शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

गंगा अवतरण

        कभी चमकी फिर हुई लुप्त,
स्मृति पटल से वह गाथा । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [1] कारुण्य

बीत  गए  कई  युग ,
लौ  रही  अब   थरथरा |
डूबी  आकंठ  निराशा  में  ,
  आत्मा  थामे  तृण  आसरा  |

पीढ़ियाँ  आये  गुजर  जाये ,
हर  यत्न  हो  चला  भोथरा  |
बूंद  को  तरसे भगीरथ ,
कब  लाओगे  तुम  जल  धारा ?

आती  जाती  पवन  कह  रही  ,
  तप हो गया तुम्हारा  सफल  |
यूँ  तो  कट  गए  वर्ष  कोटि -कोटि ,
भारी  हो  गया  एक  पल  |

मुक्ति  द्वार  अब  भी  अवरुद्ध ,
  आत्मा  हो  चली  विकल |
अब  विलम्ब  क्यों   हे  प्रौपुत्र  ,
ले  आओ  अंजुरी  भर  जल  |

आशा किरण कभी थिरकती ,
कभी नैराश्य मेघ छा  जाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [2]  अनिश्चितता 

धधक रही ज्वाला ह्रदय में,
पुरखों की हो कैसे मुक्ति ।
चले हिमालय  त्याग  राजसुख,
घोर तपस्या ही थी  युक्ति ।

पत्ते, भस्म, जल , पवन,
सूर्य किरणे - यही था खान  ।
वर्ष सहस्त्र घोर तप  नंतर ,
प्राप्त हुआ ब्रम्ह वरदान ।

अमृत जल राशि से पूर्ण,
गंगा जब हो अवतरित ।
नर्क से मुक्ति सहज मिले,
पुरखे हो तब पाप रहित ।

पर गंगा ठहरी स्वर्ग नदी ,
मृत्यु लोक से क्या प्रयोजन ?
करें  कैसे  प्रोत्साहित चंचला को,
सृष्टि निर्माता यही करें चिंतन ।

अठखेलियां करे चपला से,
नव नृत्य हो अप्सराओं संग ।
विसरित स्मृति  की,
स्वर्गिक आमोद के विविध रंग |

अक्षरशः उतरी आशंका,
रोष, कोप, पुरजोर प्रतिरोध ।
अंतिम शस्त्र  परिजन स्मृति
मानो शांत हुआ तब क्रोध ।

गंगा मनुहार हुआ सफल,
हटी बाधा , पर मार्ग नहीं प्रशस्त ।
हुई  अनावृत्त  बड़ी चुनौती,
सिहर उठा ब्रह्माण्ड समस्त |

गंगा वेग पर कौन संभाले,
संकेत मात्र करें सृष्टि निर्माता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

        [3] आक्रांत 

किसके रोके रुका समय,
शीतल रात्रि या धूप कड़ी  ।
गिरते पड़ते चलते रुकते ,
आ ही गयी विपद घडी |

चारण , सिद्ध देवगण, ऋषि
अस्पष्ट शब्द, अव्यवस्थित आवृति,  ,
कांपे  चरण  अष्ट  दिग्पालों  के ,
ओंठों   पर थी वही स्तुति  |

कार्तिक , बाल  गणपति थामे  आँचल ,
  पूछे  माँ  गौरी  से पल  पल ,
  क्लिष्ट  है उत्तर , बाल सुलभ  प्रश्न सरल ,
  क्या  धरा  चली  आज  रसातल   ?

प्रचंड  प्रलय  पवन  सम  प्रश्न ,
  होता  प्रतिध्वनित  पग  पग ,
सुर  असुर यक्ष ,गण , बलिष्ठ  नाग ,
  गन्धर्व  वानर , मानव   खग  मृग |

पखारती  चरण लक्ष्मी उद्धिग्न,
हुआ प्रश्न मुखरित अनायास,
  करती व्यक्त वही आशंका,
  उत्तर पाने का विफल  प्रयास |

विश्राम मुद्रा में  लीन जगदीश
काश - लेती पढ़ वह मन्दहास |
सरल प्रश्न , तो सहज ही उत्तर ,
आस न निराश, गूढ़ न उपहास |

