रविवार, 28 अगस्त 2011

हप्पू की बम बम 2

सबने तो सर्कस देख ही लिया - एक एक करके ...| सिर्फ मैं ही रह गया था |
और तो और, एक दिन फेंटा विलास के पीछे की सीट पर अपनी मम्मी के साथ दुबका हुआ शशांक मुस्कुराता हुआ हम लोगों के सामने से गुजरा | जब वह वापिस आया तो उसकी मुस्कान इतनी चौड़ी हो गयी थी कि ओंठ फाड़कर दांत बाहर निकल रहे थे | ख़ुशी चेहरे में समा नहीं पा रही थी |
"मैंने सर्कस देख लिया |" उसने आते आते दस मीटर की दूरी से ही ऐलान कर दिया |
किससे कहूँ ? कैसे कहूँ ? व्यास भैया तो सेक्टर ५ चले गए थे | राम लाल और श्याम लाल मामा भी नौकरी की तलाश कर रहे थे |कभी सायकिल लेकर निकल जाते तो कभी पैदल ही | कौशल भैया तपस्वी की तरह आँगन में जमे हुए थे - विद्यालय की पढाई का आखिरी साल था |
आशा की एक क्षीण किरण थी | अगर किसी दिन बबलू भैया बिफर कर अपने गुस्से का झंडा ऊँचा कर दें तो तय था कि उनके साथ साथ हमें भी सर्कस देखने मिल जाएगा |
"तूने सर्कस देखा बे ?" टीटू के भाई मीटू ने एक दिन पूछा |
"नहीं |" मैंने कहा |
"तेरे पिताजी कंजूस हैं |"
मुझे बात चुभ गयी और मैं उस पर पिल पड़ा |
मुझे लड़ते देखकर मुन्ना और बबन अपना अपना चक्का छोड़कर दौड़े दौड़े आये | उधर अंकू और राजी भी भागकर मीटू की सहायता के लिए पहुँच गए | देखा जाये तो इक्कीस और बाइस सड़क के बीच घमासान मच जाता ; पर मामला किसी तरह टल गया |
हम लोग मैदान के बीच से अपने सड़क की ओर आ रहे थे | हम रह -रह कर पलट कर घुर कर देखते और ये पाते कि वो भी पलट कर देख रहे हैं | मुन्ना बुदबुदाया ," सरदार जी की खोपड़ी में बारह अंडे थे ....|"

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शाला क्रमांक  आठ से चींटी की कतार की तरह बच्चे निकले | कतार के दोनों और हाथ में मोटी मोटी सोटियाँ लिए शिक्षिकाएं चल रही थी | बच्चों की वह कतार सड़क तीन के पीछे वाले मैदान से होती हुई डबल स्टोरी के सामने से गुजरी |
वे चलते ही रहे और रेल पटरी के पार दूसरी दुनिया में खो  हो गए |
उनके आँखों से ओझल होते ही, मानो मेरी आशा भी धूल में मिल गयी | स्कूल की ओर से सर्कस जाने वाले बच्चों में बबलू भी एक था |

माँ से मैंने हिम्मत करके पूछा ," माँ , हम लोग सर्कस कब जायेंगे  ?"
घर में इतने सारे तो लोग आते जाते थे , रहते थे | अधिकतर तो मेहमान ही होते थे | अगर सर्कस जाएँ तो सबको साथ ले जाना पड़ेगा | या पता नहीं, माँ को खुद भी कोई दिलचस्पी नहीं थी | घर के काम से फुर्सत जो मिले |

आज सोचता हूँ तो लगता है  कि माँ के पास उस समय भी ढेरों जवाब हो सकते थे ," तुझे तनी हुई रस्सी पर चलती लड़की देखना है ? मैं चलकर दिखाऊं  ?" या फिर ,"सर्कस में क्या देखना है ? करतब दिखाते लोग ? घर में आने जाने वाले लोगों को देखा नहीं तूने ?" अथवा ," गिनना कौन सी बड़ी बात है ? हाथी हो या बच्चा - कोई भी गिन सकता है | उससे बड़ी बाजीगरी है, हिसाब लगाना और हिसाब रखना | अपने बाबूजी से पूछ ..|"

और गाहे बगाहे, आग में घी डालने , सर्कस के टेम्पो सड़क में चक्कर मारने आ ही जाते थे ," अब देख ही लीजिये | आग उगलती हुई लड़की , दर्पण में देखकर निशाना लगाने वाले निशानेबाज, खूंखार दरिंदों से घिरा रिंग मास्टर  ...... ........ ..... दूध की बोतलें गिनने वाला सबका प्यारा हाथी गनपत ..."

