मंगलवार, 30 अगस्त 2022

मारुति का पर्वत उत्तोलन

 हर एक हिन्दू के घर में किसी भगवान् की कोई मूर्ति या चित्र हो या न हो, किन्तु एक प्रतिमा या तस्वीर पूजा गृह में अवश्य मिल जाएगी | इसमें हनुमान जी एक हाथ में पर्वत उठाये गमन करते नज़र आते हैं | जब भारत ने  कोरोना का टीका ब्राज़ील को भेजा था , तब ब्राज़ील के आभार पत्र में वही छवि अंकित थी |  सदियों से यह तस्वीर हिन्दुओं को संकट की घडी में प्रेरणा देते आयी है | 

यह एक तरह से रामायण का न्यूनतम बिंदु था, जहाँ आशा की एक किरण भी दिखाई नहीं देती थी | सब कुछ ठहर सा गया था | अधर्म की विजय स्पष्ट  थी | तब हनुमान जी के इस पराक्रम से मानो धर्म में नवजीवन का संचार हुआ  था | 

राम कथा को कई महाकवियों ने महाकाव्य के रूप में परिणित किया है | तुलसी रामायण की कहानी काफी अलग है | बाकी तीनों रामायण की कहानी और घटनाएं काफी कुछ मिलती हैं | अर्थात कम्ब रामायण और कृत्तिवास रामायण वाल्मीकि रामायण से काफी प्रभावित हैं  | राम और लक्ष्मण के साथ सारी वानरसेना बेसुध होती है | विभीषण बचे रहते हैं | जांबवान रास्ता दिखाते हैं | चार औषधियों का जिक्र होता  है | और अंत में राक्षसों और वानरों की मृत्यु का अंतर स्पष्ट किया गया है | 

अब कवियों की कल्पना ने  इस घटना के वर्णन को नए आयाम दिए हैं | उनका तुलनात्मक अध्ययन अपने आप में एक रोचक दिग्दर्शन कराता है | 

वाल्मीकि रामायण 

माना  जाता है कि वाल्मीकि रामायण छह शताब्दी ईसा पूर्व के कालखंड में लिखी गयी थी | इसलिए इसे आदि काव्य भी कहते हैं | इस रामायण के अनुसार मेघनाद के ब्रह्मास्त्र के असर से श्री रामचंद्र जी भी अछूते नहीं थे |

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राम चरित मानस (तुलसीदास)

तुलसीदास जी की इस रामायण में यह प्रसंग सबसे अलग है | इसमें केवल लक्ष्मण ही मूर्छित होते हैं | एक गुप्तचर का उल्लेख है | छल कपट है | फिर भारत की महिमा का वर्णन है जिसका उल्लेख किसी और रामायण में नहीं है |

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कृत्तिवास रामायण 

बांग्ला में लिखी कृत्तिवास रामायण का बंगाल में वही दर्जा है जो उत्तर भारत में तुलसी रामायण - "रामचरित मानस" का है | यह ग्रन्थ बंगाल के भक्त कवि कृत्तिवास ओझा ने पंद्रहवी शताब्दी में लिखा था - तुलसीदास जी के 'राम चरित मानस' से करीब एक सदी पहले | चारों रामायणों के वृत्तांत में इस रामायण में यह प्रसंग सबसे ज्यादा विस्तृत और नाटकीयता से भरपूर है | और तो और - इस रामायण के अनुसार हनुमान जी पूरा पर्वत उठाकर नहीं लाते, अपितु पर्वत की ही मदद से औषधियां चुन कर लाते हैं | 

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कम्ब रामायण 

कम्ब रामायण तमिल के सुप्रसिद्ध कवि  कम्बन द्वारा बारहवीं शताब्दी में लिखा गया है | इस प्रसंग  के पूर्व कम्ब खर के पुत्र के पराक्रम का उल्लेख करते हैं जो किसी रामायण में नहीं है | उनके वर्णन के हिसाब से हनुमान जी यहाँ सबसे लम्बी दूरी लांघते हैं | उनके वृत्तांत में श्री रघुनाथ जी घायल नहीं होते, किन्तु लक्ष्मण के वियोग के कारण मूर्छित जरूर हो जाते हैं | हनुमान जी के संजीवनी बूटी लाने के पूर्व ही उनकी मूर्छा टूट जाती है | 

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और देखें  -

वाल्मीकि रामायण 

राम चरित मानस (तुलसीदास)

कृत्तिवास रामायण 

कम्ब रामायण 




मारुति का पर्वत उत्तोलन - वृत्तांत १ - वाल्मीकि रामायण

 आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने इस घटना की अनूठी पृष्ठभूमि तैयार की है | 

एक ही दिन में देवान्तक ,नरान्तक, त्रिशिरा , अतिकाय, महोदर और  महापार्श्व को खोने के बाद रावण विषाद के सागर में डूब गया | प्रचंड पराक्रमी मेघनाद से पिता का यह दुःख देखा नहीं गया | उसने रावण को दिलासा दी,"पिताजी, अभी आपका पुत्र जीवित है | जब उसने देवराज तक को परास्त किया है तो क्षुद्र मानवों की बात ही क्या है ?"