हो प्रलय आसन्न तब  ,
नाम एक ही मुख  पर आता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [3] अभ्युदय 
किया  सहज  ही  गरल  पान ,
  जिसने तब  तारी  थी  सृष्टि , ,
सहेज  पाएंगे क्या  अमृत  प्रवाह ,
उन  पर है आज  सर्व  दृष्टि  |

होता  दीप्तमान  कैलाश  शिखर ,
प्रदीप्त  हो  जाता  मान  सरोवर ,
जटा   जूट  भी  स्वर्णमय  होता ,
सुशोभित  करता  जो  शिव  शंकर |

पर रश्मिरथी रवि कहाँ
हो  चला रहस्मयी ढंग से  लोप,
अपरान्ह की उस कठिन  बेला
  में छाया तिलस्मयी  घटाटोप |

मेघ आवरण से आच्छादित आकाश,
करें पृथक भुवन से भूतल |,
पृथ्वी  रक्षा  का बाल  प्रयास,
  पर हुई अगोचर अंतरिक्ष हलचल |

नंदी  और मरुद्गण संग ,
लिए हाथ त्रिशूल और दंड,
प्रतीक्षारत  शम्भू  निहारे ,
मेघाच्छादित  आकाश  खंड |

प्रति  क्षण तीव्र  कर्कश ध्वनि,
मानो शिलाएँ होती चूर ।
अगले क्षण क्षीण हो जाती ।
मानो अश्व दल जाए दूर |

आशाओं  के केंद्र बिंदु पर,
बने कैलाशपति भाग्य विधाता,
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [4] पराकाष्ठा

नीरवता सर्वत्र विराजित ,
जमी  वायु है  शांत गगन,
न  हलचल  , न  कोई  ध्वनि ,
क्या चंचल गंगा का लड़कपन ?

प्रतीक्षारत पथराई आँखें,
उहापोह और तर्क वितर्क
कहाँ  हो  बेटी  गंगा  ?
शंकर  करें  मानसिक  संपर्क |

वेग  सहेजो बेटी  गंगा  ,
क्षुब्ध  शम्भो की हुंकार क्रुद्ध,
मृत्यु लोक यह ,देवलोक  नहीं ,
  बसते यहाँ मानव क्षुद्र |

लघु जीवन ,त्रुटि  की  मूर्तियां ,
निर्बल मन  पाप  संलिप्त ,
पुरखों  को  दें  तर्पण  ,
आशा है उनकी संक्षिप्त |

स्नान  करें  तेरे  जल  से
  हो  पाप  मुक्त अनायास  ,
कृषक सींचें  खेत  धारा से ,
बुझाएं वनचर अपनी प्यास  |

हो तू  सुगम  यातायात साधन ,
पाएं जलचर तुझमें निवास |
माँ  की ममता पाकर तुझसे ,
करें समृद्धि  और विकास |

हो  कल्याण  तेरा गंगे ,
हो जीवन  दायिनी  पतित  पावन | .
मृत्युलोक  की मरुभूमि  में,
कर दे तू नव जीवन  सृजन |

आशा दीप  कर दे प्रज्ज्वलित, 
शिव विमर्श गगन गुंजाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता ।
        *******************

अकस्मात् गिरी उल्काएं,
गुंजायमान  तड़ित अगणित ।
तिरस्कारिणी, इतराती ,
गंगा वाणी हुई  प्रतिध्वनित ।

प्रकृति से बंधी हूँ मैं,
क्षमा करें मुझको त्रिपुरारी
नियम बंधन के सृजनकर्ता ,
विपरीत अनुदेश क्यों अपरम्पारी ?

न कोई आरोह अवरोह स्वर्ग में ,
  न कोई पापी संसारी ।
न कृषक करें मार्ग अवरुद्ध ,
न प्यासे  वनचारी जलचारी ।

हूँ  उन्मुक्त  स्वच्छंद  अबला,
प्रकृति  नियम  से  बेबस नारी ।
युगों  से  विलग  मैं परिजन  से ,
विरह  अग्नि समझें हे त्रिपुरारी |

उच्छृंखलता मेरी क्षमा करें प्रभो
इन लहरों पर कैसा बंधन |
हो सके सम्भालो  वेग मेरा,
प्रतीक्षारत हैं मेरे स्वजन |

हुआ  कोलाहल क्रमशः  तीव्र
छोड़ा गगन पथ , चली  द्रुत गति । ,
ज्यों  ज्यों  आवर्धित  प्रचंड  शब्द  ,
  त्यों त्यों प्रखर  हुई  स्तुति |