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केवल हम दो ही थे - मैं और मुन्ना ....|
शाला नंबर आठ से सर्कस की ओर गए बच्चों के क़दमों के निशान मिटे नहीं थे शायद .. | अगर मिट भी गए हों तो क्या - एक अनजान शक्ति हमें खींच रही थी | हम मन्त्र मुग्ध से बस चले ही जा रहे थे |
मुन्ना ने जेब में ढेर सारे कंकड़ भर लिए थे और वह थोड़ी थोड़ी दूर चलने के बाद वह एक एक कंकड़ गिरा देता था | आखिर इतनी दूर जा रहे थे - अकेले | किसी को बिना बताये .... पहली बार ... | मुन्ना का तरीका अच्छा तो था,पर डबल स्टोरी के  पास पहुंचते - पहुँचते सारे कंकड़ ख़तम हो गए |
डबल स्टोरी के सामने की सड़क भी हम लाँघ गए | अब गड्ढों से भरा के छोटा सा मैदान था , फिर रेल पटरी के समानांतर चलती डामर की चौड़ी सड़क | जैसे जैसे हम लोग रेल पटरी के पास पहुँचने लगे , दिल तेजी से धड़कने लगा |
एक सवाल और एक आशंका जो मेरे मन में बहुत दिनों से बैठी थी , जो हर बार जुबान पर आते आते रुक जाती थी , अब अनजानी आशंका से दिल इतनी तेजी से धड़का कि वह सवाल उछलकर बाहर आ ही गया |

"मुन्ना , एक बात बता |"
" हाँ , पूछ | " अब हम रेल पटरी के समानांतर चलती सड़क दौड़ कर पार कर रहे थे | उन दिनों इतने वहां तो थे नहीं , फिर भी सड़क दौड़ कर पार करने की आदत पड़ गयी थी | तेज धुप से सड़क गरम हो गयी थी और नंगे पाँव जलने लगे थे | शायद ये भी एक वजह थी - दौड़ कर सड़क पार करने की | सड़क पार करते ही मैं एक क्षण के लिए रुका और मैंने सवाल पूछ लिया , "तेरा भाई कैसे मर गया मुन्ना ?"

मुन्ना एक क्षण के लिए उदास हो गया ," रात के सोते समय  बिस्तर से लुढ़क कर नीचे गिर गया |"
"तुझे याद है क्या ?" मैंने पूछा |
"नहीं | मैं तो बहुत छोटा था |"
"मरने के बाद सब लोग कहाँ जाते हैं ?"
"पता नहीं | "

यह तो मुझे भी नहीं मालूम था | आज भी नहीं मालूम है | पता नहीं किसे मालूम है ? लक्ष्मी भैया ने मुझे एक बार स्वर्ग और नरक की कहानी सुनाई थी | मैंने उसका जिक्र मुन्ना से किया |
" मुझे मालूम है | माँ कहती है, मेरा भाई स्वर्ग गया है |" वह कह कर फिर चुप हो गया |
"अगर हम लोग एक बहुत ऊंची सीढ़ी बना लें ,...बहुSSSत ऊँची ... बादल से भी ऊँची | फिर उस पर चढ़ कर हम लोग स्वर्ग जा सकते हैं |"
" वो तो बहुत ऊँची सीढ़ी होगी | उसको टिकाना भी पड़ेगा न |"
अब मैंने वह बचकाना सुझाव पेश कर ही दिया जो उस दिन से मेरे मन में खटक रहा था |
"अगर हम लोग सर्कस की लाइट पकड़ पकड़ कर चढ़ जाएँ तो स्वर्ग तक पहुँच जायेंगे | पर तेरा भाई तो बड़ा हो गया होगा | तू उसे पहचान लेगा ?"
"पता नहीं | वहां बच्चे तो कम होंगे न ? पर लाईट पकड़ के ऊपर कैसे जायेंगे ?"
"जैसे पेड़ पर चढ़ते हैं |"
"सर्कस वाले ने लाईट बंद कर दी तो ?"

अब रेल पटरी के चढाव पर हम लोग सम्हल सम्हल कर चढ़ रहे थे | दूर दूर तक कोई रेलगाड़ी नहीं दिखाई दे रही थी | अब दो रेल की पातें दिखने लगी - आने और जाने वाली | दोनों पांतों के बीच में थोडा फासला था |

... तो  यह  थी  रेल  पटरी  के  पार  की दूसरी  दुनिया  ...
.... और दूर सर्कस का तम्बू दिखने लगा | रेल पटरी के उस पार - दूर तक खाली मैदान था | उसमें ही दूर , कहीं बहुत दूर एक बड़ा सा तम्बू दिखाई दे रहा था | अभी मुश्किल से ग्यारह बजे थे |सर्कस का शो तो तीन बजे से पहले नहीं शुरू होगा | रेल पटरी के दूसरी ओर की ढलान पर हम लोग नीचे उतर गए और चलते दौड़ते, दौड़ते , उछलते चलने लगे |
तभी रेल के इंजन की सीटी की कर्कश आवाज़ सुनाई दी |वैसे भी हम लोग ढलान से नीचे उतर चुके थे | पर आवाज इतनी तेज थी कि हम बिदक कर और दस कदम दूर भागे |