रावण से आशीर्वाद लेकर मेघनाद ने रणभूमि की ओर  प्रस्थान किया | उसके साथ विभिन्न वाहनों पर सवार होकर उत्साही राक्षसों का समूह भी चल पड़ा |

 इससे पहले जब सुन्दरकाण्ड में मेघनाद हनुमानजी से युद्ध करने चला था, तब रावण ने उसे अपने साथ सेना ले जाने के लिए मना किया था ,"सेनाएं या तो समूह में भाग जाती हैं या मारी जाती हैं |" 

किन्तु इस समय रावण ने मेघनाद को सेना के साथ जाने से रोका नहीं |

 उन भयंकर राक्षसों से घिरा इंद्रजीत रणभूमि पहुंचा | रणभूमि पहुंचकर इंद्रजीत  ने एकाएक रथ रोक लिया  |  राक्षस सेना का समूह उनके चारों ओर एकत्र होकर प्रश्वाचक दृष्टि से उनकी ओर देखने लगा |  राक्षस योद्धाओं की भीड़  में इंद्रजीत रथ से उतरकर भूमि पर बैठ गया और उसने पवित्र अग्नि प्रज्ज्वलित की |  

अग्नि में मेघनाद ने एक बकरे की बलि चढ़ाई और अग्निदेव का आव्हान किया | साक्षात् अग्निदेव प्रकट हुए | अग्निदेव ने स्वयं मेघनाद के रथ , अस्त्र शास्त्रों और कवच को ब्रह्म मन्त्र से अभिमंत्रित किया | अब दुगने उत्साह से मेघनाद रथ पर सवार हुआ और वानरों का संहार करने निकल पड़ा | 

उस दिन रणभूमि में मेघनाद ने त्राहि-त्राहि मचा दी | गवाक्ष, गंधमादन, नील, द्विविद आदि वानरों को तो उसने बड़ी आसानी से क्षत विक्षत कर दिया | अब वह आकाशमार्ग में उड़ चला और अदृश्य हो गया |  आकाश से ही उसने ब्रह्मास्त्र से वानर सेना पर प्रलयंकारी प्रहार करना प्रारम्भ किया | दुर्दांत शरों की बौछार करके उसने जांबवान, सुग्रीव और अंगद को भी धराशायी कर दिया | उस दिन उसका क्रोध और तेज इतना भयंकर था कि बजरंगबली भी बुरी तरह घायल हो गए | 

लेकिन हनुमान जी पर उसके पहले मेघनाद एक बार ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर चुका था जब सीता का पता लगाने हनुमान जी  लंका आये थे | किसी व्यक्ति पर दूसरी बार ब्रह्मास्त्र का प्रयोग उतना असरकारी नहीं रहता| दूसरे, हनुमानजी को खुद ब्रह्माजी से वर प्राप्त था कि ब्रह्मास्त्र का असर उन पर एक घडी से ज्यादा नहीं रहेगा | 

मारुति  रक्तरंजित अवश्य हो गए थे , लेकिन अचेत या धराशायी नहीं हुए | फिर भी मेघनाद अदृश्य होकर युद्ध कर रहा था, इसलिए पवनपुत्र को भी कुछ सूझ नहीं रहा था |  

आसमान से मानो शरों की वर्षा हो रही थी | मेघनाद दिखाई तो नहीं देता था, किन्तु उसका अट्टहास कभी इस छोर से तो कभी उस छोर से सुनाई देता था | 

श्री रामचंद्र जी ने लक्ष्मण से कहा ,"लक्ष्मण | बाणों की तीव्रता से यह स्पष्ट है कि इंद्र शत्रु ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है | जगत के सृजनकर्ता के इस  अस्त्र से मैं और तुम भी इन वानरों की तरह अचेत हो जायेंगे - यह निश्चित है | उसके पश्चात् ही यह राक्षस लंका चले जायेगा |" राम जी की बात पूरी होते-होते लक्ष्मण जी अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े | अगले ही क्षण राम जी भी सुध-बुध खो बैठे | 

ब्रह्मास्त्र का प्रभाव दिन के चार प्रहर तक रहा | पांचवें पहर, अर्थात सायंकाल के होते-होते उसका प्रभाव कम होने लगा | देखते ही देखते अँधेरा छा गया | उस अन्धकार में मशाल हाथ में लिए विभीषण अपने साथियों को पुकारते हुए घूमने लगे | आश्चर्य की बात यह थी  कि विभीषण, जो कि श्री रघुनाथ जी द्वारा लंकापति घोषित किये जा चुके थे, आखिर मेघनाद के प्रकोप से कैसे अछूते रह गए ? महाकवि वाल्मीकि ने इस सन्दर्भ में कुछ लिखा नहीं | संभव है, विभीषण को मेघनाद की माया का पूर्व  ज्ञान हो |  

वही विभीषण जब अपने साथियों को पुकार रहे थे , तब उन्हें घायल अवस्था में उनकी पुकार का उत्तर देने वाले मारुति मिल गए | फिर क्या था ? एक से दो भले | अब हनुमान जी ने भी अपने हाथ में एक मशाल ले ली और वे सबको पुकारते हुए चले |  विभीषण बताते जा रहे थे कि राम और लक्ष्मण सिर्फ मूर्छित हुए हैं | वे अभी जीवित हैं | ऐसा प्रतीत होता था, मानो उनकी बात सिर्फ मारुति ही सुन रहे हैं | कहीं कोई आर्तनाद या पीड़ा का स्वर भी नहीं सुनाई पड़ता था | यहाँ वहाँ रक्त से लथपथ वानरों के शरीर पड़े हुए  थे | 