तुषारापात गंगा का यह ,
शिव शक्ति का उपहास उड़ाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [5] संघर्ष

मेघाच्छादित सा  निस्तब्ध नभ ,
ध्वनि दिलाये अस्पष्ट आभास ।
शम्भू करें स्थिति संवरण,
क्षीण त्रुटि हो भीषण विनाश ।

हुआ प्रचंड घोर शब्द ,
तब देखा जगत ने अकस्मात् ।
प्रकट हुआ मेघ मध्य ,
भीषण श्वेत प्रलय  सा प्रपात |

नारी  का  अभिमान था वह,
या चिर  विरह की पीड़ा ।
देव  नदी  का  प्रबल  आवेग ,
या  थी  उच्छृंखल  क्रीड़ा  |

छोड़  चली  गंगा  देवलोक ,
श्वेत   शक्ति  पुंज  सी  जलधार  |
त्वरित  गति , अथाह  जल ,
त्रिभुवन  कर  उठा  हाहाकार  |

स्तुति शब्द मध्य अमृत 
जल मृत्यु राग सुनाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 
        *************

आँखें  मीचे  होड़  लगाए ,
लहरें  शिखर  पर  उतर  पड़े ,
सतह  स्पर्श  होते  ही दर्प  से
चूर, मोती जैसे बिखर पड़े  |

  था नहीं  वह  कठोर  धरातल ,
मखमली  बिछौने  सा  सौम्य  |
तीव्र जल राशि दबाव के सम्मुख,
श्याम सघन वन हो चला नम्य ।

  शक्ति विकट लहरों पर लहरें,
तलहीन  कुण्ड में जाए धंसती ।
श्याम रज्जु के जाल में
,निमिष मात्र में जाएँ  फंसती ।

अकस्मात् खो बैठी नियंत्रण,
मानो यंत्रवत कठपुतलियां
संचालक खींचे अब  डोर,
बंधी समस्त मुक्त अठखेलियाँ ।

मजबूत वृक्ष सघन वन,
हर धारा सहस्त्र धारा में विभक्त ।
गति मंद बल हुआ क्षीण,
विकराल लहरें हुईं अशक्त  ।

नीलकंठ का जटाजूट वह,
तिलस्म और रहस्य से पूर्ण ।
भूलभुलैया, अगणित कंदराएँ ,
विस्तृत निकास कहीं, कहीं संकीर्ण ।

कहीं आरोह, कहीं अवरोह ।
कहीं घुमाव, क्षणिक कहीं ठहराव |
भंवर पार कहीं लहरें मिलतीं,
पल भर में पुनः अलगाव ।

तलहीन  ताल हैं यत्र तंत्र ,
जिसमें सम्पूर्ण नीर समाता ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

         [6] समर्पण  
अंतहीन दुर्गम सुरंगमयी पथ ,
अतिकाय लहरों ने ठानी ।
स्वर्गिक   लहरें , ये  दुर्गति ,
करें  इतिश्री  यह  कहानी  |

बूँद बूँद में नयी स्फूर्ति,
संयोजा लहरों ने शेष बल ।
किया संकल्प बहा दें बाधाएं,
कर दें इस वन को समतल ।

लहरों ने थामा लहरों को,
बना संगठन हुआ विलय,
चट्टान भेदी प्रहार पर प्रहार,
जागृह हुआ प्रसुप्त प्रलय |

शालीन श्याम वृक्ष हुए नम्य ,
गहरी जमी रही , पर जड़ ।
अगले क्षण फिर खड़े हो गए,
पड़ी लहरों को उलटी थपड ।

होश खो बैठी लहरें,
हुआ संगठन पल में विघटित ।
करने लगे प्रहार अंधाधुंध,
दर्प  होने लगा कुछ खंडित |

जटाजूट जल द्वंद्व मध्य ,
शिव स्तुति जाप प्रभाव जमाता  ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो
गागर में सागर हे  ज्ञाता ।

समतल करने की कौन कहे ,
सरपट भागने का खोजें मार्ग  ।
वही  तिलस्म , और भूलभलैया,
मुंह से निकलने लगी अब झाग |

होने लगी लहरें अब पस्त
यत्न निष्फल , नैराश्य ह्रदय |
ओंठों पर आई वही स्तुति ,
समर्पण भाव का हुआ उदय |

