विक्षत शरीर मिला तो कोई उसे पहचान नहीं पा रहा था |"

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मन अचानक भारी हो गया |   

जीते-जी भी चन्दन को भला कौन पहचान पाया था ?

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(समाप्त)

साभार - अजय कौशल, प्रमोद मिश्रा , डी. मधु 


काल - १९७६-८२  , १९८६ , अज्ञात, २०१५-२०२१ 


और देखें -  

'च' से चन्दन (भाग १ )

'च' से चन्दन (भाग २ )

चोरी में साझेदारी  

राजीव सिंह की 'शोले '


बुधवार, 29 दिसंबर 2021

'च ' से चन्दन (भाग २)

चन्दन देति जराय 
जब यह दोहा लिखा गया, तब लिखा गया | तीसरी कक्षा में  जब पढ़ाया गया तो रट  लिया , समझ लिया | यह जान लिया कि अति परिचय से महत्व या दूसरे शब्दों में दबदबा  कैसे कम हो जाता है | 

जब कवि  की कलम चली तब मलयगिरि चन्दन का घर था | चन्दन की लकड़ी के लिए दुनिया तरसती रही हो, पर मलयगिरी की भीलनी के लिए तो चूल्हा जलाकर खाना बनाना ज्यादा जरूरी था | सो, वह चन्दन की लकड़ी चूल्हे में फूँक देती थी | 

दूसरी कक्षाओं के लिए चन्दन का अभी भी खौफ रहा हो, पर हमारी  कक्षा के लोगों के लिए चन्दन वह "दो गज की दूरी" वाला चन्दन नहीं था | उसके गले में बाहें डालते समय राजीव सिंह को कभी पहली कक्षा की  वह घटना याद नहीं आती होगी | वैसे भी उन दिनों गलबहियां प्रगाढ़ मित्रता की निशानी समझी जाती थी | तीन साल से पांच पांच घंटे रोज़  साथ बिताने के के बाद पत्थर भी पिघल जाता है तो वह तो  चन्दन था | बड़े भाई दीपक की वाक्पटुता और परिहास की छवि कुछ कुछ चन्दन में दिखने लगी थी | 

 वही चन्दन सुबह की पाली वालों के लिए खूंखार हो उठता था | सुबह की पाली पौने बारह बजे ख़तम होती थी और दोपहर की पाली बारह बजे शुरू होती थी | उस पंद्रह मिनट के  संक्रमण काल में सुबह वाले बाहर जा रहे होते थे और दोपहर वाले अंदर आ रहे होते थे | चट्टान जब टकराएं तो चिंगारी निकलना  स्वाभाविक था | गाली गलौच, धक्का-मुक्की , गाहे-बगाहे पत्थरबाज़ी - सब कुछ उस पँद्रह मिनट के अंतराल में देखने को मिलता था | बालकों की सृजनात्मकता का अच्छा परिचय मौलिक, अनूठी गालियों में  सुनने को मिलता था | कभी इत्मीनान से बैठकर सुनने में हँसी  आती थी | उन गालियों में कभी डायनोसौर भड़भड़ाता हुआ आता था तो कभी रेलगाड़ी सरपट भागती थी | अभी सिलाई मशीन उछाली जाती थी तो कभी वेल्डिंग का हत्था हत्थे चढ़ जाता था | यह सिलसिला तब तक चलते रहता था , जब तक सुबह वाले स्कूल के बाहर की नाली और फिर सड़क पार करके इक्कीस सड़क में  दाखिल होकर सेक्टर छह की राह ना पकड़ लें | 

इस सारी  कटुता की पृष्टभूमि में दो प्रमुख कारण थे | 

पहला - सुबह वालों के साथ कबड्डी के मैच में हमारी दोपहर पाली की टीम हर बार हार जाती थी | जीत भी कैसे सकते थे ? आखिर हमारी टीम में कौन थे - विनोद धर की चौकड़ी के सदस्य - विनोद धर, भोला गिरी, चन्दन दास  और सुरेश बोपचे और वर्ग 'ड' के एकाध दो लड़के - दुर्गाराव , बलदेव आदि | और सुबह की टीम में ? एक से एक कद्दावर और छंटे हुए लड़के - हमीद, प्रमोद, बासत, जसवंत, कृष्णा रेड्डी , श्याम नारायण ! अगर कोई अपवाद था तो मुस्कुराते चेहरे वाला इक्कीस सड़क का अजय कौशल | वर्ना इन सब की कहानियां शाला प्रांगण के बाहर भी दूर दूर तक फैली थी |  एक बार तो बासत रंदे से बर्फ घिसकर आइसक्रीम बनाने वाले के ठेले से पूरी शरबत की बोतल उठाकर भाग गया था | कबड्डी का मैच जीतना एक बात थी | लेकिन उसके बाद जो विजयोल्लास होता था उससे हम सब जल भुन जाते थे | अब हम तो दर्शक थे, भला खिलाड़ियों पर क्या बीतती होगी - जरा कल्पना करके देखिये | 
हर हार के बाद हम बीते समय के दोपहर की पाली के महान खिलाडियों को याद करते - कुंजीलाल , बृंदा , उदय | एक बार मेरे मुंह से निकल गया ,"यार, वो यदि फेल होकर यहीं रहते तो ..|" और कक्षा "ड" के शरद निगम ने मुझे झिड़क दिया," किसी के फेल होने की दुआएं क्यों करते हो यार?" ये मैं नहीं मेरी खीज बोल रही थी जो हर हार के बाद वही दृश्य देखकर बड़ी - और बड़ी हो गयी थी | 

दूसरा प्रमुख कारण था, लड़कियों से छेड़छाड़ | प्रातः पाली वाले अपनी कक्षा की लड़कियों के साथ जो कुछ करें, उससे हमें कोई सरोकार नहीं था | पर उनकी मजाल थी  कि दोपहर के पाली की लड़कियों पर एक जुमला भी कस दें | ज्वालामुखी के रूप में चन्दन फट पड़ता था | 

ये मैंने क्या कह दिया ? आप भी सोच रहे होंगे, हमारी उम्र ही क्या रही होगी उस समय ?आठ साल ? नौ साल? या दस साल?  वक्त से पहले बड़े हो गए थे ? मेरे हुजूर, अभी आगे तो पढ़िए | 
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"माचिस की खाली डिब्बी? कितनी लगेगी ? " चन्दन ने मुझसे पूछा | 
मैंने मन ही मन गणना की और कहा, "सात"}
"चाभी छाप या घोडा छाप ?" चन्दन ने दूसरा सवाल दागा | 
"दोनों चल सकती है | बस, आकार समान होना चाहिए | "

वैसे यही सवाल थोड़ी देर पहले प्रमोद मिश्रा ने पूछे थे | चन्दन मेरा दूसरा ग्राहक था | 

ग्राहक ? हाँ अब दिल को बहलाने के लिए  कुछ तो सोचना पड़ेगा | 

बात तीसरी कक्षा की है || हुआ ये था कि कालकर बहन जी ने कोई "मॉडल" बना कर लाने को कहा था | बस, कह दिया, न तो परिभाषित किया और न ही कोई विवरण दिया | कारण यही था कि उन्हें पता था, वे किनके आगे बीन बजा रही हैं | कोई फायदा तो होने वाला नहीं, क्योंकि कोई कुछ करेगा नहीं | उनका मतलब वैज्ञानिक 'मॉडल ' से था, जिसे शायद सिविक सेण्टर के बाल मेला की प्रदर्शनी में रखा जा सके | उन दिनों घर में एक पत्रिका आती थी - धर्मयुग | उसके किसी अंक के बाल जगत के कोने में माचिस के खाली डब्बों से कुत्ते के 'मॉडल' बनाने का विवरण था | 

क्या क्या नहीं किया मैंने | माचिस के जिन डिब्बों में तीलियाँ थी, उनसे वे तीलिया निकालकर दूसरे भरे माचिस के डब्बों में ठूंसा | मुन्ना की मां से खाली माचिस मांग कर लाया | माचिस के डिब्बों से ढांचा बन जाने के बाद घुटना पेपर के सफ़ेद भाग को चिपकाकर , डॉट पेन से उसकी आँखें बनाई , फिर लाल झिल्ली कागज़ से लपलपाती जीभ बनाई |

जब मैंने उसे पूरे आत्मविश्वास के साथ कालकर बहनजी की मेज पर रखा तब चेहरे से यही टपक रहा था - हाँ, हम भी कुछ कर सकते हैं | कालकर बहनजी ने उसे उलटा-पलटा कर देखा और वापिस करते हुए कहा,"अच्छा है |"

बैरंग वापस ...| भला 'मॉडेल ' का अर्थ और क्या होता है ?"

"तू ऐसा मेरे लिए बना देगा?" प्रमोद मिश्रा ने पूछा | 

दिल को थोड़ी सांत्वना मिली - कहीं से तो कोई प्रोत्साहन आया | 
"हाँ , जरूर | तू माचिस के खाली डब्बे ले आ |"
"तू मुझे सीखा देगा ?"  वह उम्र ही वैसी थी, जब दूसरों से काम करवाने की अपेक्षा स्वतः सीखने की ललक ज्यादा थी |  प्रमोद मिश्रा का यह प्रश्न स्वाभाविक था | 
"ठीक है | पूरी छुट्टी के बाद तू मेरे घर आ जाना |"

प्रमोद मिश्रा मेरे घर आया और  घर की सीढ़ियों पर बैठकर मैंने उसे बनाना सिखाया | 

मगर चन्दन का हिसाब-किताब ही दूसरा था ,"पूरी छुट्टी के बात तू मेरे साथ मेरे घर चलेगा | समझे?"