पहली बार मैं  रेल गाड़ी का ईंजन इतने पास से देख रहा था | विशालकाय काले दानव जैसा - फक फक धुआं छोड़ रहा था |  हमारे पास से मंथर गति से चलता हुआ वह निकला | वह एक लम्बी सी रेल गाडी थी | ईंजन की आवाज़ ही ऊँची थी, रफ़्तार तो काफी धीमी थी |  इतनी धीमी कि हमें ईंजन की भट्टी साफ़ दिखाई दे रही थी | इतना ही नहीं, भट्टी के पीछे रखा बड़े बड़े टुकड़ों वाला कोयले का ढेर दिखाई दे रहा था | सर पर लाल रंग का रुमाल बाँधे, पसीने से लथपथ , हाथ में बेलचा लिए दो आदमी दिखाई दे रहे थे | वे रुक रुक कर कोयले के ढेर से कोयला निकाल निकाल कर भट्टी में डाल रहे थे |
आदत से मजबूर, रेलगाड़ी देखते ही हम दोनों ने हाथ हिलाना शुरू किया | एक खलासी ने हमें हाथ हिलाते देख लिया , उसने भी हाथ हिलाया |
गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ी | मुन्ना अभी भी " टा टा "  कर रहा था |
" यार, हम लोग रेलगाड़ी को 'टा टा' क्यों करते हैं ? " मैंने पूछा |
"'टा टा' करना चाहिए | क्या पता उसमें हमारा कोई चाचा या मामा बैठा हो |"
"पर ये तो माल गाड़ी है |"
"उससे क्या हुआ ? ड्राईवर तो रहता है | गार्ड तो रहता है | हो सकता है , गार्ड के डिब्बे मैं मेरे दादा जी झंडी लेकर बैठे हों |"
बात सच थी | मुन्ना के दादा जी गार्ड थे |
"वो ड्राईवर तुझे जानता था क्या ?"
"नहीं|"
"तो उसने तुझे 'टा टा' क्यों किया ?"
बेतुके सवालों की झड़ी से मुन्ना भन्ना गया |

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तो ये रहा सर्कस ....|
चार घंटे बाद, पहले शो के समय भले ही उधर रेलम-पेल मचने वाली हो, पर इस समय ,जबकि मध्यान्ह भी नहीं हुआ था, सब कुछ शांत था | वे इन्सान और जानवर, जिन्होंने शहर में धूम मचा रखी थी, वे बड़े-बड़े, काफी विशालकाय पोस्टरों पर मुख्य द्वार और उसके आस पास गोलाकार दीवारों के रूप में दूर तक विराजमान थे |पर वे मूर्त रूप में थें कहाँ ?
वे थे एस्बेस्टस की उन चादरों के पीछे जो  सर्कस के प्रांगण  की चाहरदीवारी  के रूप में बनी थी | वह गोलाकार घेरा मुख्य तम्बू से कुछ अलग हटकर था | शायद सर्कस के कलाकारों के खानाबदोश जीवन में कुछ दिनों के लिए उनका डेरा था | इसके अलावा छोटे छोटे  तीन चार तम्बू और थे | टिकट खिड़की अभी सूनी थी |

और वो लाईट के स्त्रोत कहाँ हैं ? कहीं दिखाई   नहीं दे रहे हैं |

तो वे अजूबे, वो कलाकार, वो आकर्षण , वो जादूगर इन पर्दों के पीछे हैं ... | हमारे जैसे कतिपय और बच्चे भी अपने चहेतों की एक झलक पाने के लिए घूम रहे थे | | उनमें से कुछ ने तो एस्बेस्टस की उन शीटों में दरार या सुराख़ भी खोज ली थी और वे चुपके से अन्दर झाँक रहे थे | बाकी , कुछ दूर खड़े उनके हटने की प्रतीक्षा कर रहे थे |ऐसे ही एक बच्चा हटा और मैं टूट पड़ा | मुन्ना को भी बगल के एक झरोखे में मौका मिल ही गया |

अन्दर क्या था ? सामान्य से लोग ही तो थे वे | लुंगी पहन कर तीन की कुर्सियों में बैठे पता नहीं, किस भाषा में बातें कर रहे थे | शायद छोटा या बड़ा सुरेश या सोगा , मगिन्द्र होते तो समझ सकते थे | चार पांच मोटी मोटी काली कलूटी लड़कियां इधर उधर धूम रही थी | एक आदमी हाथ में डंडा लिए कुत्तों को बॉल पकड़ने की ट्रेनिंग दे रहा था | ओह हो, वो देखो | एक कोने में शेरों के पिंजड़े हैं | शेर अलसाए हुए पाँव पसारे लेटे हुए थे |
और हाथी ? वो उस कोने में - तीन छोटे तम्बुओं में से एक में ... उनके सामने चारा फैला हुआ था | पूँछ हिलाते हुए सामने रखा चारा सूंड से उठाकर मुँह में डाल रहे थे | मक्खियाँ भगाने के लिए पाँव भी हिला रहे थे तो ऐसा लग रहा था मानो संगीत की धुन पर थिरक रहे हों |
"सड़ाक ...., " अचानक मेरा पेंदा गरम हो गया ....| अभी कुछ सम्हल पाता कि 'सड़ाक' - दूसरा सोंटा जांघों में पड़ा | बिना कुछ सोचे समझे मैं वहां से सरपट भागा |  भागते-भागते मैंने देखा , एक छोटा, बेहद छोटा सा आदमी - हाँ , बच्चा नहीं, सफ़ेद कुरता पायजामा पहने नाटा सा आदमी हाथ में मोटा सोंटा लिए इधर उधर भाग रहा था और दरार या सुराख़ से झांकते बच्चों की पिटाई कर रहा था | सिर्फ उन्हें वहां से भगाना ही उसका ध्येय था | पीछा करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | दर्शनीय दृश्य था | बच्चे इधर उधर , जहाँ मुँह समाया भाग रहे थे | उस नाटे आदमी की तस्वीर दिल में पैठ गयी |