ले लो मुझे छत्रछाया में ,
हुई प्रभु मैं शरणागत ।
करो मुक्त इस जंजाल से,,
रहूँ  सदा आपसे सहमत |

हुई परिवर्तित कातरता हर्ष में ,
शब्द वही पृथक भाव दर्शाता । 
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

          [6] प्रयाण

स्तुति से गुंजायमान व्योम,
पिछले पैरों पर नंदी खड़े।
यक्ष, देव ऋषि गन्धर्व,
करें स्तुति हाथ जोड़े ।

शंख ध्वनि , पुष्प वृष्टि चहुँ  ओर ।
स्वर्ग नदी अब हुई समर्पित ।
छोड़ी तब एक धार शम्भू ने,
किया उसे धरा को अर्पित |

स्वागत  स्वागतम्   सुस्वागतम ,
हे नन्ही बालिका सुस्वागतम,
तैयार खड़े श्वेत  अश्व , कांतिमय  स्वर्ण रथ,
मृत्यु लोक की अनजान डगर अनजान पथ,
मार्ग  प्रशस्त को तत्पर भगीरथ,
ऋषि मुनि राजा रंक  - सब हैं प्रतीक्षारत
हर वाद्य पर एक ही सरगम ।
स्वागत  स्वागतम्   सुस्वागतम |

पाँव थिरक थिरक जाये रे मितवा ।
मन मुदित भरमाये रे मितवा ।
तन पुलकित हर्षाये रे मितवा ।
लहर लहर जहाँ लहराए रे मितवा ।
नर नारी तहँ तहँ  गाये रे मितवा  ।
क्यारी फुलवारी मुस्काये रे मितवा |
अगणित दीप जगमगाये रे मितवा |

         [7]भरतवाक्य 
             साठ सहस्त्र सुत सगर के ,
             हुए दग्ध कपिल कोप दृष्टि से ।
     अस्थिर आत्माएं, अतृप्त पिपासा  ,
     न  हो शांत   किसी वृष्टि  से |


स्थित पाताल में भस्म अवशेष  ,
उद्विग्न हो उठे भगीरथ.|
स्वर्ग से धरती से पाताल ,
गंगा चलती रही अविरत ।

मृतप्राय पक्षी  समूह मरू भूमि में,
झुलसे पंख मूँदते नेत्र ।
जलती भूमि , धूल भरे बवंडर ,
सदियों से शापित शुष्क  क्षेत्र ।

पड़ी शीतल फुहार,  अकस्मात ,
  दृश्य सम्पूर्ण  परिवर्तित पल में ।
करे किल्लोल आल्हादित खग दल,
भस्म अवशेष समाहित जल में ।

नूतन पंख, परिपूर्ण उमंग ,
नील गगन का खुला आमंत्रण  ।
होते ओझल  देखें निर्निमेष  
भरी आँखें  खो  बैठी नियंत्रण |

छलके आंसू विलीन हुए,
निर्झर निर्मल  जल धार में ।
देते तर्पण भार मुक्त  भगीरथ,
लौट आये तिलस्मी संसार में |

कभी देखें मुड़ भगीरथ प्रयत्न,
अथाह मनोबल की गौरव गाथा ।
करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो 
गागर में सागर हे  ज्ञाता । 

6 टिप्‍पणियां:

  1. Prelude
    Ganga is the most sacred river to Hindus. It has been mentioned in all Vedas , Ramayana and Mahabharat.
    This creation is inspired by a story from Ramayana. It is about Ganga's descending from Heaven to Earth.
    King Sagar was a mighty king of Ayodhya. He had sixty thousand sons. Once, he started a spiritual ceremony "Ashvamegh Yagya". In that ceremony, a horse was set free to wander. Wherever the horse went, an army, led by Sagar's grandson Anshuman , kept on following him. If he crossed a state unopposed that meant the king of the that state accepted the supremacy of Sagar. If someone stopped the horse, that meant he was challenging the might of Sagar and he had to fight with the army.
    The gods in heaven did not like it. The king of the gods, Indra, somehow managed to separate horse from the following army. Then he stole the horse and drove him to the nether world. A sage, Kapil was engrossed in deep meditation. Indra hid the horse behind him and left.

