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बुधवार, 19 जनवरी 2022

कोहली के सामने विकल्प ही क्या थे ?

 दक्षिण अफ्रीका से तीसरे टेस्ट हारने की टीस क्रिकेट प्रेमियों के मन से हटी ही नहीं थी कि कोहली के कप्तान पद त्याग देने का समाचार आ गया | कोई और मौका होता तो शायद उनके इस निर्णय को दक्षिण अफ्रीका से मिली हार से जोड़कर देखा जाता | लेकिन इस अवसर पर किसी को कई बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ | अगर भारत ये टेस्ट और श्रृंखला जीत भी जाता तो भी कोहली कप्तानी छोड़ ही देते | आखिर एक म्यान में दो तलवारें कैसे रह सकती हैं ? हाँ, जीत के बाद पद त्याग से उनके मन में परम संतोष अवश्य होता | लेकिन यह करीब करीब तय था कि अगर कोहली ऊँगली ना दिखाते तो अगला जरूर ऊँगली उठा देता | 

बात जब तलवारों की ही निकली है तो बाइबिल में प्रभु ईसा ने कहा ही है  - "जो तलवारों से जीता है, उसे तलवारों से ही मरना पड़ता है | " अपने खेल जीवन में मैदान के अंदर और मैदान के बाहर भी कोहली काफी आक्रामक रहे हैं | उनके इस आक्रामक रवैये की तुलना केवल एक ही पूर्व खिलाडी से की जा सकती है | संयोग से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बागडोर उसी के हाथ में है | वे हैं - सौरव गांगुली |  भारत में प्रधानमंत्री के बाद कोई और पद अगर बहुचर्चित और शक्ति, गरिमा और दायित्व का प्रतीक होता है तो वह है भारतीय  क्रिकेट टीम का कप्तान | ऐसा नहीं कि दोनों सर्वोच्च पद हैं | लेकिन जहाँ राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को किसी भी तरह नियंत्रित करने में अक्षम हैं वहीँ क्रिकेट कट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष , क्रिकेट टीम के कप्तान को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं | ये अलग बात है कि राष्ट्रपति की ही तरह वे भी विरले ही कप्तान के कामकाज में दखल करते हैं | उसके बावजूद समय समय पर कुछ ऐसे अप्रिय और विवादस्पद निर्णय से बोर्ड क्रिकेट खिलाडियों को यह अवगत कराते रहता है कि भले वे कितने भी महान क्यों न हो , उन्हें किसी और के सामने सर झुकाना ही पड़ता है | उदाहरण के बहुत दूर, बिशन सिंह बेदी तक जाने की जरुरत नहीं है - जब १९७४ में अनुशासनहीनता के मामले में उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया था | खुद भारतीय क्रिकेट बोर्ड के सर्वेसर्वा सौरव गांगुली एक खिलाडी के बतौर इसे झेल चुके हैं | 

मैदान के बाहर कोहली की आक्रामकता , जो कभी अनुशासनहीनता के रूप में झलकती है , पीढ़ियों के अंतर से स्पष्ट समझी जा सकती है | जीवन के हर पहलू में यह अंतर स्पष्ट देखा जाता है | पहले जहाँ लोग बुजुर्गों  का सम्मान उनके अनुभव से अर्जित ज्ञान और सलाह के लिए करते थे, आज के इस गूगल दौर में उनकी कोई अहमियत नहीं रह गयी है | बल्कि नयी पीढ़ी बुजुर्गों  किसी भी ऐसी सलाह को पहले खुद सूचना माध्यम की कसौटी पर परखती है | क्रिकेट भी इससे अछूता नहीं रहा है | आविष्कार और अन्वेषण ने भी  क्रिकेट को कहाँ से कहाँ तक पहुंचा दिया है |  आजकल बल्लेबाज़ ऐसे शॉट खेलकर रन  बटोरते हैं, दस पंद्रह साल पहले उनकी कल्पना ही की जा सकती है | गेंदबाज़ ऐसी गेंदें फेंकते हैं, उनकी गेंदबाजी में इतनी विविधता होती है , जो पहले कभी देखी  नहीं गयी | और तो और, आज के खिलाड़ी  क्षेत्ररक्षण के लिए मैदान में कहीं ज्यादा फिट है | आज अगर कोई कैच छूटता भी है तो बात बहुत दूर तक निकल जाती है | 