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... और हम रास्ता भटक गए |

मुन्ना ने सड़क पर कंकड़ जरुर गिराए थे, पर वे कंकड़ तो कब के ,कहाँ , किस कूचे में ख़तम हो गए थे | अब तो उन कंकडों तक पहुँच पाना ही एक लक्ष्य था |
इतना हमें मालूम था , हमें रेल पटरी के किनारे किनारे चलते जाना है | पर कितनी दूर तक जाना है ? हे भगवान, सड़क के उस पर डबल स्टोरी की कतारें तो ख़तम होने का नाम नहीं ले रही हैं | क्या बातें करते करते हम लोग इतने दूर आ गए थे ? या कहीं हमारा घर पीछे छूट गया था ?

"हमारा घर कहाँ है यार ?" मैं चिंता में डूब गया ," लगता है, हम लोग गुम गए हैं |"
हम खो गए थे |
पहले तो डबल स्टोरी कहीं दिखाई ही नहीं दे रही थी | फिर डबल स्टोरी की कतार शुरू हुई तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी |
"घर कहाँ है यार मुन्ना ?"
"आ जायेगा | रुक मत, चलते रह |"
"हम लोग आगे निकल गए यार | या फिर हम लोग उल्टा चल रहे हैं |"
मुन्ना चौंक गया | फिर बोला ," नहीं, ठीक चल रहे हैं | वो देख, कारखाने की चिमनी दिख रही है ? "
अब हमें महसूस हो रहा था कि चलते चलते हम लोग कितनी दूर आ गए थे |
दूसरे  शब्दों में, सर्कस कितने दूर था | प्यास लग रही थी | गला सूख गया था | एक और रेलगाड़ी गुजरी | हम लोग जल्दी से ढलान से उतरकर थके हाथों से 'टा,टा'  करने लगे |

"तूने 'बालक' पिक्चर देखी ?" 'बालक' पिक्चर भी करीब - करीब सब ने देख रखी थी - मेरे सिवाय |
"उसमें वो लड़का कैसे रेल पटरी पर लेट जाता है - मरने के लिए ?" फिर वह गुनगुनाने लगा ,"सुन ले बापू ये पैगाम , मेरी चिट्ठी तेरे नाम... ....
उं.. उं.. उं.. उं.. गुं... गुं.. गुं.. गुं..
तेरी हिंदी के पाँव में अंग्रेजी ने डाली डोर ...
तेरी लाठी ठगों ने ठग ली, तेरी बकरी ले गए चोर |"

गाना तो अच्छा था | मुन्ना तन्मयता से गा भी रहा था | किसी और मौके में मैं भी मुन्ना के सुर में अपना राग जोड़ देता | मगर उस समय -उसके गाने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी | मेरी आँखों के सामने माँ का, बाबूजी का चेहरा घूम रहा था | घर आखिर गया तों कहाँ गया ? बच्चे पकड़ने वाले लोग घूमते रहते हैं - बोरा लेकर | कहीं मुझे और मुन्ना को बोरे में भर लिया तों ? कहीं पुलिस मिल गयी और पकड़ कर ले गयी तों ?

तों वही हुआ जिसका डर था | ये रेलवे फाटक तों कहीं आया नहीं था रस्ते में | मुझे अच्छी तरह याद था |
"मुन्ना" ,मैं चिल्लाया ," गाना बंद कर यार | ये रेलवे फाटक कहाँ से आ गया ?"
रेलवे फाटक के पास एक आदमी लाल - हरी झंडी लिए खड़ा था |
"हमारा घर कहाँ है भैया ?" भगवान्, उसे हमारा घर मालूम हो ... | काश मालूम हो ...|
"कहाँ रहते हो ?" उसने पूछा |
"घर में |"
उसने सर पीट लिया ,"  मतलब सुपेला में या सेक्टर में ?
"सेक्टर में |"
"कौन से सेक्टर में ?"
"सेक्टर २ |"
उसने दांया  हाथ उठाया , "यहाँ जाओ |"
उस सड़क पर चलते ही सब कुछ याद आ गया | अरे, ये तों बड़ा सा गोल चौक है | कई बार व्यास या रामलाल के साथ सुपेला बाज़ार जाते समय यही तों चौक पड़ता था |
मुन्ना जोर से चिल्लाया ," अपना घर मिल गया | चल मेरे पीछे |"
पर मुझे मालूम था, घर अभी भी दूर है | हम लोग भागते-भागते गोल चक्कर के पास पहुंचे और रेल पटरी के समानांतर चलती डामर की पक्की सड़क पर मुड़ गए |
वहीँ एक सीमेंट का छज्जा बना था, जो अक्सर बस स्टॉप पर बना होता है | क्यों बना था - क्या प्रयोजन था - मुझे आज तक समझ में नहीं आया | उस सड़क पर कोई बस तों चलती थी नहीं | शायद बी एस पी क़ी बस कर्मचारियों के लिए चलती हो | जो भी हो, , वह भीषण गर्मी या बारिश के दिनों में राहगीरों , भिखारियों और आवारा कुत्तों को निजात दिलाता था |
जब हमारी निगाह वहां पड़ी तों सब कुछ थम गया |