इन शब्दों में अनुग्रह, अनुदेश और धौंस - सब कुछ समाहित था | 
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पूरी छुट्टी के बाद मैं दौड़ भागकर घर गया | आनन् फानन में शाला की पेटी एक कोने में फेंकी,  माँ के सामने हाजिरी लगाईं और चन्दन के साथ हो लिए | चल पड़े तो चलते ही जा रहे थे | अयप्पा मंदिर पार किया, पूछताछ दफ्तर के बगल से निकले | सत्रह सड़क के बाद 'अबे नू ' ( एवेन्यू  - पार मार्ग ) तक पहुँच गए | उसके आगे ज़िन्दगी में पहली बार मैंने कदम रखा था | टीन के छत वाले घरों  की कतार बड़ी तिलस्मयी लग रही थी | ऐसे ही एक घर पर पहुँच कर चन्दन ने दरवाजा खटखटाया | 

"अरे विजय सिंह |" चन्दन के भाई दीपक ने दरवाजा खोलते ही कहा | 

उनका नाम तो शाला क्रमांक आठ के सब लोग जानते थे , पर उन्हें मेरे नाम का पता कैसे चला ? संभव है, चन्दन ने पूर्व सूचना दे रखी हो | लेकिन इससे ज्यादा बड़ी बात ये थी कि उनकी आवाज़ को क्या हुआ ?

जैसे कि उन दिनों हुआ करते थे | परिवार या आवश्यकताएं बड़ी थी और घर छोटे होते थे | फलतः समझदार लोग आगे पीछे दाएं बांये - एकाध दो कमरे बना लेते थे | चन्दन के घर में भी वैसे ही एक कमरा सामने बना था , जिसमें हम लोग बैठे | वो माचिस की डिबिया लेकर आया |  पर अब उसकी आवाज़ को क्या हो गया ? उसकी आवाज़ भी बहुत धीमे हो गयी | क्या मुझे भी धीमे ही बोलना चाहिए ?

हुआ कुछ वैसा ही | 

"इसको उल्टा घुसा |" मैंने सामान्य आवाज़ में कहा | चन्दन ने तुरंत आवाज़ धीमे करने का इशारा किया | 

मैंने चन्दन को एक बार बनाकर दिखाया और फिर सब डिब्बे अलग करके उससे जोड़ने को कहा | तब तक रात काफी हो गयी थी | 

"चल तुझे छोड़कर आता हूँ | रास्ते  में कुत्ते बहुत हैं - असली कुत्ते | "

"पूछताछ दफ्तर तक छोड़ दे |  फिर मैं चले जाऊंगा |" अब मैं भी जल्दी निकल जाने की फ़िराक में था | 

"चक्कर क्या है यार ?" ट्यूबलर शेड की अँधेरी सड़कों में चन्दन मेरे आगे आगे चल कर यह सुनिश्चित कर रहा था कि कोई कुत्ता अँधेरे में तो नहीं बैठा है | 'अबे नू ' के आते ही सड़क की बत्तियां दिखने लगी और हम अब समानांतर चलने लगे | 

"कैसा चक्कर?" चन्दन ने पूछा | 

"घर में तुम लोग इतना धीमे क्यों बोल रहे थे ?"

"बाबा की रात की ड्यूटी है |" चन्दन बोला ,"उनका कहना है, मैं आठ घंटे भट्टियों की  आवाज़ में रहता हूँ | घर में मुझे शांति से सोने दो |"
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आधी छुट्टी और खेल के पीरियड में फर्क ये होता था कि आधी छुट्टी के वक्त पूरी शाला बाहर होती थी , जबकि खेल के पीरियड में एक या दो वर्ग के लोग ही बाहर होते थे | बाकी काम हम वही करते थे - जो मन चाहे | अगर शिक्षिकाओं की बात मानते तो 'रूमाल चोर' खेलते रहते , जैसे वर्ग 'ड' की आज्ञाकारिणी लड़कियां इस वक्त खेल रही थी | या फिर दौड़ भाग वाले खेल खेलते और फिर बेतरतीब इधर उधर बैठ जाते | या तो विनोद धर  कोई 'फोक' सुनाता और हम लोग इस तलाश में कुत्ते की तरह कान लगाकर सुनते कि कोई मौका भर मिले और हम उसका 'फोक' पकड़ कर उलटा लटका दें | या सूर्य प्रकाश किसी तेलुगू चंदामामा के नए अंक की कोई कहानी सुना रहा होता | तेलुगू  चंदामामा हिंदी की चंदामामा से एक महीने आगे चलती थी | इसलिए धारावाहिक 'विचित्र जुड़वां' या 'वीर हनुमान' में अगले महीने क्या होने वाला है -  यह जिज्ञासा वही शांत करता | 

या तो मैं किसी बाल पॉकेट बुक्स की कहानी सुना  रहा होता| जैसे इस वक्त सुना रहा था ,"राक्षस ने वह हड्डी राजकुमारी को देते हुए कहा ," ये हड्डी किसी आदमी के सर के ऊपर तीन बार घुमा देना | वह चूहा बन जायेगा |"
कहानी अभी अपने चरम उत्कर्ष  पर ही पहुंची थी कि विनोद धर बोल पड़ा ,"और फिर जब राक्षस सो जाता होगा तो राजकुमारी वह हड्डी राक्षस के सर के ऊपर घुमा देती होगी |" आगे कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था | कहानी के रहस्य का ही कचूमर निकल गया | 

अब भोला गिरी ने फिल्म "मधुमति" की कहानी शुरू की जो उसके पिताजी एक दिन पहले जबरदस्ती पकड़कर ले गए थे | ठीक है, उसके पिताजी के दिनों में वह 'सुपर डूपर हिट' रही होगी पर भोला गिरी के लिए वह  किसी उत्पीड़न से कम नहीं था | यह बात भी उतनी ही सही है कि परिहास भी उत्पीड़न के पश्चात् ही उत्पन्न होता है | वह फिल्म की व्याख्या कर रहा था और हम हँस-हँस कर लोटपोट हो रहे थे | 

तो जो वर्ग 'ड' को आज्ञाकारिणी बालाएं, जो अभी घेरा बनाकर रुमालचोर खेल रही थी, उनके लिए जरूर आधी छुट्टी और खेल के पीरियड में फर्क था | आधी छुट्टी के समय वे अपने वर्ग के उन सहपाठियों  पर नज़र रखती थीं जो तार के बाहर जाते थे |  शाह बहनजी आधी छुट्टी के बाद ऐसे लड़कों की पूजा करती थी | 

कभी कभी खेल के पीरियड में हम लोग जूते की कतार लगाकर पाला बना लेते और कबड्डी खेलते | छुआ छुई तो सदाबहार खेल था | लट्टू या गेंद लाना तब वर्जित था | यानी संसाधन के अभाव में भी क्रियाकलापों की कोई कमी नहीं थी | 

पूरे तीसरी और चौथी के शुरुवाती महीने मेंतब तक यही सब चलते रहा जब तक पटल पर दिलीप का आगमन नहीं हो गया | उसके बाद सब कुछ बदल गया - हमारे लिए भी और उन आज्ञाकारिणी लड़कियों के लिए भी | 
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इसे 'आह' कहें या नज़र (शायद कालकर बहनजी की ) कि विनोद धर , भोला गिरी ,  चन्दन दास और सुरेश बोपचे व वह चौगुट जो तीसरी के अंत तक इतना सुदृढ़ लगता था कि उनके बीच से  हवा भी नहीं पार हो सकती थी, चौथी  के अंत तक तिनके की तरह बिखर गया | 

 एक ही साल में  एक नहीं, दो दो बड़े बड़े कहर टूटे |  मानों वे भगवान् ने उन चौगुटों को तोड़ने के लिए ही भेजे हों  

वैसे पहले कहर का नाम दिलीप था | 
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इन तीन सालों में हमारी कक्षा के छात्र इस कदर घुलमिल गए थे कि जब भी कोई नवांगतुक आता तो उसे भी अपने  रंग में रँग डालते | यकीन नहीं आये तो सुबोध जोशी या राजीव जावले  (जो आज इस संसार में नहीं है)  पूछ लेते | 

फिर भी कुछ नयी प्रविष्ठियां ऐसी हुई कि उन्होंने हमें ही अपने रंग में रँगना शुरू किया | कुछ इस तरह कि एक तरह से न केवल तीन सालों की कार्यशैली बदली, बल्कि कई बार हम आत्म  मंथन पर भी विवश हो गए | 

याद है, वो "समय से पहले बड़े होने" वाला जुमला ? कुछ नहीं था उसमें - कुछ भी नहीं | अगर चौगुटे के सदस्य या कुछ इक्के दुक्के और को छोड़ दें तो बाकि लड़के तो लड़कियों से  बात से कतराते थे | न जाने वो क्या सोच ले ? न जाने वो किससे शिकायत कर दे |  यह वह समय था जब फ़िल्में देखना बुरा समझा जाता था क्योंकि फ़िल्में बुरी बातें सिखाती थी | 

और उन्हीं फिल्मों के परदे से उतरकर सीधे कक्षा चौथी 'स' में अवतरित हुआ था दिलीप | 

नहीं, वह हमारे दायरे में शामिल नहीं हुआ | बल्कि उसने खुद अपना दायरा बनाना शुरू किया | आधी छुट्टी और खेल के पीरियड में जब हम खेल कूद या अपनी संगोष्ठी में संलग्न रहते थे, तो दिलीप मिमिक्री करता था | जाहिर है, मिमिक्री ने लोगों का ध्यान अपनी ओर ज्यादा आकर्षित  किया | अब तक जो भी हम इन खाली समय में करते थे, वो लोगों को बेमानी लगने लगा | उसकी मिमिक्री से मंत्रमुग्ध होकर 'हा', 'हा' , 'ही', 'ही' करने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी | हमारा दायरा संकुचित होते गया और उसका दायरा बढ़ते गया | एक दिन ऐसा हुआ कि राजीव सिंह खुद हमारे बीच से उठकर उस वृत्त की परिधि का हिस्सा बन गया, जिसके केंद्र पर खड़ा दिलीप हीरोइनों की नक़ल कर रहा था और लोग ठहाके लगा रहे थे | 