क्या कमी है नयी पीढ़ी के खिलाडियों के पास? पैसा, शोहरत , हर तरह के मनोरंजन, चाहने वालों की भीड़ सब कुछ तो है | जो थोड़ी बहुत कसर थी वो आई. पी. एल. जैसी प्रतिस्पर्धाओं ने पूरी कर दी | फिर भला वे बुजुर्गों का सम्मान क्यों करें ? आखिर उन्होंने देश को मान सम्मान दिलाने में कोई कमी नहीं रखी | फिर थोड़ा बहुत अनुशासनहीन होने में क्या बुराई है ? 

कोहली इसी पीढ़ी के प्रतीक हैं | जो मैदान के अंदर जान लगा देता है , पर मैदान के बाहर आज़ादी चाहता है | लेकिन ऐसे लोग भूल जाते हैं कि ऐसा करके वे एक बड़े वर्ग की सहानुभूति खो देते हैं जो उनकी तब सहायता कर सकते हैं, जब उनको उसकी सख्त जरुरत हो | आज हरेक पद के लिए एक एक नहीं कई दावेदार हैं | होड़ लगी है | ऐसे में जब प्रदर्शन थोड़ा भी ढीला होता है तो लोग ऐसी हर गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर देते हैं, जिसका खेल से कोई लेना-देना नहीं होता | फिर भी लोग समीकरण  बिठा बिठाकर ये दिखाने की कोशिश करते हैं कि स्तर में गिरावट की असली वजह क्या है ?

कोहली का बल्ला अभी खामोश नहीं हुआ है | कल के एक दिवसीय मैच मैं उन्होंने ५१ रन की महत्वपूर्ण पारी खेली है | वे थोड़े भावुक भी हैं और पूरे दिल से, पूरी लगन से खेलते हैं | कप्तान के रूप में उन्होंने भारत को अगले स्तर पर पहुंचा दिया है | बतौर कप्तान  उनका कोई विकल्प निकट भविष्य में नहीं दिखता | या तो लोग काफी युवा हैं, या काफी पुराने | फिर टीम में उस खिलाड़ी की जगह स्थायी भी तो होनी चाहिए | उसे अपने खुद के प्रदर्शन से लोगों को उत्साहित करने की क्षमता तो होनी चाहिए | माइक ब्रेयरली का ज़माना तो है नहीं | 

ऐसे मैं कोहली विवादों से दूर, एक खिलाड़ी के रूप में पूरी सक्षमता के साथ टीम को संकट से उबारते रहें तो उनकी छवि और भी निखर जायेगी | कोई जरूरी नहीं कि हर कोई राम हो | टीम में हनुमान की भी जरुरत होती है | ख़ामोशी से यह कार्य तेंदुलकर वर्षों से करते आये थे | 







सोमवार, 3 जनवरी 2022

कोहली की कप्तानी में आखिर खराबी क्या है ?