युद्ध स्थल पर उन्हें बाणों से बिंधे हुए जांबवान जी मिल गए | 

"जांबवंत जी, | आप जीवित तो हैं ?" विभीषण ने पुकारकर पूछा | 

जांबवान की उन्हें दुर्बल सी वाणी सुनाई दी ,"राक्षसराज, मैं आपकी वाणी तो सुन पा रहा हूँ , किन्तु आपको देख नहीं पा रहा हूँ | इंद्रजीत ने बाणों से मेरा अंग-अंग बींध  दिया है | मैं आँखें भी नहीं खोल सकता | आपने हनुमानजी को कहीं देखा है ? क्या हनुमानजी जीवित हैं ?"

विभीषण जी आश्चर्यचकित रह गए ,"ऋक्षराज, न आपने राम या लक्ष्मण के सम्बन्ध में कुछ पूछा, ना वानरराज सुग्रीव या युवराज अंगद के बारे में | जान पड़ता है , हनुमानजी के सम्बन्ध में आपका स्नेह कुछ ज्यादा ही है |"

जांबवान, जो बड़ी मुश्किल से ही कुछ कह पा रहे थे, उन्होंने लम्बे चौड़े तर्क देने के बजाय संक्षेप में कुछ ही शब्दों में विभीषण को समझाने की कोशिश की ,"विभीषण, जिन परिस्थितियों में हम पड़े हैं, उस अवस्था से हमें अगर कोई निकाल सकते हैं तो वो बजरंगबली ही हैं | यदि बजरंगबली जीवित हैं तो उनमें हम सब निर्जीव लोगों को पुनर्जीवित करने की शक्ति है | अगर वे खुद ही प्राण खो बैठे हैं तो हम अगर जीवित भी हैं तो इस परिस्थिति में मरे के समान ही हैं |"

भाव विभोर हुए हनुमानजी से अब नहीं रहा गया | उन्होंने जांबवान  के चरणों में प्रणाम किया | उनकी आवाज़ सुनकर जांबवान ने राहत की साँस ली | जांबवान खुद ब्रह्मा जी के पुत्र माने जाते हैं } इसलिए वृद्ध होने के बावजूद और तीरों से बिंधे होने के बाद भी वे बात कर पा रहे थे | 

"केवल एक ही जगह ये औषधि उपलब्ध है |" जांबवान , जो सबसे बुजुर्ग थे, जिनका अनुभव और ज्ञान विस्तृत था, कह रहे थे ," दूर हिमालय में जाना पड़ेगा | वहां कैलाश पर्वत और ऋषभ पर्वत के मध्य एक और पर्वत है जो सामान्यतः नज़र नहीं आता | उस पर्वत के शिखर पर चार जड़ीबूटियां हैं - मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संघानी | हे महावीर , तुम तुरंत प्रस्थान करो और सागर के उस पार सहस्त्र योजन दूर जाकर तत्काल वे बूटियां  लेकर आओ | तब ही हम सबके प्राण बच सकते हैं |"

मारुति एक बार फिर एक लम्बी यात्रा पर निकल पड़े | जब वे सीता का पता लगाने लंका में आये थे, तब उन्होंने शत योजन समुद्र लांघा था | यह उससे दस गुनी लम्बी, सहस्त्र योजन की यात्रा थी | पिछली यात्रा के समय हनुमानजी तरोताजा थे | इस समय वे स्वयं घायल थे | यह बात सही थी कि सागर पर सेतु बंध चुका था और हनुमानजी अगर चाहते तो कम से कम सागर पार करने का कार्य  सेतु से पूरा कर सकते थे | लेकिन उसमें समय ज्यादा लगता और यात्रा की दूरी भी बढ़ जाती | 

पुनः एक बार लंका में स्थित  मलय पर्वत को हनुमान जी का उत्पीड़न सहना पड़ा |  जब हनुमान जी सीता की खोज में लंका आये थे, तो अपने विशालकाय शरीर के साथ मलय पर्वत पर ही उतरे थे | फिर लंका से वापिस जाने के समय उन्होंने मलय पर्वत से ही छलांग भरी थी | एक बार फिर वे मलय पर्वत से छलांग लगाने को आतुर थे | इस बार की यात्रा बहुत लम्बी थी - सहस्त्रों योजन की |  साथ ही एक एक क्षण बहुमूल्य था | युद्ध के जीत और हार का सारा दारोमदार अब इस यात्रा पर निर्भर करता था |  हनुमान जी ने शरीर को संकुचित किया, मन को एकाग्र किया और वे औषधि लेने उड़ चले | 

शीघ्रगामी हनुमान जी ने कुछ ही क्षणों में खतरनाक मत्स्य और सर्पों से भरे महासागर को लांघ लिया | अब वे वनों, सरोवरों, नदियों, समृद्धशाली जनपदों  ग्राम और नगरों के ऊपर से उड़ रहे थे | 