यहाँ तक सब कुछ ठीक था | अगर कुछ जलने की बू आ रही है तो ये आपके रसोईघर से ही होगी | 

लेकिन वह मिमिक्री किनके लिए करता था ? क्या उनके लिए जो उसके इर्द गिर्द बैठकर ठहाके लगा रहे होते थे ? उसका लक्ष्य थोड़ी और दूर था | और दूर .. . | जहाँ कक्षा चौथी  'ड' की लड़कियां बैठती थीं | इस बात से भले शुरू में लोग थोड़े अनभिज्ञ रहे हों, पर भोला गिरी ने इसे तत्काल भांप लिया | और ये कुछ ही दिनों की बात थी, जब भोला गिरी उसका शागिर्द बन गया |

भांपने वालों में चन्दन का दूसरा नंबर था | वह समझ गया कि दिलीप के लक्ष्य क्या हैं | वो 'वक्त से पहले बड़े होने' वाली बात को एक स्तर  क्या, कई स्तर आगे ले जाना चाहता है | 

पता शायद उन लड़कियों को भी चल गया था | इसलिए आधी छुट्टी और खेल के पीरियड के समय वे निरंतर अपना स्थान बदल लेती थी | पर वे जहाँ भी जाती, दिलीप उसके आसपास  अपनी मिमिक्री लेकर पहुँच जाता | 

अब दिलीप एक साइकिल लेकर आता था जो वो रामलीला मैदान में ही कहीं छुपकर रखता था | आधी छुट्टी और खेल के पीरियड पर वो साइकिल लेकर आ जाता | ये देखकर काफी दुःख हुआ कि उसके डंडे पर बैठकर भोला गिरी पैदल मारता था | वो भोला गिरी , जिसकी खुद की अपनी पहचान थी | जो कक्षा एक से हमारा अच्छा दोस्त था | चौगुटे का सदस्य होना तो एक बात थी , वो बोरा दौड़ और कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था | वो भोला गिरी बांका भोलागिरी अब मजनूं नहीं, मजनूं का चेला बन गया था | वो  दिलीप का सहभागी  नहीं, अनुचर हो  गया था | 

और चन्दन का गुस्सा एक दिन फटना ही था | भोला गिरी के रातोंरात आमूलचूल  परिवर्तन से उससे रहा नहीं गया | वैसे भी वह देख रहा था कि हमारा दायरा निरंतर संकुचित  होते जा रहा है | और दिलीप  और भोला गिरी जो कर रहे थे, उसे सामान्य भाषा में 'लफूटगीरी' कहा जाता था | 

आधी छुट्टी के समय उसने सीधे दिलीप का कॉलर पकड़ लिया, "तू साले लड़कों को बिगाड़ रहा है ... बर्बाद कर रहा है |"

अप्रत्याशित मसाला मशीन की कुटाई शुरू होते देख भोला गिरी, विनोद धर  और सुरेश बोपचे बीच बचाव में कूद पड़े ,"चन्दन सुन तो भाई | सुन तो यार |  जान दे यार | छोड़ दे भाई | चन्दन... चन्दन... |" चन्दन के बाएं हाथ का घूँसा सीधे दिलीप का जबड़ा हिला देता अगर भोला गिरी बीच में नहीं आ जाता | अगले ही क्षण भोला गिरी अपना कंधा सहला रहा था | देवदास की तरह भोली सूरत बना कर दिलीप हक्का बक्का लग रहा था | किसी तरह विनोद धर, सुरेश बोपचे और भोला गिरी चन्दन को खींचते हुए एक ओर ले गए | 

और दिलीप भी कोई कच्चा खिलाडी  नहीं था | फिर भी अगले चौबीस घंटों में जो हुआ, उसने इस मामले को एक नया मोड़ दे दिया | 
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अब आपको भी लगता होगा, बहनजी लोग भला खेल के पीरियड में करते क्या थे ? जवाब यही है कि कुछ नहीं करते थे | स्टाफ कक्ष में बैठकर चाय पीते थे , गप  मारते थे | अगर कुछ करते तो यह असंभव था कि दिलीप मैदान में वर्ग 'ड' की लड़कियों का पीछा कर रहा होता और शिक्षिकाओं को पता ही नहीं लगता | शाह बहनजी जरूर कभी कभार मैदान में आती थी | एक बार उन्होंने रुमाल चोर खेलती लड़कियों ये  हिदायत दी कि रुमाल में एक कंकड़ बांच दिया जाए ताकि जब चोर को रुमाल पड़े तो उसे भी पता चले | कभी कभार वह लड़कों को जबरदस्ती 'खो खो' खिलवाने पहुँच जाती थी | पर वह उसी दिन होता था जिस दिन गलती  से सूरज पश्चिम से निकलता था | कालकर बहनजी की उपस्थिति तो  नहीं के बराबर थी | 

अगले दिन खेल के पीरियड में कालकर बहनजी ने राजीव सिंह को अपने पास बुला लिया और उसे लेकर बड़ी बहनजी के कमरे की  ओर ले गयी | थोड़ी देर बाद राजीव सिंह बाहर आया  आवाज दी, "चन्दन तुझे बहनजी बुला रही है |"

 दौड़ते भागते चन्दन राजीव सिंह के साथ गायब हो गया | मन में एक खटका हुआ- कहीं कल की घटना तो बहनजी को पता नहीं चल गयी  ? और एक न्यायाधीश की तरह वो मामले का निपटारा करेगी? यानी दिलीप को भी बुलाया जायेगा और उसका पक्ष भी सुना जायेगा | पर दिलीप तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा था | 

तो चन्दन अंदर एक न्यायाधीश के पास बैठा था और अचानक साइकिल पर सवार  मैदान में दूसरा न्यायधीश अवतरित हुआ | मैदान पर आते ही उस दंडाधिकारी ने अपना फैसला सूना दिया,"कहाँ है बे वो तोपचन्द ?"

बात कहने के लहजे से ये एक फैसला ही था | दिलीप का भाई था वह | जिस 'तोपचन्द' को सज़ा देने के लिए वो खोज रहा था वह बड़ी बहनजी के दफ्तर में शायद दूसरे न्यायाधीश के पास बैठा  था | दिलीप के भाई को समझाने का जिम्मा भोला गिरी ने अपने  ले लिया | सुरेश बोपचे भोला गिरी का साथ देने लग गया | वे इस कोशिश में लग गए कि चन्दन दिल का साफ़ है और वो किसी ग़लतफ़हमी का शिकार हो गया है |  सारे लड़के दिलीप के भाई की सायकल घेरकर खड़े हो गए | पिछले चक्के के पास सूर्यप्रकाश झुका और उसने धीरे से वाल्ट्युब का ढक्कन ढीला कर दिया | जब तक दिलीप का भाई मैदान में दहाड़ते रहा, सायकल के हैंडल पर हाथ मारकर धमकाते रहा, पिछले चक्के की हवा धीरे धीरे निकलती रही | अचानक दिलीप के मुंह से निकला ,"कालकर बहनजी |"

कालकर बहनजी के साथ राजीव सिंह और चन्दन दास मुस्कुराते हुए आ रहे थे | 

अगर नीयत साफ़ होती तो दोनों न्यायाधीश आपस में बैठकर निपटारा कर लेते | लेकिन वहां वस्तुस्थिति यह बनी कि दिलीप के भाई ने खिसक जाने में ही भलाई समझी | उसका पिछले टायर ज़मीन से चिपक गया था | आनन्-फानन में दिलीप के भाई ने रामलीला मैदान की ओर बिना हवा वाली खड़-खड़ करती सायकल दौड़ा दी | 

चन्दन के हाथ में वह वस्तु चमक रही थी | वह थी - रशियन फुटबॉल जो मैंने आज तक केवल  सर्कस में ही देखी  थी | 
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आज तक मैंने रशियन फुटबॉल को ठोकर नहीं मारी थी | कैसी  होती थी रशियन फुटबॉल ? 
[1] रशियन फ़ुटबॉल गोल होती थी -पूर्णतः गोल | क्या कहा ? फ़ुटबॉल तो गोल ही होती है | अगर आपने कभी उन दिनों की सामान्य फ़ुटबॉल देखी  हो तो आपको याद होगा कि सामान्य फ़ुटबॉल में ब्लेडर था  जिसमें पम्प से हवा भरते थे | इसकी वजह से उस हिस्से  के कारण  , जहाँ ब्लेडर की टोंटी होती थी और उसे तस्मों से बाँधा  जाता था,  फुटबॉल पूर्णतः गोल नहीं होती थी | वैसे छर्रे वाले ब्लेडर भी आ गए थे, जिनमें टोंटी की जगह एक छोटा सा छेद  होता था, फिर भी उसे घुसांने  और निकालने के लिए जगह तो चाहिए थी | जबकि  रशियन फुटबॉल में ब्लेडर ही नहीं होता था | अगर होता भी था, तो हमें दिखाई नहीं देता था | जब ब्लेडर ही नहीं था तो टोंटी कहाँ से होती ? और जब टोंटी नहीं थी तो तस्मों के कारण फुटबॉल बेडौल नहीं होती थी | 

[2] रशियन फ़ुटबॉल चमड़े के मज़बूत छोटे छोटे टुकड़ों से मिलकर बनती थी जिनका रंग क्रमानुसार एक काला एक सफ़ेद होता था | यूँ समझें कि एक शतरंज की बिसात को गोलाकार रूप दे दिया गया हो | इससे उसकी खूबसूरती बढ़ जाती थी | 

[3]  रशियन फुटबॉल में हवा भरने का सुराख़ खोजने उसे पूरा घुमाना पड़ता था, कई बार तो एक से अधिक बार | तब कहीं जाकर छोटा सा सुराख़ नज़र आता था | 