कौशल भैया, मुन्ने के राजा चाचा , शामलाल मामा और दीपक के बब्बा हमारा इंतज़ार कर रहे थे |

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ये सवाल जवाबों का ही नतीजा था कि अगले दिन शाम को मुझे और संजीवनी को श्यामलाल मामा साइकिल पर बिठाकर सर्कस ले जा रहे थे |
सारे सवाल एक जैसे थे जो अलग अलग रूप में अलग अलग लोगों ने पूछा था | जवाब भी लगभग वही थे |
"कहाँ गए थे ?"
"सर्कस"
"क्यों गए थे ?"
"देखने "
"सर्कस देखने ? पैसे कहाँ से आये ?'
"सर्कस देखने नहीं - सर्कस 'देखने' गए थे | मतलब कि सर्कस 'देखने' |"

फिर मिली ढेर सारी झिडकियां - कुछ हो जाता तों ? बच्चा पकड़ने वाले बोरे लेकर घूमते रहते हैं | मोटर गाड़ियाँ चलती है - ड्राइवर लोग शराब पीकर ट्रक चलाते हैं | शराब पीने के बाद आदमी को कुछ पता नहीं चलता वो क्या कर रहा है | | रेल गाड़ी का ब्रेक सौ मीटर दूर जाकर लगता है | बंजर मैदान में बड़े बड़े काले साँप रहते हैं | वहां ऐसे ऐसे धतूरे के पौधे उगते हैं कि अगर काँटा चुभ जाए तों सात दिन तक बुखार आता है |
... सो ये सब जोखिम अनजाने में उठाकर हम लोग अकेले या बल्कि दुकेले सर्कस गए थे |

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मुझे साइकिल के डंडे पर बैठना एक सज़ा से कम नहीं लगता था | संजीवनी पीछे कैरिअर पर बैठी थी | श्यामलाल मामा बीच बीच में पूछते थे , "संजीवनी, नींद तों नहीं आ रही है |"

पर सर्कस के तम्बू में घुसते ही सारे गिले शिकवे धुल गए | भयंकर भीड़ थी | काफी देर तक एक ही लाइन थी, फिर टिकट के रंग के आधार पर लोगों को अलग अलग कर दिया गया | नीले रंग वाले , जिनकी संख्या उंगली पर गिनी जा सकती थी, सामने क़ी गद्दे वाली कुर्सी पर बैठने चले | उसके पीछे टीने की की कुर्सी वाले हरे टिकट वाले चले गए |
हमारी लाल टिकट गैलरी क़ी थी | सर्कस के सबसे पीछे लकड़ी के पटरे एक सीढ़ीनुमा ढंग से एक के पीछे एक काफी ऊंचाई तक लगाये गए थे | वे स्टैंड गोलाकार रूप में तम्बू क़ी दीवार के साथ साथ तीन ओर ठोंके गए थे |एक ओर सर्कस के कलाकारों, जानवरों आदि की आवाजाही का रास्ता था  | अधिकतर लोग तो गैलरी में ही आ रहे थे| ऐसी भयंकर भीड़ थी , फिर भी लोग एक दुसरे का हाथ पकड़ कर , कस कर हाथ पकडे इधर से उधर जा रहे थे | जरा कल्पना कीजिये, सामने पिताजी, बीच में तीन बच्चे और दुसरे छोर पर माताजी - सब एक दूसरे का हाथ पकडे जगह क़ी तलाश में इधर से उधर जा रहे थे | ऐसे में अफरा तफरी ना मचे तो क्या हो ?
अभी पटरे पर टिके ही थे क़ि "किर्र्रर्र्र" क़ी आवाज़ के साथ घंटी बजी और धुन चालू हो गई | यह पहली घंटी थी | रेल पेल और भी बढ़ गयी | शोर थोडा कम जरुर हुआ , पर जिन्हें 'साथ-साथ बैठने क़ी जगह नहीं मिली थी , जिनके बच्चों के सामने कोई टोपी वाला, या पगड़ी वाला सरदार बैठा हो, जिनकी आँखों के सामने खम्बा आ रहा था, या यूँ ही असंतुष्ट लोग या लोगों के ग्रुप अभी भी इधर उधर हो रहे थे |
.... "किरर्र" दूसरी घंटी बजी | अब मैंने ध्यान से देखा, मेरीं आँखों के सामने क्या था ?
कहाँ से शुरू करूँ ? ज़मीन से या आसमान से ? आगे से या पीछे से ? बीच के गोलाकार मैदान में दरी बिछी थी | ऊपर छत से बड़ी बड़ी लाइटें लटक रही थी | हमारे देखते ही देखते लाइटों की रस्सी खींचकर उसे और ऊपर उठा दिया गया | पीछे एक बड़े से गेंद के आकर का जालीदार पिजरा था | जानवरों और कलाकारों के प्रवेश द्वार के ऊपर बैठे साजिन्दे धुनें बजा रहे थे |