    The clueless army could not find any trace of the horse. With a guilt feeling about not able to protect the horse , they retreated . Anshuman broke the news about loss of the horse to the king. It was considered inauspicious. So the sixty thousand angry sons set forth in the search of the royal horse. They scanned the whole Earth. They could not find the horse on the Earth, so they started digging. In the nether world, they saw sage Kapil and the royal horse was grazing nearby. They thought the sage had stolen the horse. They began scolding and abusing him. Due to interruption in meditation, the angry sage opened his eyes and at once, with his scorching gaze, all the sixty thousand sons were burnt instantaneously.

    Loss of sixty thousand sons was a shock for king Sagar, but he sent his grandson Anshuman to sage Kapil. When Anshuman came across the heap of ashes of his sixty thousand uncles, he longed for to complete water ceremony for the departed souls, so that they could be liberated. But he could not got the water nearby. Then Anshuman politely talked to the sage and with his permission, brought the horse back.
    Sagar could not live longer after the disastrous incidence. Anshuman knew that his uncle's souls were not liberated. Throughout his life, he was constantly thinking of the ways to liberate them but he could not do anything. Ultimately, he gave the kingdom to is son Dilip and went to Himalayas. However he could not find a way to bring Ganga to the Earth. Dilip concentrated more on his duties towards people of his kingdom but in back of his mind, he was always thinking of the tragic incidence and ways for their salvation.
    When Dilip’s son, Bhagirath became the king, he immediately took the task of liberation of his ancestors.

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  2. English translation of selected verses -
    कभी चमकी फिर हुई लुप्त,
    स्मृति पटल से वह गाथा ।
    करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो ''
    गागर में सागर हे ज्ञाता ।
    So he is modern day listener. He could recollect bits and pieces of the perennial saga , then he got confused. He does not have time for full narration. At the same time, he does not want to miss any vital details. He is requesting the narrator to tell the complete account in a concise form.

    [1] Desolation
    This part portrays despair and wailing of the ancestors. Somehow, they got the unconfirmed news that Bhagirath’s wish was granted by Brahma - the creator of the universe. Since then, the moment of anticipation became more excruciating. Not realizing the complexity of the arrangement, they were moaning about the delay. Their mind were swinging from ray of hope to despondency.

    बीत गए कई युग ,
    लौ रही अब थरथरा |
    डूबी आकंठ निराशा में ,
    आत्मा थामे तृण आसरा |
    “Many era has passed by. The faith is wavering now. In an acute state of dispair we cling to the ray of hope.”

    पीढ़ियाँ आये गुजर जाये ,
    हर यत्न हो चला भोथरा |
    बूंद को तरसे भगीरथ ,
    कब लाओगे तुम जल धारा ?
    “Generation after generation, our descendant are trying. But all their efforts were futile so far. We are yearning for a drop of water , Bhagirath. When will you bring the stream to us ?”

    आती जाती पवन कह रही ,
    तप हो गया तुम्हारा सफल |
    यूँ तो कट गए वर्ष कोटि -कोटि ,
    भारी हो गया एक पल |
    “Passing by winds brought the message that your long penance was successful. We waited patiently for thousands of years, but now even a single moment has become unbearable.”

    मुक्ति द्वार अब भी अवरुद्ध ,
    आत्मा हो चली विकल |
    अब विलम्ब क्यों हे प्रौपुत्र ,
    ले आओ अंजुरी भर जल |
    “(Even after the news of success ) With each passing minute, the doubt resurfaces again and again. The door of salvation is still firmly shut. The craving souls have become desperate. Why there is a delay great grandson ? Bring just palmful of water.”

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  3. [2] Eerie

    In the different world, King Bhagirath was determined for the liberation of his ancestors.

    धधक रही ज्वाला ह्रदय में,
    पुरखों की हो कैसे मुक्ति ।
    चले हिमालय त्याग राजसुख,
    घोर तपस्या ही थी युक्ति ।
    He was constantly pondering over liberation of his ancestors. Ultimately, one day, he renounced the royal luxurious life. He went to Himalayas and began his severe penance to please Creator of the Universe - Brahma. That was the only way left for him.
    पत्ते, भस्म, जल , पवन,
    सूर्य किरणे - यही था खान ।
    वर्ष सहस्त्र घोर तप नंतर ,
    प्राप्त हुआ ब्रम्ह वरदान ।
    Leaves, ash, water, wind, sun rays - were the only food for him.
    After thousand years of intense tenacity , he got the boon from Brahma.