[4] रशियनफुटबॉल बहुत जल्दी पंक्चर नहीं होती थी | नुकीले पत्थरों, कांटेदार झड़ियों और नाखून वाले पांवों की ठोकर का कोई असर नहीं पड़ता था | जबकि सामान्य फुटबॉल का  ब्लेडर पंक्चर हो जाए तो उसे आटा   चक्की  के पास की साइकिल की दुकान में ले जाकर पंक्चर ठीक कराना पड़ता था | अगर बाहर के चमड़े के खोल में कोई दरार आ जाये तो आम के पेड़ के नीच बैठे राजा मोची से सिलवाना पड़ता था | वो सब नखरे  रशियन फुटबॉल के नहीं थे | 

 रशियन फुटबॉल के आने से एक स्पष्ट फायदा यह हुआ कि जो भीड़ दिग्भ्रमित होकर खेल के मैदान को  छोड़कर दिलीप के पीछे पीछे जा रही थी, वह  रशियन फुटबॉल से सम्मोहित होकर वापिस खेल के मैदान में लौट आयी | खेलकूद से बेहतर मनोरंजन भला कुछ और होता है ? जो नहीं आया था , वो भोला गिरी था | वह अब भी दिलीप का साया बनकर उसके साथ साथ वर्ग 'ड'  की लड़कियों के चक्कर काटता | उन दोनों को लोगों ने उनके हाल पर छोड़ दिया था, क्योंकि उनकी महत्ता नगण्य हो गयी थी | 

सवाल यह जरूर उठ सकता है की दिलीप वर्ग 'ड' की लड़कियों के ही चक्कर क्यों काटता है ? जवाब में यही कहा जा सकता है कि ये नज़र का मामला है | जिसे जो पसंद आ जाये | यह सही है कि वर्ग 'डी' की लड़कियां हमारी कक्षा की लड़कियों से ज्यादा खूबसूरत तो थी पर बढ़ी चढ़ी और नकचढ़ी भी थीं | जबकि हमारी कक्षा की लड़कियाँ सामान्य थी | किरण थोड़ी  चंचल जरूर थी, पर उससे ज्यादा कुछ नहीं  | पर दिलीप और भोला गिरी की  ये  हरकतें  निहायत खतरनाक भी थीं  | दिलीप तो खैर, नया नया ही आया था , पर क्या भोला गिरी को आभास नहीं था कि वे दीवानगी की बीन किनके आगे बजा रहे हैं?  एक दिन तो भोला गिरी ने हद ही कर दी | पूरी छुट्टी के बाद लड़कियों का पीछा करते-करते वह अपनी कमीज उतारने लगा | लड़कियां डर कर वापिस  स्कूल की और भागी | पीछे पीछे शाह बहनजी आ रही थी | अब डर कर भागने की बारी दिलीप और भोला गिरी की थी | 

फुटबॉल के मैदान में चन्दन का एकछत्र राज्य था | वह खिलाड़ी भी था, प्रशिक्षक भी और रेफरी भी | बस, मुंह में सीटी  नहीं थी | वह जो कहता, नियम वही होते | न कहने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि सबसे अच्छा खिलाड़ी और जानकार भी वही  था | खेल के मैदान में अब किस्से कहानियां चलती तो वह भी फुटबॉल से ही सम्बंधित होती | पता चल गया कि कलकत्ता में 'मोहन बागान', 'ईस्ट बंगाल' और 'मोहम्डन स्पोर्टिंग' फुटबॉल के बड़े क्लब हैं और अब गोवा में 'डेम्पको स्पोर्ट्स क्लब' और 'चर्चिल ब्रदर्स' धूम मचा रहे हैं | ये सब जानकारियाँ अक्सर मनमोहन लेकर आता था, क्योंकि उसके घर 'नवभारत टाइम्स' (नवभारत नहीं) समाचार पत्र आता था | 

लेकिन फुटबॉल के लोमहर्षक किस्से तो चन्दन ही सुनाया करता था | पेले की कहानियां सुनाते समय उसकी आँखों में विशेष चमक आ जाती थी | 

"पेले बड़ा चालू (चालाक) खिलाडी था |" खेल का पीरियड ख़तम होने की घंटी बजी थी | फुटबॉल वापिस करके हम अभी कक्षा में घुसे ही थे | कालकर बहनजी के आने में थोड़ा समय था | 

मैं मनमोहन, सुबोध, सूर्य , सुरेश - सब ध्यानमग्न होकर उसकी बात सुन रहे थे | किसी को अपनी डेस्क की ओर  बढ़ने की जल्दी नहीं थी | 

"एक बार चार खिलाडी उसको गार्ड करके खड़े थे ", चन्दन ने बात आगे बढ़ाई ,"ऊपर से बॉल आयी | पहले पेले उछला तो उसको गार्ड करने वाले सारे खिलाडी भी उछले | फिर पेले ने धीरे से उछल कर बॉल गोल में 'हेड' कर दी |"

मेरे पल्ले खुछ ख़ास नहीं पड़ा ,"कैसे? कैसे? जब पेले ऊपर उछला तो सारे खिलाडी भी उछले ?" 
"हाँ उछले |" चन्दन बोला  | 
"तब तक बॉल कहाँ थी ? कितने दूर थी ?" मैं अभी भी दूरी और समय का गणित बिठा रहा था | 
"हवा में थी |" चन्दन ने जवाब दिया | 
"पेले उछला तो सब उछले | फिर सब ज़मीन पर आ गए |" मैं अब भी गुत्थी ही सुलझा रहा था | 
चन्दन को मुझ पर तरस आया ,"सुरेश, इधर आ बे | विनोद धर, वहीँ खड़े रह | सूर्य, तू पीछे आ जा | समझ कि मैं पेले हूँ |"

चन्दन ने अपनी बिसात बिछाई और दरवाजे की तरफ इशारा करते हुए बोला ,"समझो उधर से बॉल आ रही है .. |"

उधर से  बॉल तो नहीं आयी, लेकिन  हाथ में हरे बेशरम की मोटी सी सोंटी लेकर शाह बहनजी ने प्रवेश किया | हम सब अपने - अपने बेंचों की ओर लपके | 

पर शाह बहनजी ने वह सब अनदेखा किया | उन्हें किसी और की तलाश थी | 

"दिलीप !" शाह बहनजी छड़ी घुमाते-घुमाते बोली ,"इधर आ |"
थोड़ा सहमा सा, थोड़ा भौंचक्का ( हो सकता है ये उसका जीवंत अभिनय था ) , दिलीप शाह बहनजी के पास पहुंचा | जैसे ही वह बेशरम की सोंटी के दायरे में पहुंचा,  शाह बहनजी ने ताबड़तोड़ प्रहार प्रारम्भ किया | 

सड़ाक ....... सड़ाक .......  सड़ाक .......  !!!

हम सब सन्न | किस अपराध की सज़ा मिल रही है ? जो वह कर रहा था, वह तो कई दिनों से जारी था | कोई न कोई अकस्मात कारण तो रहा होगा ? 

तड़ाक ..... तड़ाक ..... तड़ाक ..... !!!

शाह बहनजी के मुंह से बीच बीच में अस्पष्ट से शब्द निकल रहे थे, "लड़कियों के बीच नाच रहा था | बेशरम ...|"

सांय  .... सांय  .... सड़ ... फड़.... रटाक ..... !!! 

इससे तो बेहतर था कि उस दिन चन्दन से हुई भिड़ंत को वह थोड़ी गंभीरता से लेता | सब सन्न रह गए थे | कालकर बहनजी भी दरवाजे पर ठिठकी खड़ी थी  |  उसके पीछे मैंने वर्ग 'ड' की चुगलखोर लड़कियों को झांकते हुए देखा था | बेशरम की डंडी तो अंधी थी और परवश थी | दिलीप के किन अंगों को चोट लग रही है , कहाँ चोट लग रही है, कैसी चोट लग रही है, उसे कोई परवाह नहीं थी | छड़ी टूट कर आधी हो गयी तो आधी छड़ी से शाह बहनजी ने पीटना जारी रखा, जब तक छड़ी उनके हाथ से न छूट गयी | 

मुझे अंदेशा था, अगला नंबर भोला गिरी का है जो सहमा सा बैठा था | पर तब उसके भगवान के रूप में कालकर बहनजी, जो अब तक दरवाजे पर ठिठकी थी,  ने कक्षा में प्रवेश किया |   कालकर बहनजी के आगमन से मानो शाह बहनजी की तन्द्रा भांग हुई और वे तेज़ क़दमों से बाहर चले गयीं | 

वह विषय ही शायद कुछ ऐसा था कि इस घटना पर कालकर बहनजी ने एक शब्द भी टिप्पणी नहीं की | वे चक हाथ में लिए श्यामपट की ओर बढ़ गयीं मानो कुछ हुआ ही ना हो | 
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तो दिलीप था,  पहला कहर था, जिसके कारण भोला गिरी चौगड्डे से टूटकर अलग हो गया | दूसरे तूफान ने न केवल चौगड्डे को तोड़ डाला, बल्कि कक्षा की ही चूलें हिला डाली | कई लोगों पर उस घटना ने दूरगामी प्रभाव डाला | 
पूरे प्रकरण के सम्बन्ध में आप "चोरी में साझेदारी" में विस्तार से पढ़ चुके हैं | चन्दन का बाल -बाल जाना संयोग कम और दैवयोग ज्यादा था |

 पीतल के घंटे पर काठ के हथौड़े से प्रहार करके जब चपरासी ने आधी छुट्टी की घंटी बजाई, चन्दन अपने घर की ओऱ रवाना  हो गया | उसके घर पूजा थी - माता ने ही उसे बुला लिया था और उसके दामन में बदनामी के छींटे नहीं लगे | कालकर बहनजी ने तो मान ही लिया था, "अगर चन्दन होता तो वह भी शामिल होता |"

अपनी तरफ से चन्दन ने चौगड्डे को बचाने के प्रयास भी किये | दिलीप से सीधे तकरार का कारण कक्षा एक से  पुराने सहपाठी  भोला गिरी को वापिस लाना था |  

पर भोला गिरी अब अलग राह पर काफी दूर निकल गया था | 
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यह मेरी आदत सी बन गयी थी कि पूरी छुट्टी के बाद मैं  बड़ी बहनजी के दफ्तर और पानी की बरसो से सूखी पड़ी बड़ी टंकी के बीच की संकरी जगह से गुजरता था | आँखें ज़मीन पर तिकी होती थी | एक दिन चन्दन ने मुझे देख लिया | 

"क्या खोज रहा है बे ?" उसने पूछा | 
"कुछ नहीं यार |" 

पर चन्दन कहाँ आसानी से छोड़ने वाला था | उसने वादा किया कि वह किसी को नहीं बताएगा | 
"डाक टिकट .. . |"
"डाक टिकट? स्टैम्प ?" 