आज भारत और दक्षिण अफ्रीका के मध्य दूसरा टेस्ट शुरू हुआ और विराट कोहली पीठ के दर्द के कारण खेल नहीं रहे हैं | बहुत से लोग ये शंका ज़ाहिर करेंगे कि कहीं कोहली जानबूझकर तो ऐसा नहीं कर रहे हैं | आखिर पिछले चार महीनों से कप्तानी को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसने लोगों को एक ऐसी  सूक्ष्मदर्शी पकड़ा दी  है, जिसके द्रारा वे  कोहली  से जुडी  छोटी से छोटी बात की भी वे विवेचना कर सकें और कहीं न कहीं कप्तानी विवाद से जोड़ सकें | 

कोहली आखिर कैसे कप्तान हैं, उसे समझने से पहले ये समझाना आवश्यक है कि कोहली कैसे इंसान हैं | दस साल पहले २०११-१२ को भारतीय टीम ऑस्ट्रेलियाई दौरे में ४-० से बुरी तरह परास्त हुई थी | एडिलेड के चौथे टेस्ट में कोहली शतक से दो रन दूर  थे| दूसरे छोर पर इशांत शर्मा थे | वैसे तो इशांत शर्मा ने उनका अच्छा साथ दिया था, लेकिन किसी भी क्षण पारी का अंत हो सकता था | कोहली ने गेंद मिड विकेट की और धकेली | पहला रन तेज़ी से पूरा किया | दूसरा रन, यानी शतकीय रन दौड़ते- दौड़ते ही उन्होंने उल्लास में भरकर बल्ला उठा दिया |  तब इयान चैपल कमेंटरी कर रहे थे | उनके मुंह से निकला, "क्या कोहली रन पूरा करने के बाद अपनी  प्रफुल्लता  व्यक्त नहीं कर सकते थे ?"

वास्तव में वो बहुत ही मुश्किल दौरा था | भारतीय टीम के पास ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे टीम को कभी मुस्कुराने का मौका भी  मिले |  ऐसे में कोहली के दिमाग पर उनके दिल की भावनाएं हावी हो गयी | वे अपने दिल के विचार कभी भी अपने अंदर नहीं रखते, बल्कि उसे जाहिर कर ही देते हैं | चाहे वो स्टीव स्मिथ का एल. बी. डब्ल्यू।  के रिव्यू लेने के पहले पेवेलियन की ओर देखकर संकेत की प्रतीक्षा का मामला हो या फिर करूण नायर के तिहरे शतक के बाद भी प्रेस में रहाणे को उनके ऊपर तरजीह देने की बात | और अभी कुछ दिन पहले दक्षिण अफ्रीका जाने के पूर्व की प्रेस कांफ्रेंस ने तो हंगामा खड़ा कर दिया | 

किसी ज़माने में रोहित शर्मा उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे | पता नहीं, किस अनबन को मीडिया ने इतना तूल दे दिया | बात दो बीवियों की एक दूसरे को अपने सोशियल मीडिया अकाउंट से 'अनफ्रेंड' करने से हुई और समाचार बनाने वालों को मसाला मिल  गया | रवि शास्त्री ने ठीक ही कहा था कि लगता है, मैदान के अंदर खिलाड़यों के प्रदर्शन से ज्यादा मैदान के बाहर महिलाओं की अनबन में मीडिया को ज्यादा दिलचस्पी है | ऐसे मौकों पर रवि शास्त्री कोहली के साथ ही खड़े नज़र आते रहे | क्या  बुराई है इसमें ? किसी प्रशिक्षक का काम टीम तोडना तो नहीं होता |  

कुंबले के साथ उनकी तकरार  नए ज़माने की नयी सोच का ही नतीजा था  | आज खिलाडी कोई तपस्वी नहीं होता कि खेल  के सिवाय उनकी कोई और ज़िन्दगी न हो | कि एक मैच ख़त्म होते ही वह दूसरे मैच की तैयारी की मानसिकता बना ले | जीत हो या हार, मैदान में पूरा ध्यान लगाने के पश्चात वह थोड़ी आज़ादी चाहता है | वह जानता है कि खुली हवा में सांस लेने के पहले ही अगला दौरा या मैच आ जायेगा | अगर चुना जाए तो भी तनाव, न चुना जाये तो भी कुण्ठा | 