कुछ घडी उड़ने के पश्चात उन्हें ब्रह्मर्षियों के विशाल आश्रम दिखने लगे | देखते ही वे समझ गए  कि वे हिमालय के समीप आ गए हैं | वहां उन्हें वनों के बीच सुरम्य झरने , कन्दराएँ और ऊँचे ऊँचे वृक्षों और हिम से आच्छादित पर्वत शिखर दिखाई  देने लगे | ब्रह्मा जी के निवास स्थान को पार करके वे कैलाश पर्वत के समीप पहुँच गए |  कैलाशऔर ऋषभ पर्बतों के मध्य उन्हें औषधियों से भरपूर जगमगाता हुआ वह पर्वत दिखाई दिया, जिसका वर्णन जांबवान ने किया था | 

आनन्-फानन में वे पर्वत के ऊपर चढ़ गए और शिखर की ओर लपके जहाँ जांबवान की बताई हुई चार औषधियां होने की सम्भावना थी | अचानक औषधियों को भान हुआ कि कोई उन्हें उखाड़कर ले जाने आया है | डर के मारे सारी औषधियों की आभा जाती रही और पर्वत पर अन्धकार छा गया | 

लक्ष्य के इतने पास पहुंचकर इस अकस्मात् बाधा से हनुमानजी को बहुत क्रोध आया | सारा दोष उन्होंने पर्वत पर ही निकाला | उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं और उन्होंने गर्जना की," "नगेंद्र | श्री रघुनाथजी का भला करने में भी तुम्हें परेशानी हो रही है | मैं अपने बाहुबल से अभी तुह्मारा दर्प चूर चूर कर देता हूँ |"

बलपूर्वक मारुति ने वह पर्वत उखाड़  लिया | समय भी कम था | वापसी यात्रा भी लम्बी थी | तीव्र गति से चलते हुए हनुमानजी सूर्योदय होने के पूर्व ही पर्वत के साथ लंका जा पहुंचे | 

उन औषधियों की सुगंध का ही यह प्रभाव था कि राम और लक्षमण की मूर्छा जाती रही और वे जाग गए | इतना ही नहीं, सारे वानर, जो क्षत विक्षत हो चुके थे , आँखें मलते हुए उठ खड़े हुए | उनके अंगों से सारे बाण निकल गए | 


अंत में वाल्मीकि जी एक रोचक तथ्य का उल्लेख करते हैं | जब से युद्ध शुरू हुआ था, तब से रोज राक्षस और वानर - दोनों मारे जाते थे | लेकिन रावण की आज्ञा से मरने वाले हर राक्षसों को रात के अँधेरे में समुद्र में डाल दिया जाता था ताकि वानरों को अनुमान न लग सके कि कितने राक्षस मारे गए थे | 

तात्पर्य यह कि औषधियां तो आखिर औषधियां थीं | वे वानरों और राक्षसों में भेद नहीं कर सकती थीं और एक औषधि के रूप में उन्हें भेद करना भी नहीं चाहिए था | जरा कल्पना कीजिये कि प्रमुख वानरों की तरह देवान्तक, नरान्तक, महापार्श्व, त्रिशिरा और महोदर के शरीर भी रण भूमि में पड़े होते और उन्हें औषधियों की सुगंध मिल गयी होती तो फिर क्या होता ? 

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और देखें  -

मारुति का पर्वत उत्तोलन

राम चरित मानस (तुलसीदास)

कृत्तिवास रामायण 

कम्ब रामायण 

मारुति का पर्वत उत्तोलन - वृत्तांत २ - तुलसी रामायण

 राक्षसों की सेना की अपार क्षति देखकर रावण विक्षुब्ध हो गया | तब बूढ़े मंत्री माल्यवान ने उन्हें सीता को वापिस करके  राम से संधि कर लेने सुझाव दिया | मेघनाद वहीँ खड़ा था | उसने माल्यवान को डपट दिया | रावण भी आग बबूला हो  गया | उसने माल्यवान को ऐसी झाड़ पिलाई कि माल्यवान ने वहां रुकना उचित नहीं समझा और घर चले गया | मेघनाद ने रावण से निवेदन किया ,"पिता जी, मुझे आज्ञा दीजिये | कल मैं युद्ध स्थल पर राक्षस सेना  की बागडोर हाथ में लेना चाहता हूँ | इंद्र से जीता हुआ वह रथ, जो मैंने आपको भी नहीं दिखया था, उसका प्रयोग मैं कल करूँगा |"

मेघनाद की वह बात कोरा आश्वासन नहीं था | अगले दिन रणभूमि में वह काल बनकर छा गया | पहले वह अपने सामान्य रथ पर ही किले से उतरकर रणभूमि में गया और वानर सेना को अस्त-व्यस्त कर दिया | नल, नील, जांबवान और यहाँ तक कि अंगद - कोई उनके सामने टिक नहीं सका | तब हनुमानजी उनसे जा भिड़े और दोनों में भीषण युद्ध छिड़ गया | एक विशाल चट्टान फेंककर हनुमानजी ने मेघनाद के रथ को चकनाचूर कर दिया | 