डाक टिकट  जमा करने का शौक मुझे मनमोहन के भाई रमेश ने लगाया था | घर में जो  चिट्ठियां आती थी, उनमें वही एक ही तरह के टिकट लगे रहते थे | वही वीणा वाले , शेर, हिरण या नटराज की मूर्ति वाले | 

मैंने बाबूजी से पूछा, "कॉलेज में आने वाली चिट्ठियों के लिफाफों का क्या करते हैं ?"
उनका जवाब था, "कूड़े का और क्या करेंगे?"
"तो क्या आप डाक टिकट फाड़कर ला सकते हैं ?"

उस दिन से बाबूजी  लिफाफे से डाक टिकट वाला हिस्सा मेरे लिए फाड़कर लाने लगे | मैंने कह्सूस किया , कॉलेज में पंजीकृत पत्र काफी आते हैं | शायद कुछ पार्सल भी आते होंगे क्योकि कुछ टिकटों की कीमत पत्रों के हिसाब से कुछ ज्यादा ही थी | 

अब मेरी तृष्णा बढ़ी | अचानक ये विचार मेरे मन में कौंधा कि पत्र तो शाला में भी आते होंगे | बड़ी बहनजी भी लिफाफा फाड़कर फेंकती ही होगी | उनके दफ्तर में एक ही तो खिड़की है | मैं उस रास्ते से नियमित रूप से गुजरने लगा | एक बार वीणा वाली टिकट लगा लिफाफा क्या मिला , दफ्तर और टंकी के बीच की संकरी जगह मेरे घर वापिस लौटने के रास्ते में शामिल हो गयी | हालांकि यह मैं काफी सावधानी से  करता था | किसी को पता चले तो लोग हँसेंगे, जैसे आप अभी हँस रहे हैं | 

चन्दन ने मेरी बातें धैर्यपूर्वक सुनी | फिर उसके मुंह से निकला,"पहले क्यों नहीं बोला बे ?"
"क्या?"
"कि ये तू फालतू के काम करता है - टिकट, विकट | खैर, मैं तेरे लिए स्टैम्प लेकर आता हूँ |"
"तू कहाँ से लाएगा ?" मैंने पूछा | 
शायद चन्दन ने इसे अपना अपमान माना,"अबे, मेरे घर भी चिट्ठी आती है |"
"पर कोई, अगर ... |  रहने दे यार |" 
"क्या रहने दे? कौन क्या बोलेगा ? और कोई बोलेगा भी तो ...  तूने मुझे कुत्ता बनाकर दिया था ना ?"

उन दिनों बचपन की दोस्ती में अहसान-वहसान जैसा कुछ नहीं होता था | हम एक दूसरे की मदद बिना कोई अपेक्षा किये करते थे और भूल जाते थे | दोनों को ख़ुशी होती थी और हमारी दोस्ती और सुदृढ़ हो जाती थी | माचिस के कुत्ते वाली घटना को तो मैं भूल ही  चुका था | 
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पहले पहल चन्दन को समझाना पड़ा,"देख भाई, स्टैम्प काटते समय ये कोशिश अरे कि किनारा न कटे | बेहतर है कि तू काट मत, उतना हिस्सा फाड़ के ले आ |"
"तो तू स्टैम्प निकालेगा कैसे ?"
"पानी में डालकर |" मैंने कहा ," मैं कर लूंगा |"

तीसरे दिन वो एक अजीब सा टिकट लाया | उसमें  'भारत'  कहीं नहीं लिखा था -  बांग्ला में कुछ लिखा था | "ये क्या लिखा है चन्दन?" 
ये लिखा है - बांग्ला देश |"
"क्या?" मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | 

अब तक रमेश विदेशी  डाक टिकटों की काफी डींग हांका करता था | मनमोहन के पिताजी सोवियत संघ में प्रशिक्षण लेकर आये थे | इसलिए उनके पास ढेरों विदेशी टिकट थे | इसके आलावा रमेश ने बताया था कि वोरा ने भी उसे कुछ विदेशी टिकट दिए थे | 

चन्दन ने मुझे पहला विदेशी टिकट दिया था | आखिर बांग्लादेश विदेश ही तो है | 

"तेरे पास ये स्टैम्प आया कहाँ से ?" मैंने पूछा | 

"मेरे अंकल बांग्लादेश में रहते हैं | "

"तो तेरे पास उनकी और भी चिट्ठी होगी ?"

अगले दिन चन्दन किसी पोस्टकार्ड का कोना काट कर ले आया | जैसे हमारे यहाँ के पोस्टकार्ड में  टिकट की जगह शेर की तस्वीर होती है, वैसे ही बांग्लादेश के पास्टकार्ड का कोना था वह, जिसमें कुछ हरे नारियल जैसे फल की तस्वीर थी | कीमत , नाम वगैरह सब कुछ लिखा जरूर था पर वह डाक टिकट नहीं था और मेरे किसी काम का नहीं था | 

"चन्दन ये स्टैम्प  नहीं है यार  |" मैंने कहा,"वो जो पोस्टकार्ड अंतर्देशीय या लिफाफे में  पहले से छाप के आता है, वो स्टैम्प नहीं होते |"

चन्दन थोड़ा सा मायूस हो गया ,"यार, बांग्लादेश वाले अंकल तो पोस्ट कार्ड ही ज्यादा भेजते हैं | लिफाफा तो कभी कभी आता है |"
"शायद उनके पास करने को ज्यादा बात न हो |"
"मैं उनको बोलूं कि लिफाफे में चिट्ठी भेजें और ऊपर से स्टैम्प  लगा के ?"
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पांचवी कक्षा में ढेर सारे नए छात्र आ गए | इतने सारे कि कक्षा में बेंचों की संख्या कम हो गयी | 
दो बहनजी के लड़के - राजीव सिंह और प्रेम पराग पाठक तो पहले से ही थे | तीसरे बहनजी का लड़का, राम का भाई भारत ( देखें - 'च' से चन्दन - भाग १ ) जो तीन वर्षों से बिछुड़ गया था, एक बार फिर पांचवीं में वापिस आया | हद तो तब हो गयी, जब कालकर बहनजी खुद अपने लड़के संदीप कालकर को कक्षा में ले आयीं | एक तरह से कक्षा के लिए ये एक उपलब्धि थी क्योंकि संदीप कालकर क्रिकेट का बेहतरीन बल्लेबाज़ था | दो और क्रिकेट के धुआंधार खिलाडी, फुर्तीला रवींद्र मुंशी और सत्यव्रत भी हमारी कक्षा में आ धमके | सत्यव्रत को कौन नहीं जानता था | अपने बड़े भाई सुब्रत के नक़्शे-कदम पर चल कर मुक्केबाजी और फुटबॉल में वह भी नाम कमा रहा था | 

  फुटबॉल, यानी चन्दन के एकछत्र राज्य को खतरा ? आगे देखेंगे | 

इन चारों   के सिवाय और भी नवागंतुक थे | कक्षा में एक सरदार की कमी थी | सो महेंद्र सिंह आ गया | रमेश मिश्रा और विजय पशीने भी इस सूची में थे | एक आशंका सी थी कि कहीं दूसरा दिलीप न आ जाये और ऐसा कोई भी नहीं आया | तो क्या कोई लड़की भी आयी ?
....  .......  ...... ?/?
पहले आधे साल नहीं, पर जब .. ... 
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यह तय था कि अगर हम सुबह की पाली वालों से क्रिकेट का मैच लेते तो उनकी  जबरदस्त मिट्टी पलीद करते | सूर्य प्रकाश के रूप में एक बेहतरीन हरफनमौला हमारे पास पहले ही था और अब सत्यव्रत, रवींद्र मुंशी और संदीप कालकर और जुड़  गए थे | सुबह की पाली में ले देकर एक अजय कौशल था और उसे ये चारों  मिलकर सम्हाल सकते थे | लेकिन शाला में तो कबड्डी ही होती थी और वही होनी थी | हमने कालकर बहनजी से कहा भी कि अगर क्रिकेट नहीं तो फुटबॉल मैच ही करवा लिया जाए | आखिर फुटबॉल सुबह वाले भी तो खेलते हैं | उनका जवाब सुनकर आप हँसेंगे| उन दिनों इन्हें "विदेशी खेल" माना जाता था | तो बात कबड्डी से आगे बढ़ी ही नहीं | 

 पहले कहा, कबड्डी में अब तक ये चौगड्डे  के सदस्य , विनोद धर, भोला गिरी , चन्दन दास  और सुरेश बोपचे स्थायी सदस्य थे | अब पहले कहर का मारा भोला गिरी , उसकी कबड्डी में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी | दूसरे कहर के बाद विनोद धर   भी पूर्णतः निष्क्रिय हो गया था | कहने को तो सत्यव्रत और रवींद्र मुंशी उनकी जगह भर सकते थे , लेकिन चन्दन अभी भी लगा हुआ था | उसने विनोद धर  को धर दबोचा,"तू क्यों नहीं खेलेगा बे ?"