अचानक धुनों की आवाज़ तेज हो गयी | रौशनी मद्धिम हुई और लाल पीली बत्तियां झिलमिलाने लगी | जोकरों की एक पूरी पूरी जमात बाहर आ गयी |  .... हा ... हा ... हा ... देखो तो कैसे कैसे जोकर हैं ....| नाक में टमाटर लगाए जोकर ... झोले झंगड़ निहायत ढीला रंग बिरंगे पायजामे पहने जोकर .... रंग बिरंगी टोपियाँ पहने जोकर ..... हा.. हां. हा... मोटू जोकर ... हा... हा.. हा... मेरी और संजीवनी की हँसी थम नहीं रही थी ... लम्बू जोकर .... हा ... हा... हा..

अचानक लोगों की हँसी पांच गुना बढ़ गयी , पर मेरी हँसी जम गयी |
संजीवनी अभी भी और लोगों के साथ जोर जोर से हँस  रही थी ..... सामने आ गया 'छोटू जोकर'....
.... हा हा .. हा .. लोग अभी भी हँस रहे थे | छोटू जोकर मटक मटक कर चल रहा था | हा... हा... हा...

पर मेरे गले में कुछ अटक गया था  ...|अरे ये तो वो ही नाटा आदमी है ... | हाँ, वही है ...| लाल पीला पोतने , आड़ी तिरछी दाढ़ी मूंछ लगाने से क्या होता है ? अब लोगों के ठहाके मेरे कानों को चुभने लगे ......|
अब  इधर भटकें, उधर भटकें, विचार सारे जहान में भटकें,  , सर्कस  तो  देखना  ही  था  | उसके  लिए ही तो इतनी दूर से आये थे | भले ही मज़ा मेरे लिए आधा हो गया था, फिर भी बाकी आधा हिस्सा इतना लोमहर्षक था कि चने मूंगफली के लिए आवाज़ लगाते फेरी वालों पर मुझे खीज आने लगी | जब देखो तब,कान के पास आकर गला फाड़कर चिल्लाने लगते थे  | न  तो संजीवनी ने किसी चीज़  के लिए जिद पकड़ी, ना मैंने | पर ढेर सारे इतने नालायक बच्चे थे जिन्हें कभी  मूंगफली चाहिए होती, तो कभी लेमनचूस |

हर खेल के बाद नकलची बन्दर जोकर आकर उस खेल की नक़ल  करने की कोशिश करते | और उसमें कुछ ज्यादा ही मज़ा आता | लड़कियां साइकिल का करतब दिखकर गयी, तो  जोकर अपनी तिपहिया साइकिलें लेकर आ गए जिसका हर पुर्जा अलग हो जाता था | जिमनास्ट अपने करतब  दिखाकर गए तो  जोकर गद्दा  ले आये और उछल कूद मचाने लगे |
जैसे  जैसे सर्कस आगे बढ़ता गया और दिलचस्प खेल  दिखाए जाने लगे | अब मुझे पता चला कि मुख्य द्वार के पास  लकड़ी का इतना बड़ा तिकोना मंच क्यों रखा गया है ? संगीत की लहरियां तेज हो गयी | बाहर  से एक जीप तेजी से चलती हुई आई और ऐन मंच के पास रुक गयी | जीप वाला जीप पीछे ले गया | इस बार वो जीप तेजी से चलाकर आया और मंच के बीचों बीच रुक गया |
वो क्या करना चाहता था ?
मैंने देखा, करतब के मैदान में करीब पचास फीट की दूरी पर, वैसे ही लकड़ी का दूसरा मंच रखा था | दूरी का मुझे अंदाज़ नहीं है भाई| अगर तीन कारें आगे पीछे  सटाकर रखी जाएँ उतनी दूरी मान लीजिये | | बीच की सारी जगह खाली थी | तीसरी बार वह दुगनी रफ़्तार से जीप भगाकर लाया | जीप हवा में उछली और दूसरी  तरफ के तिकोने मंच पर जा पहुंची | फर्राटे से वह दूसरी ओर के रास्ते में खो गया |
अभी ताली की आवाज़ थमी भी नहीं थी कि जोकर अपनी जीप लेकर आ गए | उनकी जीप देखते ही हंसी आती थी | जिसे कहते हैं न -" 'हॉर्न' के सिवाय सब कुछ बजता था |" उसमें जोकर शलीनता से, कोई आगे, कोई पीछे, कोई इधर मुंह किये , कोई उधर मुंह किये बैठा था |
उतरकर लम्बू जोकर ने सारे जोकरों से हाथ मिलाया | सारे के सारे जोकर हाथ हिलाते , सीटी बजाते उसका उत्साह बढाते खड़े हो गए | उसके लिए लकड़ी के दो छोटे छोटे तिकोने रख दिए गए |  अभी जीप ने रफ़्तार पकड़ी ही थी कि जोर का धमाका हुआ और चारों के चारों चक्के बिखर गए | जोकर सर पर पाँव रखकर भागे |