चट्टान के रथ तक पहुँचने से पहले ही  मेघनाद फुर्ती से रथ से बाहर कूद पड़ा और आकाश में उड़ चला | हनुमानजी उसे बार बार ललकारते थे पर वह पास नहीं आता था | क्योंकि अब वह अदृश्य मायावी रथ पर सवार हो चुका था | उसने ऐसी माया रची कि वानर सेना दिग्भ्रमित हो गयी | आकाश में ऊँचे चढ़कर वह बहुत से अंगारे बरसाने लगा | पृथ्वी में जहाँ तहाँ जल की धाराएं प्रकट होने लगी | पिशाच पिशाचियाँ प्रकट होकर 'मारो-काटो' का हो-हल्ला मचाने लगे | किसी को कुछ नहीं सूझा | सभी दसों  दिशाओं में भाग चले | समय व्यर्थ न गंवाते हुए अब वह श्री रघुनाथ जी से ही भिड़  गया  और अपनी माया से उन्हें प्रभावित करने का प्रयास करने लगा | जैसे कोई मनुष्य साँप का बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डराए |  उस सारी माया को काटने में राम जी को केवल एक ही बाण की आवश्यकता पड़ी | सारा मायाजाल बिखर गया और वानरों को सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा | 

लक्ष्मण जी अत्यंत क्रोधित हो गए | मेघनाद के दुस्साहस पर विराम लगाने की उन्होंने राम जी से आज्ञा मांगी और अंगद आदि वीरों के साथ मेघनाद से युद्ध करने निकल पड़े | उधर मेघनाद के इर्द गिर्द प्रबल राक्षस भी इकठ्ठा हो गए | रणभूमि में वानर और राक्षस अपने अपने प्रतिद्वंदी चुनकर उनसे भिड़ गए | रक्त की धाराओं से गड्ढे भर गए और उन पर भयंकर युद्ध से उड़ने वाली धूल जमा होने लगी, मानो अंगारों के दे र पर राख  छा  रही हो | लहूलुहान योद्धा फूले हुए पलाश के वृक्षों की तरह सुशोभित हो रहे थे | 

लक्ष्मण और मेघनाद के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया | कुछ ही समय में मेघनाद का रथ लक्षमण ने चूर चूर कर दिया, घोड़े और सारथि मार गिराए | मेघनाद को अपनी  मृत्यु स्पष्ट दिखाई देने लगी | उस घातक अस्त्र को चलाने का सही समय आ गया था - जिसका नाम था - वीरघातिनी | उस अमोघ शक्ति के छाती पर लगते ही लक्ष्मण रणभूमि में मूर्छित होकर गिर पड़े | 

अब तक मौत को सामने देखने वाले मेघनाद में इतनी निर्भीकता आ गयी कि वह बेधड़क लक्ष्मण के पास चले आया | इतना ही नहीं, उसने लक्ष्मण को उठाकर लंका ले जाने का निर्णय लिया ताकि अपने पिताजी के क़दमों पर उन्हें एक भेंट के रूप में प्रस्तुत कर सकें | पर लक्ष्मण जी तो साक्षात् शेषनाग ठहरे , जिन्होंने  खुद ही पूरी पृथ्वी का भार उठा रखा था | करोड़ों मेघनाद भी आ जाते तो उन्हें हिला नहीं सकते थे | वह जीतकर भी अपमानित होकर लंका लौट गया | 

संध्या के समय दोनों ओर की सेनाएं लौटने लगी और सेनापति अपने योद्धाओं की  खोज खबर लेने लगे | लक्ष्मण को न आते देखकर चिंतित हो हनुमान जी ने पूछा , "लक्ष्मण कहाँ है ?"

तभी जिस लक्ष्मण को मेघनाद थोड़ा भी नहीं हिला पाया था, उन मूर्छित लक्ष्मण का शरीर कंधे पर उठाये हनुमान जी प्रकट हुए | यह दृश्य देखकर राम जी समेत सारी वानरसेना सदमे में आ गयी |  परन्तु यह समय शोक करने के बजाये पूरे जागृत  मन से त्वरित कार्यवाही करने का था | जांबवान ने सुझाया, "लंका में विख्यात वैद्य सुषेण रहते हैं |" आनन् फानन में मारुति घर समेत वैद्य सुषेण को लंका से उठाकर ले आये | 

सुषेण ने श्री रघुनाथ जी के चरणों में सर नवाया, लक्ष्मण की हालत देखी और उस औषधि का नाम और पता बताया जो सुदूर पर्वत पर स्थित थी | श्री रघुनाथ जी के चरणों में सर नवाकर हनुमानजी वह औषधि लेने निकल पड़े | 

उधर रावण के गुप्तचर भी सक्रिय थे | उनकी सूचना मिलते रावण को ज्ञात हुआ कि औषधि तो सुबह तक पहुंचनी चाहिए | अब  उसने हनुमानजी की यात्रा में व्यवधान के लिए एक योजना बनाई | अब मारीच इस संसार में नहीं था | फिर भी मायावी राक्षसों की कमी नहीं थी | उसने कालनेमि को पकड़ा | 

फिर वही दृश्य, जो रावण के साथ अलग अलग समय पर अलग अलग पात्र कर चुके थे, फिर एक बार दोहराया गया | कालनेमि ने रावण को मूर्खतापूर्ण कृत्य न करने की सलाह दी | जिसने उनका नगर जला दिया , जो खुद कालसर्प का भक्षक है, उसका मार्ग अवरुद्ध करना ? और रावण ने किससे शत्रुता मोल ली है ? पर उसके उन सुझावों का एक बार फिर वही हश्र हुआ | रावण का क्रोध सातवे आसमान पर जा पहुंचा | कालनेमि ने भी वही निर्णय लिया जो अतीत में इसी नाटक के अन्य पात्र ले चुके थे - इस मूर्ख के हाथों मरने से तो बेहतर है, उनके हाथों मृत्यु आये जो स्वयं जगदीश्वर के दूत हैं | 