"नहीं चन्दन यार | मुझे छोड़ दो |"
"तू खेलेगा | साले ए क मुक्का दूँगा| |दाँत  तोड़कर हाथ में दे दूंगा | तू खेलेगा |"

विनोद धर के चेहरे पर क्षीण मुस्कान की रेखा दिखी | वह जानता था कि ये चन्दन का गुस्सा नहीं, प्यार बोल रहा है | लेकिन उसने अपने आप को मानो हर तरह की गतिविधियों से अलग कर लिया था | 

चन्दन यहीं नहीं रुका | उसने कालकर बहनजी से बातें की | कालकर बहनजी ने दोनों को बुलाकर कुछ समझाया | 

यह देखकर ख़ुशी हुई कि विनोद धर भी मैदान में उतर पड़ा |  उसका पुराना जोश साफ़ झलक रहा था | एक आक्रामक के रूप में रवींद्र मुंशी और फिर सत्यव्रत की उपस्थिति ने टीम में नयी जान फूँक दी | एक बार जब विनोद धर 'आक्रामक' के रूप में गया तो दूसरे पाले की 'क्रासिंग' रेखा तक पहुँचते-पहुँचते वह सब ओर से घिर गया | हमीद, प्रमोद, जसवंत , श्याम नारायण से घिरा वह कहीं दिखाई भी नहीं दे रहा था | अचानक वह वह हवा में उछला और घेरा तोड़कर तीन तीन खिलाडियों को साथ लिए उसने मध्य रेखा छू ही दी | 

 सब कुछ करने के बावजूद हम वो मैच हार ही गए | हार का अंतर जरूर काफी कम हो गया था | फिर भी ये मलाल हमेशा रहा कि सुबह की पाली से हम कभी भी जीत नहीं पाए | 
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पांचवी कक्षा मेरे लिए सबसे मुश्किल साल था | परिवार पर मुसीबतों का आसमान फट पड़ा था | लेकिन साल के उत्तरार्ध में कक्षा के अंदर ही मुझे मानसिक तनाव के दौर से गुजरना पड़ा ( देखें राजीव सिंह की 'शोले') | समझ में नहीं आता था कि आज कौन सा दोस्त मेरा साथ छोड़ देगा | 

मेरे अब गिनती के ही मित्र बचे थे | रोज मैं जेब में हाथ डालकर मित्र निकालकर गिनती करता | चन्दन किस तरफ है - मेरी कुछ समझ में नहीं आता | राजीव सिंह जैसे पुराने और अच्छे मित्र से भला कोई  कैसे दूर हो सकता है ?
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"जागो मोहन प्यारे, जागो ,
जागो नवयुग चूमे नैन तिहारे |"

चन्दन पूरे मूड में था |  उसके बाद मानो उस पर मिरमी का दौरा पद गया हो | पूरे जोश से वह हर दिशा में हाथ पांव फेंकता हुआ चिल्लाया ,"जागो रे जागो जग जाइया जागी | जागो रे जागो जग जाइया जागी |  जागो रे जागो रे जागो रे | जागो रे जागो रे जागो रे |"

सारी कक्षा हँस- हँस के लोटपोट गयी थी | पर ना जाने क्यों मुझे लगा, चन्दन सिर्फ मुझे ही हँसाने की कोशिश कर रहा था | बार-बार उसकी आँखें मुझ पर ठहर जाती थी | उसे लगा कि शायद वह अपने प्रयास में असफल रहा तो उसने एक बार और कोशिश की | 

"सत्यव्रत के घर में सब बॉक्सर हैं | उसका बड़ा भाई बॉक्सर, उसका छोटा भाई बॉक्सर, उसके पिताजी बॉक्सर, उसकी माँ बॉक्सर |"

सारी  कक्षा ठहाके लगा रही थी | सत्यव्रत की हँसी रुक नहीं रही थी | हालाँकि सत्यव्रत के आने के बाद चन्दन का फुटबॉल के मैदान में प्रभाव बँट गया था, लेकिन दोनों के बीच में कडुवाहट कभी देखने को नहीं मिली | चन्दन ने फिर मेरी ओर देखा | फिर वह आगे बढ़ गया -"उसका कुत्ता भी बॉक्सर - भौं-भौं-भौं.... | "

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खेलकूद के नाम पर शाला नंबर में क्या-क्या प्रतियोगिताएं होती थी - बोरा दौड़ , त्रिटंगी दौड़, कुर्सी दौड़, जलेबी दौड़, चम्मच दौड़ और लड़कियों के लिए विशेष सुई धागा दौड़ और रस्सी दौड़  | एक सामान्य सी सौ मीटर की दौड़ भी होती थी  - जिसमें करीब-करीब सभी बच्चे दौड़ते थे और दो चार टकराकर और फिसलकर गिरते भी थे | फिर भी वर्ग 'ड' की विमला लड़कियों में और दुर्गाराव लड़कों में बेहतरीन धावक थे | हमारी कक्षा से चन्दन और सुरेश बोपचे त्रिटंगी दौड़ में स्थायी खिलाडी थे | भोला गिरी और विनोद धर  - निष्क्रिय होने के पूर्व बोरा दौड़ के जादूगर  थे 

अफ़सोस कि ये सब प्रतिस्पर्धाएं ओलम्पिक में नहीं होती थी | आपातकाल  का वक्त था और ओलम्पिक का साल | जिला युवा कांग्रेस को न जाने क्या सूझी कि प्राथमिक शाला के बच्चों के अंतर-शालेय ओलम्पिक कराये जाएँ | कम से कम ट्रेक एन्ड फील्ड तो कराये जा सकते है | अब भिलाई के प्राथमिक शालाओं में - गोला, भाला, चक्का भला कहाँ से आता | ये निश्चय किया गया कि हमारी शाला से उन धावकों की टीम तो भेजी जा सकती है, जिसमें संसाधनों की जरुरत नहीं पड़ती - जैसे १०० मीटर दौड़ , ऊँची कूदम लम्बी कूद | एक-एक खिलाडी ही तो भेजना है, हर स्पर्धा के लिए | 

जब कालकर बहनजी ने प्रतियोगिता के चयन के लिए नाम मांगे तो मैंने ऊँची कूद के लिए नाम दे दिया | कालकर बहनजी को भी थोड़ा अचम्भा जरूर हुआ पर उन्होंने बिना कुछ पूछे नाम लिख लिया |  कौन कितने पानी में है, ये तो शाला की टीम का चयन करने वाले निकाल ही लेंगे | 

चन्दन ने पूछ ही लिया, "ऊँची कूद ? पहले कभी किया है ?"
"हाँ |" 
"कब से ?" उसे विश्वास  दिलाना थोड़ा मुश्किल था | 
"दूसरी से|"

इक्कीस और बाइस सड़क के बीच एक खेल का मैदान था | ठीक वैसे ही जैसे १७ और १८ के बीच, १९ और २० के बीच और २३ और २४ के बीच |  १९७१-७२ में लोग ज्यादा हो गए और खेलों का कोई महत्त्व नहीं रह गया था | इसलिए भिलाई इस्पात संयंत्र ने उन खेल के मैदानों में गृह निर्माण का फैसला किया  |

बाइस सड़क के अंत में, जहाँ बड़ी पुलिया थी, उसके आगे और सात वृक्ष मार्ग  के बीच में खाली जगह बहुत थी | वहाँ बेतरतीब गड्ढे , धतूरे की झाड़ियां और कुछ पगडंडियां थी | पुलिया के पास ही बबलू भैया ने एक चौकोर गड्ढा खोदना शुरू किया | बाकी सब लड़कों ने हाथ लगाया | जब अनिल के पिताजी की नज़र पड़ी तो उन्होंने उन ट्रक वालों से , जो घर बनाने के लिए रेत के ढेर इधर उधर लगाते थे,  बातें करके थोड़ी थोड़ी रेत  उस गड्ढे में डलवाई और वहां ऊँची कूद का अखाडा तैयार हुआ |वहां दो लड़के लट्टू की रस्सी पकड़ लेते और लोग एक एक करके  आते और कूद लगाते | 

मुश्किल यही थी कि हम लोग टीम खेल में - हॉकी , क्रिकेट या फुटबॉल में ज्यादा रूचि लेते थे और उसके लिए रामलीला मैदान जाना पड़ता था जो उस अखाड़े के ठीक विपरीत दिशा , यानी शाला क्रमांक आठ की ओर था |नतीजा यह हुआ कि ऊँची कूद का वह अखाडा उजाड़ हो गया | इस बीच दो वर्ष और गुजर गए |  अब रामलीला मैदान में खेल के मैदान के पास  कन्या शाला बन रही थी तो ईंट और रेत के ढेर इधर उधर लगे रहते थे | 

 एक दिन हॉकी के खेल के बाद हॉकी  घर में  रख कर अँधेरे में मैं, मनमोहन, बबलू भैया और रमेश फिर रामलीला मैदान लौटे | एक रेत के ढेर के पास बबलू भैया ने मुझे और मनमोहन को लट्टू की एक रस्सी पकड़ने को कहा | पहले बबलू भैया ने छलांग भरी | फिर रमेश ने | उसके बाद उन दोनों ने रस्सी पकड़ी और मुझे और मनमोहन से छलांग लगाने को कहा | 

समय के साथ साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा | अब मैं करीब-करीब उतनी छलांग  लगाने लगा जितनी कि रमेश लगाता था | दुर्भाग्य से कुछ दिनों के बाद में बबलू और रमेश का झगड़ा हो गया और ऊँची कूद का वह अभ्यास भी छूट गया | फिर मन में आत्मविश्वास तो था ही | 

जब मैंने चन्दन को ये वृत्तांत सुनाया तो वह उछल पड़ा ,"तब तो तू जसवंत को हरा देगा |"

"कौन जसवंत ?" मैंने पूछा | 

"अरे, मेरे घर के पास रहता है | बहुत बड़ी-बड़ी फेंकता है | बहुत हवा भर गयी है साले में |" 

मुझे तो अपने प्रतिद्वंदियों का कुछ पता ही नहीं था |मुझे इतना पता था कि  मैं क्या कर सकता हूँ | वो क्या कर सकता है - मुझे उसका कोई अंदाजा तो था नहीं |  लेकिन पता नहीं, उसके मन में कहाँ से इतना विश्वास  भर  गया जो मेरे आत्मविश्वास से दस गुना ज्यादा बढ़ गया | मैंने कोई बढा -चढ़ाकर मनगढंत कहानी नहीं सुनाई थी | फिर चन्दन का यह भरोसा कहाँ से आ गया ?