वैसे खेल के दौरान  समर्पण की भावना खिलाडियों में कूट-कूट कर भरी है और इस मामले में कोहली उनका नेतृत्व करते नज़र आते हैं | यही कारण है कि शुरू से ही उन्होंने पांच गेंदबाजों की जो रणनीति  बनाई, उससे कभी पीछे नहीं हटे | इतना ही नहीं, वे पांच गेंदबाजों  के दल भी पिच और श्रृंखला , स्पिन लेने वाली एशियाई पिचों वाली या उछाल भरी तेज़ पिच के हिसाब से बदलते रहे | ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था | 

शायद यही कारण है कि उन  खिलाडियों को , जो आंकड़ों की किताबों में सर्वोत्तम थे , पर पिच के हिसाब से उतने प्रभावी नहीं हो सकते थे जितना एक पिच के अनुकूल गेंद करने वाला नौसीखिया हो सकता था , बाहर बैठना पड़ा | उनके गले यह बात नहीं उतरी  कि कोहली  के लिए जीत ही सर्वोपरि थी और है | अगर वह टीम में कोई फेरबदल या बदलाव चाहता है तो वह विपक्षी की रणनीति को पलटने या उनकी ही बिल्ली की पूँछ मरोड़ने के लिए होता है, जिससे वह उन्हें ही  'म्याऊं' कर सके | 

 जीत के इस महत्त्व को उन्होंने खुद पर भी लागू किया | पिछले वर्ष आई. पी. एल. के दौरान अपनी कप्तानी छोड़ दी | टी. २० की कप्तानी छोड़ने के पीछे भी उन्होंने वही तर्क दिया | जो खिलाड़ी अपने प्रदर्शन से टीम का प्रेरणास्त्रोत न बन सके, उसके लिए बेहतर है कि पहले अपने प्रदर्शन पर ध्यान दे, ताकि टीम के अंदर और बाहर कोई उस पर उंगली ना उठा सके | 

अगर अश्विन को उन्होंने सफ़ेद गेंद वाले मैचों से बाहर रखा तो वह एक रणनीति के तहत था | ताकि टेस्ट मैचों के दौरान वे फिट और ऊर्जा से भरपूर  रहें , सफ़ेद गेंदों की गेंदबाजी की आवश्यकता और प्रदर्शन उनके टेस्ट मैचों की गेंदबाजी को प्रभावित न करे और वे "ओवर एक्सपोज़ " न हों ताकि उनकी गेंदबाज़ी की धार टेस्ट मैचों में बरकरार रहे |  

ऐसा नहीं लगता कि कोई उनका पसंदीदा खिलाडी था या है | जो फिटनेस टेस्ट पास न कर पाए, चाहे वह ऋषभ पंत हो या रोहित शर्मा, टीम में उनके लिए जगह नहीं है | अगर उनके लिए टीम सर्वोपरि नहीं होती तो शिखर धवन अब भी तीनों फॉर्मेट में खेलता, इशांत की जगह हर टेस्ट में पक्की  रहती और चहल सफ़ेद गेंदों वाले मैच के साथ साथ टेस्ट टीम के भी स्थायी सदस्य रहते | एक-दो अपवादों को छोड़कर नए खिलाड़ियों को मौका देने में उन्होंने कभी देर नहीं लगाईं | 

विजय शंकर के बारे में काफी कुछ कहा गया | हर कप्तान का स्वप्न होता है कि उनकी टीम में , खासकर एक दिवसीय टीम में ज्यादा से ज्यादा हरफनमौला खिलाडी रहे | इसलिए अगर उन्होंने रायडू के बदले विजय शंकर को चुना तो कोई गलत  नहीं किया | 