    पर गंगा ठहरी स्वर्ग नदी ,
    मृत्यु लोक से क्या प्रयोजन ?
    करें कैसे प्रोत्साहित चंचला को,
    सृष्टि निर्माता यही करें चिंतन ।
    However, there was an impediment. Ganga, though born on Earth, was living in Heaven since many years. She was mercurial in nature. How to motivate her to come down to the Earth - the creator of the universe was engrossed in that anxiety.
    किसके रोके रुका समय,
    शीतल रात्रि या धूप कड़ी ।
    गिरते पड़ते चलते रुकते ,
    आ ही गयी विपद घडी |
    No one can stop the clock - good time or bad time. At last, the hour of crisis arrived.

    कार्तिक , बाल गणपति थामे आँचल ,
    पूछे माँ गौरी से पल पल ,
    क्लिष्ट है उत्तर , बाल सुलभ प्रश्न सरल ,
    क्या धरा चली आज रसातल ?
    Two young kids, Kartik and Ganesh, holding the clothes of their mother , Parvati , kept on asking a question every now and then. The question was innocent, but the answer was grueling - "Will the Earth move to abyss today ?

    चारण , सिद्ध देवगण, ऋषि
    अस्पष्ट शब्द, अव्यवस्थित आवृति |
    कांपे चरण अष्ट दिग्पालों के ,
    ओंठों पर थी वही स्तुति |
    Panegyrists, enlightened, gods ,sages - everyone was praying for something. They were so nervous that the uttered words were topsy-turvy, the rhyme were chaotic. The knees of the master of the eight directions - who were responsible for holding the Earth - were trembling. However, everyone seemed to reciting the same prayer.

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  4. [3] Valor

    मेघ आवरण से आच्छादित आकाश,
    करें पृथक भुवन से भूतल |,
    पृथ्वी रक्षा का बाल प्रयास,
    पर हुई अगोचर अंतरिक्ष हलचल |
    The thick blanket of the cloud separated the Earth from the heaven , as if it was trying to save the Earth from the imminent fury. But in this process, the movement in the sky was also blacked out.

    प्रति क्षण तीव्र कर्कश ध्वनि,
    मानो शिलाएँ होती चूर ।
    अगले क्षण क्षीण हो जाती ।
    मानो अश्व दल जाए दूर |
    As such nothing was visible, one could guess based on the sound filtering through. Sometimes , it was shrill and loud , as if rocks were crushed. In the very next moment, it faded away as if cavalry was going away.

    वेग सहेजो बेटी गंगा ,
    क्षुब्ध शम्भो की हुंकार क्रुद्ध,
    मृत्यु लोक यह, देवलोक नहीं ,
    बसते यहाँ मानव क्षुद्र |
    Exasperated Shiva tried to convince her ," Restrain your momentum Ganga. This is the world of mortals. It was a land of normal human beings, not land of gods (where Ganga was flowing that time).

    स्नान करें तेरे जल से
    हो पाप मुक्त अनायास,
    कृषक सींचें खेत धारा से ,
    बुझाएं वनचर अपनी प्यास |
    Just by taking holy dip in your waters, they would be free from sins. The farmers would use your waters . Wild animals would quench their thirst.

    अकस्मात् गिरी उल्काएं,
    गुंजायमान तड़ित अगणित ।
    तिरस्कारिणी, इतराती ,
    गंगा वाणी हुई प्रतिध्वनित ।
    All of a sudden, as if meteors were falling. The sound was great as if innumerous
    Thunders struck. Everyone listened the reverberated sound of the reply of Ganga.

    हुआ प्रचंड घोर शब्द ,
    तब देखा जगत ने अकस्मात् ।
    प्रकट हुआ मेघ मध्य ,
    भीषण श्वेत प्रलय सा प्रपात |
    With a tremendous tumult, all of a sudden , the world saw, the cascade of white cataclysm descended.

    शक्ति विकट लहरों पर लहरें,
    तलहीन कुण्ड में जाए धंसती ।
    श्याम रज्जु के जाल में
    ,निमिष मात्र में जाएँ फंसती ।
    Tremendously strong waves after waves, steeped down in a bottomless pond. They seemed to be trapped in split second.