कालनेमि ने हनुमान की यात्रा के अंतिम चरण के पथ पर एक सुन्दर आश्रम बनाया जिसके चारों ओर सुन्दर उपवन और एक सरोवर था | उनका अनुमान सत्य निकला | यात्रा के अंतिम पड़ाव तक पहुँचते-पहुँचते  हनुमान जी को प्यास लग आयी | आश्रम देखकर उन्होंने सोचा कि मुनि से पूछकर थोड़ा जल पी लूँ | 

मुनि के आश्रम में चरण रखते ही उनके विस्मय की सीमा नहीं रही | उन्हें अपनी ही धुन में मग्न एक ऋषि के दर्शन हुए जो रामधुन गा रहे थे | 

"स्वागत है राम सेवक | औषधि लेने जा रहे हो ?" छद्म ऋषि ने पूछा | 

हनुमानजी को आश्चर्यचकित देखकर उसने बात आगे बढ़ाई ,"विस्मय का कोई कारण नहीं वत्स | मैं दिव्य दृष्टि से राम-रावण युद्ध देख रहा हूँ | "

"इस कष्ट से घबराओ मत | भला धर्म की लड़ाई में अधर्म भले संशय डाल दे, पर वह जीत कैसे सकता है ? "

हनुमान जी के मन में कई सवाल भी उठे | ऋषि के प्रति आदर का भाव भी उमड़ आया | फिर भी उन्हें अपने लक्ष्य का ध्यान था | उन्होंने सीधे पीने के लिए जल मांग लिया | 

"कमंडल में जल पड़ा है वत्स |" छद्म ऋषि ने कहा | 

"भला इतने से जल से इस विशाल शरीर का क्या होगा ?" हनुमान जी ने कहा ," क्या मैं सरोवर का जल पी सकता हूँ ? फिर उन्होंने अपना संदेह व्यक्त कर दिया ," आपको दूर- दूर तक देखने वाली यह ज्ञान दृष्टि कैसे प्राप्त हुई ?"

"तुम भी प्राप्त करना चाहते हो ?" ऋषि ने कहा, "ज्यादा मुश्किल नहीं है | तुम जैसे कुशाग्र बुद्धि को तो बिलकुल समय नहीं लगेगा | जाओ, सरोवर में स्नान कर आओ | अभी दीक्षा दे देता हूँ |"

हनुमान जी जब सरोवर की ओर चले तो उनके मन में थोड़ा असमंजस था | एक ओर  उनका मन कह रहा था, समय नहीं है | तुरंत पानी पीकर निकल लो | दूसरी ओर उन्हें लग रहा था, अगर समय ज्यादा न लगे तो यह विद्या सीख ली जाए | युद्ध में शत्रुओं की गतिविधियों पर नज़र रखने में काफी काम आएगी | 

उन्होंने सरोवर में कदम रखा ही था कि एक मगरमच्छी ने उनके कदम पकड़ लिए | हनुमानजी ने पलक झपकते उसका वध कर डाला | पर यह क्या ? वह तो शापजनित अप्सरा निकली जो अब शापमुक्त होकर दिव्य स्वरुप धारण करके आकाश को चली | जाते जाते उसने हनुमानजी को सावधान कर दिया ,"वो कोई ऋषि नहीं, कपटी राक्षस है |"


"स्नान कर आये वत्स ?"

"गुरूजी, पहले आप गुरु दक्षिणा लीजिये, फिर मुझे मन्त्र सिखाइये |" हनुमानजी बोले |

"गुरुदक्षिणा तो दीक्षा पूरी होने के पश्चात् दी जाती है वत्स |" ऋषि ने कहा | 

"हमारे वानर कुल में पहले गुरु दक्षिणा दी जाती है, फिर शिक्षा ली जाती है | " हनुमानजी बोले | 

"बाद में दे देना | जल्दी क्या है वत्स ?" कालनेमि बोले | 

किन्तु हनुमानजी को तो जल्दी थी | एक एक क्षण कीमती था | उन्होंने नाटक के पटाक्षेप का निश्चय किया और कालनेमि के गले में पूंछ का फंदा डालकर बोले ,"आप गुरुदक्षिणा लेंगे या नहीं ?"

पोल खुलते देख कालनेमि के मुंह से सिवाय 'राम-राम' के कुछ नहीं निकला | हनुमान जी ने उसका वध तो किया पर मरते समय उसके मुंह से राम नाम सुनकर वे हर्षित हो गए | 

जब हनुमानजी पर्वत के पास पहुँचे तो वे औषधि की पहचान न कर सके | वैसे भी कालनेमि ने उनका काफी समय व्यर्थ कर दिया था | समय ज्यादा कीमती था | हनुमान जी ने वह पर्वत ही उखाड़ लिया और वे उसे आकाश मार्ग से ले चले | 