आलोचकों ने सुर में सुर मिलाया कि पिछले वर्ष के ऑस्ट्रेलियाई दौरे ने ये दर्शा दिया कि कोहली के बिना भी टीम जीत सकती है | किन्तु उस जीत के पीछे कोहली की दूरदर्शिता को सबने नज़रअंदाज किया | सामान्य परिस्थितियों में नटराजन और वाशिंगटन सुन्दर को टी २० के बाद भारत लौट जाना चाहिए था | लेकिन टीम मैनेजमेंट ने उन्हें साथ रखा | सैनी कई विदेशी दौरों से भारतीय टीम की नेट गेंदबाज़ी का हिस्सा रहे थे | ये एक तरह  कोहली की ही दूरदर्शिता थी, जो उन्होंने नेट गेंदबाज़ों के रूप में उन गेंदबाज़ों को भी साथ ले  जाने का फैसला किया जो भविष्य में कभी भी टीम का हिस्सा बन सकते थे | 

अफ़सोस की बात ये है कि कोहली के खिलाफ उन खिलाड़ियों ने बिगुल फूंका जिन्हें  कोहली ने बहुत ज्यादा, बल्कि जरुरत से ज्यादा ही लम्बी रस्सी दी | सूत्रों की मानें तो रहाणे और पुजारा ने सितम्बर में ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को पत्र लिखकर बगावत का बिगुल फूँक दिया था | उनका कोहली ने इस कदर समर्थन किया कि आज कोई भी उनका उदाहरण देकर कोहली पर पक्षपात का आरोप लगा सकता है | हो सकता है, उस समय कोहली ने उन्हें अपने प्रदर्शन सुधारने को कहा हो और उनके मन में असुरक्षा की भावना आ गयी हो | आज तो कोहली टीम में नहीं थे | उसके पूर्व भी न्यूज़ीलैंड के खिलाफ एक मैच में कोहली टीम में नहीं थे |  उन पर कोई दबाव नहीं था | फिर क्यों उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट नहीं रहा ? उन्हें किस किस्म का कप्तान चाहिए या फिर उन्हें खुद कप्तानी करनी है ?
 
इन तीन खिलाडियों के सिवाय शायद बाहर बैठे तीन खिलाडी कोहली को अपने खेल जीवन के लिए कोस सकते हैं - कुलदीप यादव, रायड़ू  और करुण नायर | उम्र अभी भी कुलदीप के साथ है | वे वापसी कर सकते हैं | भारतीय टीम से बाहर होने के बाद करुण नायर को भारत 'ए' टीम में काफी मौके मिले | हाँ , रायड़ू जरूर दुर्भाग्यशाली रहे | 

तो जिस कोहली को एक खिलाड़ी  के रूप में समझने के लिए इयान चेपल की उपरोक्त पक्तियां काफी हैं, कोहली की  कप्तानी का सार उन्हीं इयान चेपल की ये पंक्तिया बयान करती हैं ,"आज तक मैंने क्रिकेट के  किसी भी कप्तान को विरोधी खिलाड़ी के आउट होने पर कभी इतना उल्लास मनाते नहीं देखा |"

बिलकुल, कहे के मैदान में वे डूब आते है उनकी नज़र लक्ष्य पर ही होती है | 














मंगलवार, 19 जनवरी 2021

सिराज, सैनी, नटराजन , शार्दुल, वाशिंगटन - गौरव गाथा का अंत ?

 कभी भी देखी  या सुनी है ऐसी कहानी ? कप्तान  टीम के साथ नहीं ! सारे  मुख्य गेंदबाज अनफिट ! मैच शुरू होने के पहले जो नए  पांच गेंदबाज टीम में थे, उन्होंने कुल मिलाकर तेरह विकेट लिए थे |  जब मैच शुरू हुआ तो उनमें से भी एक गेंदबाज और अनफिट हो गया | एक गेंदबाज को पिछले मैच में रंगभेदी अपशब्दों से अलंकृत किया गया था |  यानी  मनोबल तोड़ने की पूरी कोशिश थी | 

टेस्ट क्रिकेट के १४३ साल के इतिहास में ऐसी कोई मिसाल है ?