इतना ही नहीं, चन्दन ने मुझे हिदायत दी ,"कल तू स्कूल थोड़ा जल्दी आ जा |"

ये मेरी समझ से परे था |  दूसरे दिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो चन्दन मानो मेरा ही इंतज़ार कर रहा था | सुबह वालों की छुट्टी हुई और सब चन्दन के अगल-बगल से से कुछ न कुछ उड़ाते जाने लगे \ आज चन्दन उनकी बातों को अनसुना  कर रहा था | उसकी आँखें किसी को खोज रही थीं | अचानक उसने आवाज़ दी, "अबे, सरदार सुन |"
एक लंबा सा सांवला सिख मुस्कुराता हुआ हम लोगों के पास आ गया | अरे, ये तो वही कबड्डी वाला जसवंत है | चन्दन ने मेरा परिचय कुछ इस तरह दिया -
"इसको जानता है बे ?"
"हाँ, देखा है |" जसवंत बेफिक्री से बोला | 
"मेरी कक्षा का है | तेरे को लम्बी कूद में हरा देगा | समझा न ?"

 ये चल क्या रहा था ? जसवंत ने कुछ कहा नहीं | वह बस मुस्कुराये जा रहा था | अगर चन्दन उस पर  किसी तरह का कोई दबाव बनाना चाहता था, तो उससे ज्यादा दबाव उसने मेरे ऊपर बना दिया था - उम्मीदों का दबाव, विश्वास का दबाव | उस प्रतिकार की भावना का दबाव जो हर कबड्डी मैच के बाद उसके हृदय में सुलगती थी  | 
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मैं तो समझता था , ऊँची कूद, लम्बी कूद जैसी स्पर्द्धा में गिने चुने लोग ही होंगे | एक दिन आधी छुट्टी के समय पांचवी 'ड' का रवि , शैलेन्द्र  वाजपेयी को बोल रहा था ,"अपना तोरण लाल क्या ऊँची कूद कूदता है यार  |" उसने अपने कंधे तक हाथ लाकर कहा , इतना इतना कूद जाता है | सुबह वालों को तो आराम से हरा देगा |"

चलो | एक प्रतिद्वंदी का तो पता चला | हालाँकि रवि जो ऊंचाई का दावा कर रहा था, मुझे कुछ ज्यादा लगा  | रवि खुद लम्बा था | 

मेरी शंका को शैलेंद्र वाजपेयी ने मुखरित किया ,"तू  'फोक' मार रहा है | इतना ऊँचा कोई कूद सकता है ?"

और नतीजा यह हुआ कि तोरण लाल को खोज निकाला गया | वैसे स्कूल था  ही कितना बड़ा और वर्ग 'ड' वाले तो वैसे भी तार के बाहर नहीं जाते थे | सामान्य सा मुस्कुराता हुआ चेहरा , माथे पर बीचों बीच अर्ध चंद्र के आकार में एक काट का निशान, जो लगता था, मानो प्राकृतिक तिलक लगा हो | ऊंचाई कोई बहुत ज्यादा नहीं थी | मुझसे थोड़ा सा ही लम्बा था | 

आनन् फानन में जितेंद्र गेट के पाद उगी झाड़ियों से एक डंडी तोड़कर ले आया |   रवि उसे पकड़कर खड़े हो गया | लेकिन वहीँ रेत तो थी नहीं , हाँ, दूसरी और हरी घास जरूर थी | क्या उसे चोट का डर नहीं है ? तोरण लाल ने जूते उतारे | पानी के सूखे हुए नल के पास से वह तेज़ी से दौड़कर आया और हवा में उछला | ऊपर से गुजरते हुए डंडी से उसका पाँव छू  गया | लेकिन उसके उस पार पहुँच कर वह गिरा नहीं, बल्कि लम्बा होकर लुढ़कते रहा  | तो उसकी तकनीक इतनी सधी हुई थी कि  उसे रेत की इतनी आवश्यकता नहीं थी | 
"धत", 'फाउल' होने के कारण वह खुश नहीं हुआ,"एक कोशिश और करते हैं |"

जसवंत का तो पता नहीं, लेकिन तोरण लाल की वह छलांग देखकर लगने लगा कि तोरण लाल से मैं जीत नहीं पाउँगा | पर यह सब चन्दन से कैसे कहा जाए ? मैंने उसे अप्रत्यक्ष रूप से समझाने की कोशिश की ,"चन्दन, दोपहर की पाली का कोई और जसवंत को हरा सकता है |"

"चुप बे | गोले मत दे |" चन्दन ने झिड़क दिया , "तू जीतेगा |"
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स्पर्धा थी भी तो फरवरी के पहले सप्ताह में | ठण्ड के दिन ख़तम हुए | मौसम गर्मी में बदल रहा था और ऐसे में मुझे अजीब किस्म का जुकाम हुआ |  वह भी स्पर्धा के एक दिन पहले | रात भर मैं सो नहीं पाया और ऐन  स्पर्धा के दिन सुबह सुबह मैंने उलटी कर दी | एक बार तो मुझे लगा कि में स्पर्धा में हिस्सा ही न लूँ | क्या फायदा ? एक ही खिलाडी का चयन होना है और तोरण लाल निश्चित रूप से मुझसे बेहतर कूद सकता है | लेकिन चन्दन की उम्मीदों का  बोझ कुछ इस कदर भारी था कि इस तरह पीछे हट जाना मुझे कायरता लगी | 

दोपहर को शाला जाने के पहले माँ ने मुझे बार्ली बनाकर दी | सुबह से वही मेरा आहार था | 

स्पर्धा दोपहर के दो बजे से होने वाली थी | पौने दो बजे ही कालकर बहनजी से कहकर मैं कक्षा से बाहर निकल गया | मेरे पीछे-पीछे चन्दन भी निकल आया | 

"तू स्वेटर क्यों पहना है बे ?" चन्दन ने पूछा | 

"मेरी तबीयत आज ठीक नहीं है यार |" मैंने कहा | 

"ठीक है | सब ठीक है | उसने मेरी बात को हवा में उदा दिया ,"चल स्वेटर मुझे दे दे |"

शाला टीम में  चयन के लिए धावकों की परीक्षा कहाँ ली जाए ? 

शाला के दक्षिणी छोर पर तालाब के चारों ओर पार्क बन गया था | उसके उत्तर पश्चिमी किनारे पर टेलीविजन का कक्ष  था | जिसमें एक खिड़की थी, जो उस समय बंद थी | उस खिड़की के पीछे ही टेलीविजन रखा था | पास ही अमरीकी उपग्रह से आने वाले सिग्नल को पकड़ने के लिए एक बड़ा सा कटोरे के आकर का एक  एंटीना  लगा था |  

टेलीविजन कक्ष और पार्क के बीच खाली जगह में रेत का अम्बार लगाकर एक अस्थायी अखाडा बनाया गया था | अब वहां तक कैसे पहुंचा जाए ? शाला की दक्षिणी सीमा, जो पार्क की उत्तरी सीमा थी,उसमें ऊँच ऊँचे जालीदार तारों की एक बाड़ लगा दी गयी थी | वैसे पार्क के हर दिशा में एक एक दरवाजे थे और इसलिए उत्तर  दिशा का द्वार हमारी शाला के परिसर में ही खुलता था | किन्तु बड़ी बहनजी को ये मंजूर नहीं था कि स्कूल के छात्र उस द्वार से होकर पार्क में जाएँ, इसलिए कांटेदार बाद लगाकर वह द्वार बंद कर दिया गया था | अब उस अखाड़े तक पहुँचने का एक ही रास्ता था कि पार्क के अयप्पा मंदिर वाले द्वार से घूम कर जाया जाये  | 

मैं और चन्दन शाला के गेट से बाहर निकल ही रहे थे कि पीछे से तोरणलाल आ गया |
 
"अरे विजय सिंह तुम ?" उसे भी आश्चर्य हुआ कि मैं कक्षा के बाहर कैसे घूम रहा हूँ | 

"जिसके लिए तुम जा रहे हो | ऊँची कूद |" मैंने कहा | 

चन्दन को उसका साथ होना पसंद नहीं आया | अयप्पा के पास के द्वार पर चन्दन को सामने से जसवंत आते दिखा और वह ठहर गया | तोरणलाल अंदर चले गया | 

"क्यों बे सरदार ? हारने आ गया ? देखना , आज ये तुझे बताएगा, ऊँची कूद क्या होती है ?" चन्दन बोला |  जसवंत के सांवले चेहरे पर मुस्कान दौड़ गयी | 

मेरे तोरणलाल और जसवंत के सिवाय सुबह की पाली से दो प्रतियोगी और थे | 

निर्मलकर सर हाथ में कागज़ लिए खड़े थे | रेत  के ढेर के पहले सुबह की पाली की दो बहनजी लट्टू की लम्बी सी रस्सी लिए खड़ी हो गयीं | निर्मलकर सर ने मापक टेप से ऊंचाई मापी और एक एक करके प्रतियोगियों को बुलाना प्रारम्भ किया 
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चन्दन एक और मेरा स्वेटर थामे खड़ा था | निर्मलकर सर ने जो स्तर लगाया था , मैं आश्वस्त  था कि मैं उसे आसानी से पार कर जाऊंगा | मेरा नंबर दूसरा था , जसवंत का तीसरा और तोरणलाल का पांचवां | जब मेरा नंबर आया तो मैं चन्दन के चेहरे पर तनाव स्पष्ट देख रहा था | तेजी से दौड़कर लक्ष्य के पास मैंने छलांग लगाईं | जैसे ही लक्ष्य के उस पार पहुँच कर मैंने फिर चन्दन के चेहरे की और देखा, तो वह तनाव एक राहत में बदल गया था | 