    नीलकंठ का जटाजूट वह,
    तिलस्म और रहस्य से पूर्ण ।
    भूलभुलैया, अगणित कंदराएँ ,
    विस्तृत निकास कहीं, कहीं संकीर्ण ।
    That was the matted tress of Lord Shiva. It was full of irregularities, surprises and obstacles. There were thousands of caves, Labyrinths and mazes. Somewhere, the passage was broad, in the very next bend, it was stifling narrow.

    कहीं आरोह, कहीं अवरोह ।
    कहीं घुमाव, क्षणिक कहीं ठहराव |
    भंवर पार कहीं लहरें मिलतीं,
    पल भर में पुनः अलगाव ।
    Somewhere ascension, somewhere steep furrow - somewhere flexion, somewhere barrier - That was Lord Shiva's matted tress. The waves merged , somehow circumvent vortex and then in the next turn, got separated. Their movements were totally out of control.

    तलहीन ताल हैं यत्र तंत्र ,
    जिसमें सम्पूर्ण नीर समाता ।
    करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो
    गागर में सागर हे ज्ञाता ।
    Bottomless ponds were at every corner, which could consume any amount of waters. Hey narrator, clear the picture please with a concise explanation.

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  5. [4] Tranquility
    अंतहीन दुर्गम सुरंगमयी पथ ,
    अतिकाय लहरों ने ठानी ।
    स्वर्गिक लहरें , ये दुर्गति ,
    करें इतिश्री यह कहानी |
    The waves were getting tired of difficult undulating path and endless tunnel .
    They realized that they were trapped and not going anywhere. As the pride of
    celestial river took over , the highly incensed waves decided to break free by their might.

    बूँद बूँद में नयी स्फूर्ति,
    संयोजा लहरों ने शेष बल ।
    किया संकल्प बहा दें बाधाएं,
    कर दें इस वन को समतल ।
    There was new vigor in each drop.The waves collected the remaining energy. They were determined to break any obstacles and wash away the binding forest.

    लहरों ने थामा लहरों को,
    बना संगठन हुआ विलय,
    चट्टान भेदी प्रहार पर प्रहार,
    जागृत हुआ प्रसुप्त प्रलय |
    The waves joined hand and coordinated their efforts. They began slapping the obstacles with earth shattering impacts. That was the awakening of the sleeping deluge.

    होने लगी लहरें अब पस्त
    यत्न निष्फल , नैराश्य ह्रदय |
    ओंठों पर आई वही स्तुति ,
    समर्पण भाव का हुआ उदय |
    Then the waves were getting terribly tired. They realized that all their efforts were futile. The intransigent celestial river became completely submissive to Lord Shiva and seeking His protection.

    ले लो मुझे छत्रछाया में ,
    हुई प्रभु मैं शरणागत ।
    करो मुक्त इस जंजाल से,,
    रहूँ सदा आपसे सहमत |
    “Lord, I am surrendering myself to you. I’ll always obey your instruction. Please unbound me from this tangle.”

    शंख ध्वनि , पुष्प वृष्टि चहुँ ओर ।
    स्वर्ग नदी अब हुई समर्पित ।
    छोड़ी तब एक धार शम्भू ने,
    किया उसे धरा को अर्पित |
    Shower of flowers, Conch sound filled the entire space. The celestial river was now under the protection of Lord Shiva. Lord Shiva set a small stream to descend on Earth.


    [5] Summation

    पड़ी शीतल फुहार, अकस्मात ,
    दृश्य सम्पूर्ण परिवर्तित पल में ।
    करे किल्लोल आल्हादित खग दल,
    भस्म अवशेष समाहित जल में ।
    As soon as the soothing waters touched the barren deserted land, the landscape transformed in a second. The heap of ashes was immersed in waters. The almost dead birds started playing in the waters.

    छलके आंसू विलीन हुए,
    निर्झर निर्मल जल धार में ।
    देते तर्पण भार मुक्त भगीरथ,
    लौट आये तिलस्मी संसार में |
    Tears dropped from the eyes of Bhagirath and became part of the clear stream. Bhagirath completed the water ceremony for his ancestors. Then he returned to the entangled world.

    कभी देखें मुड़ के भगीरथ प्रयत्न,
    अथाह मनोबल की गौरव गाथा ।
    करो स्पष्ट धुंधला चित्र, भरो
    गागर में सागर हे ज्ञाता ।
    Sometimes we must turn to the saga of tremendous will power and persistent of Bhagirath. Hey narrator, clear the fuzzy picture. Tell me the complete account in a concise form.

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