शायद नहीं  | 

पर अब - सब कुछ समाप्त हो गया | कारवां का गुबार कुछ दिनों में बैठ जायेगा | जयमाला के फूल मूरझा जायेंगे  | तब न चाहते हुए भी यथार्थ से आँखें मिलाना पड़ेगा | 

निर्विवाद रूप से इनमें से कुछ खिलाड़ी एक दिवसीय मैचों में या फ़टाफ़ट बीस ओवर वाले मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे | इसमें कोई शंका नहीं है | पर क्या इस टोली का कोई भी खिलाड़ी क्या भारत के लिए  कोई और टेस्ट मैच खेल पायेगा ? शायद नहीं | 


भारत का अगला दौरा घरेलू मैदान पर है | ले देकर भारत अधिक से अधिक दो तेज गेंदबाज शामिल करेगा | यदि बुमराह फिट होंगे तो वो तो रहेंगे ही | दूसरे गेंदबाज उमेश, इशांत या अगर शमी फिट हो जाएँ तो वो रहेंगे | ये भी हो सकता है कि भारत हार्दिक को बुला ले | आप खुद सोचकर देखिये - शार्दुल या हार्दिक- आप किसे चुनेंगे ?

सवाल वही  है | वाशिंगटन स्पिनर  हैं | यह ज़रूर है कि भारत तीन स्पिनर्स के साथ खेलेगा | लेकिन वाशिंगटन या आश्विन - घरेलु मैदान में आप किसे चुनेंगे? दोनों एक जैसे ऑफ़ स्पिनर्स हैं | फिर आपके पास अगर जडेजा फिट हों तो वे या फिर कुलदीप दूसरे स्पिनर के रूप में खेलेंगे | फिर नदीम ने क्या गुनाह किया कि अच्छे प्रदर्शन के बाद आप उसे भुला देंगे? 

भारत का अगला दौरा घरेलू मैदान पर है | ले देकर भारत अधिक से अधिक दो तेज गेंदबाज शामिल करेगा | यदि बुमराह फिट होंगे तो वो तो रहेंगे ही | दूसरे गेंदबाज उमेश, इशांत या अगर शमी फिट हो जाएँ तो वो रहेंगे | ये भी हो सकता है कि भारत हार्दिक को बुला ले | आप खुद सोचकर देखिये - शार्दुल या हार्दिक- आप किसे चुनेंगे ?

सवाल वही  है | वाशिंगटन स्पिनर  हैं | यह ज़रूर है कि भारत तीन स्पिनर्स के साथ खेलेगा | लेकिन वाशिंगटन या आश्विन - घरेलु मैदान में आप किसे चुनेंगे? दोनों एक जैसे ऑफ़ स्पिनर्स हैं | फिर आपके पास अगर जडेजा फिट हों तो वे या फिर कुलदीप दूसरे स्पिनर के रूप में खेलेंगे | फिर नदीम ने क्या गुनाह किया कि अच्छे प्रदर्शन के बाद आप उसे भुला देंगे? 

भारत में घरेलू मैदान में स्पिनरों की कमी नहीं है | अक्षर , जयंत , जलज सब कतार में हैं | फिर आप कभी चहल को भी टेस्ट क्रिकेट में आजमाना चाहेंगे | 


तेज गेंदबाज़ों के लिए मौका तभी बनता है जब भारत की टीम उपमहाद्वीप से बाहर निकलती है |  अफ़सोस की बात है कि ऐसे दौरे मीक़ात भविष्य में होने वाले नहीं हैं | तब तक मुख्य गेंदबाज़ फिट हो जायेंगे | लोगों की याददाश्त भी कमज़ोर  होती है | सच कहा जाए तो वाशिंगटन सुंदर के अलावा बाकी  सारे खिलाडी पच्चीस पार कर चुके हैँ | कुछ ही दिनों में इन्हें युवा खिलाड़ियों की नयी खेप से मुकाबला करना पड़ेगा | 

काश - ऑस्ट्रेलिया की यह श्रृंखला कुछ और लम्बी होती |