अब जब सारे प्रतिस्पर्धियों ने पहला स्तर आसानी से पार कर लिया तो निर्मलकर सर ने लघुमार्ग अपनाने का निश्चय किया | उन्होंने बाधा का स्तर एकदम से काफी बढ़ा दिया | उतना, जितना अभ्यास के समय मनमोहन का बड़ा भाई रमेश कूदा करता था | नंबर एक प्रतिस्पर्धी उसे फांद नहीं पाया और रस्सी को साथ लिए ही रेत पर धराशयी हो गया | दूसरा नंबर मेरा था | निर्मलकर सर ने मापक टेप से माप कर पुनः  स्तर का निर्धारण किया | मैंने दौड़ना शुरू किया और हताशालक्ष्य के पास पहुँच कर पूरी सामर्थ्य से छलांग लगाईं | रेत पर गिरने के बाद मैंने चन्दन का चेहरा देखा | उसके चेहरे पर अब निराशा स्पष्ट दिखाई दे रही थी | जब मैंने रस्सी की ओर  देखा तो वह धीरे धीरे हिल रही थी | एक हताशा सी छा  गयी |  जसवंत ने वह लक्ष्य सफलतापूर्वक लाँघ लिया | उसके बाद का धावक भी बुरी तरह असफल रहा  | सब से अंत में तोरणलाल ने भी वह स्तर लांघ लिया | 

 हम तीनों असफल धावकों को एक एक मौका और दिया गया | 

पहले नंबर के धावक वही कहानी फिर दोहरा दी | रस्सी से उलझकर वह रेत के ढेर में जा गिरा | दूसरा नंबर मेरा था | मैंने पुनः एक बार पूरे जोश से ताकत लगाईं और मुड़कर मैंने पहले रस्सी की और देखा | वह स्थिर थी | 

ओह , मेरा ये प्रयास सफल रहा | फिर मैंने चन्दन की ओर देखा | उसके चेहरे पर निराशा भी नहीं थी और न ही कोई हर्ष था | असफल  होने वाले तीसरे धावक ने दौड़ना  शुरू किया पर वह बीच में ही रुक गया | फिर  वह अपने प्रारंभिक बिंदु पर वापस गया | वह एक क्षण ठिठका  और फिर अलग हट गया | अब मैदान में मैं, जसवंत और तोरणलाल बच गए थे | 

अगले चक्र में निर्मलकर सर ने लक्ष्य इतना ऊपर लगाया कि शायद बबलू भैया को भी उसे लांघने में मुश्किल होती | हुआ वही - दो बार कोशिश करके भी मैं लक्ष्य पार करने में असफल रहा , जबकि जसवंत और तोरणलाल पहले ही प्रयास में उसे पार गए | जब मैं दूसरी बार रेत पर गिरा, तो मैंने चन्दन की ओर  देखा | पर चन्दन तो वहां था ही नहीं | वह मेरा स्वेटर लिए अयप्पा गेट की तरफ बढ़ रहा था | 

उसके विश्वास को ठेस पहुंची थी | उसके दिल के करीब की तस्वीरों पर खरोंच आयी थी | 

मैंने जल्दी जड़ी जूते पहने और उसकी ओर दौड़ा | 
"चन्दन, चन्दन |" 
वह रूककर मेरी ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखने लगा | 
"आज ठीक से कर नहीं पाया यार |" मैंने कहा | फिर मैंने जो कहा, वह वस्तुस्थिति तो थी, पर मुझे लगा, जैसे मैं सफाई पेश कर रहा हूँ ,"आज तबीयत भी थोड़ी खराब थी |"
"चुप बे |" वह बोला और चुपचाप चलने लगा | 

मैं रूककर देखने लगा | अगले चक्र में निर्मलकर सर ने लक्ष्य का स्तर इतना ऊपर किया  कि जसवंत और तोरणलाल दोनों ही लक्ष्य को पार नहीं  कर पाए | अब उन्हें एक मौका और दिया जा रहा था | अगर इस बार भी दोनों असफल रहते तो लक्ष्य थोड़ा नीचे करके परखा जाता |  दूसरी कोशिश में भी जसवंत नाकाम रहा | अब सारी  नज़रें तोरणलाल पर टिकी थी | मैं धीरे धीरे चलते हुए बाहर से देख रहा था | अब मैं बीस सड़क के पास, टेलीविजन कक्ष के करीब करीब समानान्तर आ गया था | अगर थोड़ा और आगे बढ़ता तो कुछ भी नहीं देख पाता | मैं वहीँ रूककर देखने लगा | इस बार तोरणलाल ने जो छलांग लगाईं तो वह बिना छुए रस्सी के उस पार पहुँच गया | 
मैं तेज़ी से चन्दन की और दौड़ा | मैंने मन ही मन निर्धारित कर लिया कि चन्दन यह समाचार किस रूप में देना  है ?

"चन्दन,  जसवंत हार गया चन्दन |" 

चन्दन ने कुछ कहा नहीं, वह चुपचाप चलते रहा | 

उसके लिए किसी की हार  ही नहीं , किसी की जीत भी महत्वपूर्ण थी | 
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आखिरकार वह बोर्ड परीक्षा आ ही गयी , जिसका इंतज़ार था | कुल चार प्रश्नपत्र थे - भाषा (हिंदी ), गणित, भूगोल और विज्ञान| | एक दिन में सुबह और दोपहर एक एक पर्चे होते थे | इस तरह दो ही दिनों में चारों पर्चे निपट गए | मैं 'ट्रिपल टेस्ट'  की पन्नी नंबर १५३ की तलाश में फिर जुट गया | आखिरी परचा होने के बाद भी मैं रुका रहा; हालाँकि मेरा पेपर बहुत पहले समाप्त हो गया था और मैं परचा जमा करके बाहर आ गया था (मैं उन लोगों में नहीं था जो परचा ख़तम करके भी समय समाप्त होने तक अंदर ही बैठे रहते थे |)  | 

नुझे चन्दन का इंतज़ार था | जब वह बाहर आया तो मैंने उसे बताया कि मैं 'ट्रिपल टेस्ट' के पन्नी नंबर १५३ की खोज कर रहा हूँ | पहले तो उसे समझाना पड़ा, कि 'ट्रिपल टेस्ट' की १८० पन्नियों में से मुझे १७९ मिल चुकी है , पर १५३ अभी तक नहीं मिली | उसका वही जवाब था -"पहले क्यों नहीं कहा ?" 

"ठीक है |" वह बोला ,"देखता हूँ- घर के आस पास तेरे जैसा कोई पागल जमा करता हो तो|"

कोशिश उसने भी की | कभी वह १६४ नंबर (गोदना) ले आता था तो कभी १६८ (भूमिगत रेल) | 
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"नहीं यार, मुझे १५३ नंबर चाहिए | गगनचुम्बी ईमारत |"  मैंने कहा ,"तू  इस कड़ी धूप में इतनी दूर से आता है |" 
"१-५-३?"
"हाँ, १-५-३| दूसरा बिलकुल नहीं | बल्कि तेरे किसी दोस्त को और कोई नंबर चाहिए और वह अदला-बदली के लिए तैयार हो जाए तो मुझे बताना | मुझे चाहिए १-५-३|"

और इसी बीच परिणाम का दिन आ गया | 
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परिणाम के दिन जो कुछ हुआ, समय ने कैसे पलटा खाया, ये आप "चोरी में हिस्सेदारी" और "राजीव सिंह की 'शोले'" में पढ़ ही चुके हैं | राजीव सिंह की रुलाई से सारा  माहौल ग़मगीन हो गया था | 

अब अंग्रेजी वर्णमाला के नाम के हिसाब से कालकर बहनजी ने नाम पुकारना शुरू किया | प्रत्येक से वह एक-एक दो-दो मिनट बातें करतीं | लगता था, वक्त ठहर सा गया हो | 

उन्होंने चन्दन का नाम पुकारा और चन्दन तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा | रिजल्ट देखते ही उसे मुख में  मुस्कान आ गयी | किसी तरह जबरदस्ती अपनी आतंरिक ख़ुशी छुपकर एक आज्ञाकारी छात्र की तरह वो कालकर बहनजी की बातें सुनते रहा और सर हिलाता रहा | फिर वह परिणाम पत्रक लेकर उसे देखते हुए लौटा | बीच बीच में वो रूक जाता और फिर चल पड़ता | 

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भिलाई विद्यालय में जाने के पूर्व एक नाटक और हुआ | सेक्टर २ के बच्चों के लिए शाला क्रमणक आठ के दरवाजे ही बंद थे | 

फिर जब दरवाजे खुले तो हमने सरपट दौड़ लगाईं (देखें राजीव सिंह की 'शोले'") | 

चन्दन ने जल्दबाजी की, उसको छठवीं वर्ग "अ" में जगह मिली | 

मैंने देर लगाईं | दाखिले की जो पर्ची मुझे थमाई गई उसमें छठवीं "ड" लिखा हुआ था | 

बाकी सब, जावले, सुबोध, सूर्य, मनमोहन - वर्ग 'स' में घुस गए क्योंकि सबने तकरीबन एक ही समय दाखिला लिया था | 

तो संयोग ऐसा कि चन्दन के साथ एक ही छत के नीचे अध्ययन या कार्य करने का अवसर फिर कभी मिल नहीं पाया | 
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(क्रमशः )




काल - १९७१-७६ 

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