श्री रामचन्द्रजी के नाम से अयोध्या का राज-काज चलाने वाले भरत हमेशा सजग रहकर स्वयं नगर की रक्षा करते थे | सहसा रात्रि के समय भरत ने देखा, कोई विशालकाय प्राणी एक पर्वत को लेकर अयोध्या के ऊपर से उड़ा  जा रहा था | उसके राक्षस होने की सम्भावना उन्हें लगी | तत्क्षण उन्होंने  एक बाण उस प्राणी की ओर मारा | हालाँकि वह बाण बिना फल का था, किन्तु उस बाण में इतनी शक्ति थी कि वह प्राणी मूर्छित होकर नीचे गिर पड़ा | लेकिन भरत जी हतप्रभ रह गए | उन्होंने स्पष्ट रूप से उसके मुख से निकले शब्द -'राम राम रघुपति' सुने थे | 

भरत जी स्तब्ध रह गए | वह कोई राक्षस भी नहीं था | वह तो एक विशालकाय वानर था | अब वह मूर्छित था | भरत जी ने उसे ह्रदय से लगाया और अनेकों उपाय से उनकी मूर्छा दूर करने की कोशिश की | परन्तु हनुमानजी की मूर्छा दूर नहीं हुई | विधाता के इस विधान से भरत जी बहुत व्याकुल हो गए | एक बार फिर, भगवान ने उनके द्वारा अनायास ही राम के विरुद्ध एक और कार्य करवा दिया | आखिर किस वजह से ये वानर पर्वत लेकर जा रहा था ? उसके मुख से जिस प्रकार राम नाम निकले थे, उससे यह स्पष्ट था कि वह राम जी को जानता था और शायद उनका ही कोई कार्य कर रहा था | वह वानर अब गहरी मूर्छा में था | आँखों में आंसू भरकर भरत जी बोले, "यदि मन , वचन और शरीर से मेरा श्री रामचंद्र जी में निश्छल प्रेम हो तो ये वानर स्वस्थ होकर होश में आ जाए |"

इधर भरतजी विधाता को कोस रहे थे तो दूसरी ओर मनुष्य की लीला करते जगदीश्वर स्वयं विधि के विधान पर करुण विलाप कर रहे थे ,"अर्धरात्रि बीत गयी | कपि का कहीं कोई पता नहीं है | "

मूर्छित लक्ष्मण को हृदय से लगाकर श्री राम कह रहे थे ," भाई, तुम कभी भी मुझे दुखी नहीं देख सकते थे | मेरे लिए तुमने माता, पिता को छोड़ दिया और वन में हिम, गर्मी, तेज हवाएं सहते रहे | वह प्रेम अब कहाँ चले गया मेरे भाई ? मेरे व्याकुल वचन सुनकर अब उठते क्यों नहीं ?

हजारों योजन दूर अयोध्या में भरत जी भी हनुमान के उठ जाने के लिए प्रार्थना कर रहे थे ,"यदि राम जी के प्रति मेरा प्रेम सच्चा है, तो हे विधाता, यह कपि उठ जाए |"

श्री राम जी के शब्दों की ही वह महिमा थी कि हनुमान की मूर्छा टूट गयी | जब उन्हें ज्ञात हुआ कि वे कहाँ हैं और किस कार्य के लिए निकले हैं तो वे एकदम जाने के लिए उद्यित हो उठे | किन्तु सामने राम जी के ही अपने छोटे भाई बैठे थे | उनके पास से ऐसी सहजता से चले जाना भी भरत जी का अपमान होता | संक्षेप में, काम से काम शब्दों में हनुमान जी ने सारा विवरण कह सुनाया | भरत जी बड़े ही दुखी हुए ," सब कुछ मेरे कारण  ही हो रहा है | मैं इस संसांर में ही क्यों आया ? मेरे कारण प्रभु को इतने कष्ट हुए |"

हनुमान जी को जाने के लिए आतुर देखकर भरत जी को आत्मग्लानि सी हो रही थी कि उनके कारण इतना समय निकल गया | उन्होंने हनुमानजी को सुझाव दिया ,"तात, समय बहुमूल्य है | प्रभात के पहले न पहुँच पाने पर कार्य बिगड़ जाएगा | तुम मेरे इस बाण पर बैठ जाओ | मैं पल भर में तुम्हें श्री रामचन्द्रजी के पास पहुंचा देता हूँ | 

हनुमान जी के स्वाभिमान को ठेस पहुंची | फिर उन्हें लगा कि मेरे और इस पर्वत के भार से भला ये बाण क्या चलेगा ? तब उन्हें प्रभु के प्रताप का स्मरण हो आया | फिर भी उन्हें अपने आप पर ही ज्यादा विश्वास था | वे विनम्रतापूर्वक भरत के चरणों को छूकर बोले,"प्रभु | आपका प्रताप ही मेरे लिए शक्ति है | मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए | आज्ञा दीजिये |"

भरत जी के शील और स्वाभाव की प्रशंसा करते हुए हनुमान जी तुरंत वहां से निकल गए | 

उधर श्री रामचंद्र जी का करुण विलाप बढ़ते ही जा रहा  था ," भाई | अगर मुझे ज्ञात होता कि तुम्हें खोना पड़ेगा तो शायद मैं वनवास से भी मना कर देता | पुत्र, स्त्री, धन , घर - ये सब इस संसार में खो जाने के बाद दूसरे मिल जाते हैं, किन्तु सगा भाई कभी नहीं मिलता | तुम्हारे बिना मेरा जीवन वैसे ही होगा जैसे पंख बिन पक्षी का, मणि बिन सर्प का और सूंड बिन गजराज का होता है | "