फिर दूसरी तरफ के पिंजरे से एक मोटर साइकिल के चलने की आवाज़ सुनाई दी | सारी बत्तियाँ बुझा दी गयी | सबकी नज़रें पिंज़रे पर टिकी थी | लोग दम साधे देख रहे थे | उद्घोषणा हुई, "कृपया माचिस या लाइटर ना जलाएं | यह कलाकार के लिए घातक हो सकता है|"
पिंजरे के अन्दर मोटर साइकिल की आवाज़ इतनी कर्णपटु थी ,मानो रह रहकर छोटे छोटे विस्फोट हो रहे हों | देखते ही देखते मोटर साइकिल पिजरे में घुमने लगी | जब मोटर साइकिल थमी और फिर से रोशनियाँ हुई तो लोगों की जान में जान आई |
इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुई |
तो बोतलें गिनने वाला गनपत हाथी आया | उसके साथ में उसका रिंग मास्टर भी था | पहले सूंड उठाकर उसने मैदान का एक चक्कर लगाया | एक तरफ नम्बरों की तख्ती रख दी गयी |
फिर  बीच  मैदान  में रिंग मास्टर ने तीन दूध की बोतलें रख दी और वो एक कोने में चुपचाप खड़ा हो गया |
हाथी दूध की बोतलों के पास गया , मानो वो बोतलें गिन रहा हो | उसने सूंड से एक एक बोतलों को छुआ |

"संजीवनी , कितनी बोतलें हैं ?" श्यामलाल मामा ने पूछा |
संजीवनी के कुछ बोलने से पहले ही मैं बोल पड़ा ,"तीन" |
और वाकई हाथी ने तीन नंबर की तख्ती उठाकर पहले रिंग का एक चक्कर लगाया , फिर वह तख्ती रिंग मास्टर को सौंप दी |
अब रिंग मास्टर ने पाच दूध की बोतलें रखी  |
श्यामलाल मामा के कुछ पूछने के पहले ही मैं बोल पड़ा," पांच" |
हाथी ने इस बार पांच नंबर की तख्ती उठाई | तालियों की गडगडाहट के बीच रिंग का एक चक्कर लगाया और पांच नंबर की तख्ती रिंग मास्टर को सुपुर्द कर दी |
अगली बार उसने आठ बोतलें ठीक ठीक गिनी | लोगों ने दाँतों तले उंगली दबा ली |
बहुत से लोग, जिनमें मैं भी था , यह चमत्कारी हाथी का शो देखने आये थे | वह हाथी अभी मंच से गया ही था कि जोकर अपना छोटा हाथी लेकर आ गए |

वह छोटा हाथी आखिर था क्या ? जोकरो ने कपडे का बना हाथी का खोल पहन रखा था | साफ़ दिख रहा था - एक जोकर आगे और एक जोकर पीछे | चलते -चलते हाथी की पूँछ गिर पड़ी | शरारत में छोटे जोकर ने लकड़ी की एक स्केल उठाई और हाथी के पेंदे को छुआ | पूँछ की जगह वो स्केल पेंदे से चिपक गया और पूँछ की तरह हिलने लगा | हँसते - हँसते लोगों के पेट मैं बल पड़ गये - मुझे छोड़कर | छोटा जोकर मेरे लिए आँख की किरकिरी बन गया था |
उसके बाद जोकरों के हाथी ने सीटी  बजाकर सबको  हँसाया | जब वह चले गया तब मुझे थोड़ी राहत मिली |

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क्या यह वही मोटी बिल्ली थी ?
मेहतर पूंछ पकड़कर, उस निर्जीव बिल्ली को उठाकर ले जा रहा था | वही मोटी बिल्ली - जिसका आतंक पूरे सड़क में छाया था | जिसे देखते ही माँ बेलन सम्हाल लेती थी और उसके बावजूद वह दुस्साहसी जब तब दूध पी जाती थी | आज वह कितनी निरीह लग रही थी |
"मोटी बिल्ली मर गयी बे |" सोगा बोला |
पता नहीं, कैसे मर गयी ? बबन के अनुसार उसने कोई सडा हुआ चूहा खा लिया था | अनिल ने बात और आगे
बढाई- शायद छछूंदर को चूहा समझकर गटक लिया | | मुन्ना ने आशंका जताई कि हो सकता है - बिजली का नंगा तार छू लिया हो | छोटे को लगता था , उसे रात को साँप ने काट लिया हो | जितने मुंह उतनी बातें | पर वह हम लोगों के पडोसी, नाम्बियार के पटरी के नीचे मरी पड़ी मिली | लाल चीटियाँ उस पर टूट पड़ी थी और वह उन्हें अपने बदन से हटा पाने में भी असमर्थ थी - मानो गहरी नींद में सो रही हो | कैसी विडम्बना थी ये !

"लेकिन कैसे मर गयी ये ? कल तो इसने मेरा रास्ता काटा था |" छोटे को अब भी हैरानी थी |
"जैसे सब मर जाते हैं | " अनिल बोला |

कितनी बड़ी बात कह दी उसने |

कहाँ जाते हैं मरने के बाद ? कहाँ गयी होगी यह बिल्ली ? अगर हम सर्कस की लाईट पकड़ कर स्वर्ग भी चले जाएँ तो जरुरी नहीं कि वहां मिलेगी | इसने काफी पाप किये हैं | बहुत से घर का अनेकानेक बार चोरी चोरी दूध पिया है | यह भी हो सकता है, इसे नरक भेजा जाये |
नरक कहाँ है ?
"जमीन के नीचे |" छोटा सुरेश बोला ," एक बार हमारे केरला के गाँव का आदमी गड्ढा खोदते गया | खोदते गया | चार दिन तक खोदते गया | फिर उसने क्या देखा - राक्षस इधर उधर दौड़ रहे थे | आग जल रही थी | एक आदमी को रस्सी से बांधकर खींच रहे थे और कोड़े मार रहे थे | जल्दी जल्दी वह बाहर आ गया और फटाफट मिट्टी डालकर गड्ढा भर दिया |
"सच्ची ?"
" हाँ सच्ची |" वह छाती  ठोंककर बोला |
"नरक जमीन के नीचे ही तो होता है | अगर  झूठ  है  तो  शशांक  से  पूछ  लो |"
"...शशांक से पूछ लो ..." . "....शशांक से पूछ लो ...." मेरे कान पक गए थे सुनते सुनते ...|

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कलाकारों की नक़ल जोकरों ने उतारी थी और हम सब जोकरों के खेल दुहराने मैदान मैं इकठ्ठा हुए थे | यह तय था कि मेरी चौपहिया साइकिल  जीप का काम करेगी | ऐसी जीप , जिसके चारों पहिये धमाके के साथ निकल जायेंगे | काम आसान लग रहा था , पर उतना आसान था नहीं | पहियों की धुरी पर जंग लगी मोटी कील थी, जिसे ईंट से ठोंक ठोंक के निकालने में लोगों को उनकी नानी याद आ गयी | तो यह था कि मैं लम्बू जोकर बनूँगा और जीप चलाकर मैदान की ढलान से आऊंगा | फिर जब जीप के चार चक्के निकलेंगे, तब निकलेंगे - लोग 'धडाम' तभी चिल्लायेंगे | फ़िलहाल लम्बू जोकर का रोल तो मुझे मिल गया |
"मैं छोटा जोकर बनूँगा |" शशांक चहका |
कायदे से देखा जाए तो छोटा जोकर , छोटे को बनना चाहिए था, क्योंकि वो कद में सबसे छोटा था |
बाकियों को कोई ख़ास मतलब नहीं था |  मुन्ना और बबन जोकरों के कपडे वाले हाथी बनने को तैयार हो गए
| मुन्ना के घर एक पुरानी जावा सुवेगा थी , जो अक्सर पड़े रहती थी | उसे पुरानी चादर से ढँक दिया गया था| मुन्ना वो चादर उठा लायेगा और उसके अन्दर मुन्ना और बबन छुप जायेंगे और जोकर के हाथी बन जायेंगे |

"...और जब हाथी कि पूँछ गिर जायेगी तो मैं स्केल लटका दूँगा |" शशांक हँसते हुए उछल रहा था |
एक तो छोटा जोकर , ऊपर से शशांक - मेर भेजा वैसे ही गरम हो गया था |
"फिर तो झूले वाला खेल भी खेलेंगे | वही, जिसमें छोटे जोकर का पजामा हवाबाज पकड़ता है और उसका पजामा निकल जाता है | अन्दर वो लड़कियों की स्कर्ट पहने रहता है |" मैंने मनोभाव छुपाकर ये प्रस्ताव रख दिया |
"वो छोटा जोकर नहीं, लम्बू जोकर था |" शशांक ने छूटते ही प्रतिवाद किया |
"नहीं वो छोटा जोकर था |"
"छोटा जोकर इतना छोटू था, वो झूले की सीढ़ी कैसे चढ़ पायेगा ? " उसने तर्क दिया ," वो लम्बू जोकर था |"
"नहीं, वो छोटा जोकर था |" मुझे मालूम था कि वो छोटा जोकर नहीं था , पर एक तो मुझे छोटा जोकर फूटी आँखों नहीं सुहाया था - ऊपर से शशांक ....| मैं साफ- साफ बेइमानी पर उतर आया था | ऊपर से चोरी और सीनाजोरी ,"अबे तूने सर्कस देखा या सो रहा था ?"
मुझे लगा था , बबन या मुन्ना , या दोनों मेरा समर्थन करेंगे | दोनों हाथ बाँधे चुपचाप खड़े थे | मैंने मुन्ना से पूछा ," मुन्ना, तू ही बोल, वो छोटा जोकर था न ?"
मुन्ना ने मध्यम रास्ता अपनाया ," याद नहीं | पर लगता है , ना तो वो छोटा जोकर था, ना लम्बा जोकर |
कोई और जोकर था | पर झूले वाला खेल कहाँ खेलेंगे ? किसी के घर पेड़ में जाकर लटकना पड़ेगा | किसके घर ? "
बबन का तर्क और भी जोरदार था, "और फिर लड़की की स्कर्ट ? वो कहाँ से लायेंगे ?"
....और मेरी बदकिस्मती कि झूले वाला खेल वहीँ स्थगित हो गया |
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 (क्रमशः)







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