"अब मैं अवध कौन सा मुंह लेकर जाऊंगा ? लोग तो कहेंगे - देखो, कैसा व्यक्ति है ? स्त्री के लिए उसने भाई खो दिया |  इस बदनामी से तो अच्छा था मैं वो बदनामी झेलता, जब लोग कहते, इस कायर को देखो | अपनी स्त्री की रक्षा नहीं कर सका | कम से कम तुम तो मेरे साथ रहते |मैं तो किसी तरह अपयश और तुम्हारा विछोह सह लूंगा पर सुमित्रा माता को कैसे समझाऊंगा ? भाई , कुछ तो बोलो | क्या जवाब दूंगा उनको ?"

प्रभु के इस प्रलाप से सारी वानर सेना हतोत्साहित हो चुकी थी | सभी शोक सागर में डूबे हुए थे | 

तभी हनुमान जी का वहां आगमन हुआ | मानो करुण  रस के मध्य अचानक वीर रस का अभ्युदय हो गया हो | 

वानरों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा | हनुमान जी को श्री रघुनाथ जी ने गले लगा लिया | वैद्य सुषेण तत्काल औषधि बनाने के कार्य में जुट गए | कुछ ही क्षणों की बात थी , जब लक्ष्मण जी उठ बैठे , मानो गहरी नींद से जागे हों | 

कार्य संपन्न होते ही हनुमान जी ने वैद्य सुषेण को उनके घर समेत गंतव्य पर पहुंचा दिया | 

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और देखें - 

मारुति का पर्वत उत्तोलन

वाल्मीकि रामायण 

कृत्तिवास रामायण 

कम्ब रामायण 


मारुति का पर्वत उत्तोलन - वृत्तांत ३ - कृत्तिवास रामायण

 एक ही दिन में देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा, अतिकाय, महापार्श्व , महोदर आदि वीरों के संहार का समाचार सुनकर रावण शोक-सागर में डूब गया | दूतों और गुप्तचरों के कहे वचनों पर उसे यकायक विश्वास ही नहीं हुआ |  एक-एक वीरों की शूरता की गाथा याद करके उसका चित्त विचलित हो रहा था | इंद्रजीत से यह देखा नहीं गया | 

"पिताजी, मुझे केवल आपके चरणों की धूल चाहिए |" इंद्रजीत ने कहा ,"मैं आज ही राम और लक्ष्मण का संहार कर दूंगा | आपने मेरे रहते उन दिग्गज वीरों को रणभूमि में भेजकर गलती की | उनके प्राण बच सकते थे | खैर, आज मैं वानर सेना का संहार करूँगा | सुंग्रीव, अंगद, हनुमान, नल, नील - कोई नहीं बचेगा | जांबवान को तो मैं  समुद्र के पानी में डुबाकर मारूंगा | "

इंद्रजीत  के वचनों से रावण को थोड़ी सांत्वना मिली | इंद्रजीत अभी भी बोले जा रहा था,"पिताजी, आपके प्रताप से तो देवता भी कांपते  हैं | ये नर और वानर जैसे तुच्छ प्राणियों से आप घबरा गए ? मैं आज ही राम और लक्ष्मण को बांधकर लाता हूँ | "

इंद्रजीत के जोशीले शब्दों से रावण का आत्मबल शनैः -शनैः पुनः हरा भरा हो गया | 

कुछ ही समय पश्चात् इधर रावण अपने हाथों से मेघनाद का आभरण कर रहा था, उधर मेघनाद ने सारथि को आवाज़ दी और रथ को जल्दी सुसज्जित करने का आदेश दिया | 

सारथि पर्वतीय घोड़ों से जुते रथ को लेकर आ गया | उसके साथ तेईस अक्षौहिणी सेना चली | सेना के पदचाप से ही  पृथ्वी डोलने लगी | अचानक मेघनाद को याद आया, "माँ का आशीर्वाद तो लिया ही नहीं | यदि माँ से बिना पूछे रणभूमि में गया तो माँ अन्न जल त्याग देगी | "

मेघनाद को यह भी भली भांति ज्ञात था कि मां उससे क्या कहने वाली है ? हुआ भी कुछ वैसा ही | 

मंदोदरी दो लाख विधवा नारियों से घिरी हुई थी | ये वो नारियां थी, जिनके पतिदेव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे | मंदोदरी भगवान शिव जी से अपने पति और पुत्र की कुशलता के लिए पूजा कर रही थी | रह-रह कर उन विधवाओं का क्रंदन होने लगता था | 

मंदोदरी उसे देखते ही उठ खड़ी हुई और उसने अपने पुत्र का आलिंगन किया | बोली,"बेटा , मैं गंगाधर शिवजी की पूजा करती हूँ, जिसने मुझे तुम जैसा पुत्र दिया | फिर भी देखो तो, ये कैसा संकट आया है | तेरे बाप ने तो परायी स्त्री का हरण करके लंका को विनाश की और धकेल  दिया है |बेटा, राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, साक्षात् विष्णु के अवतार हैं | जो भी युद्ध भूमि में उनसे लड़ने जाता है, जीवित नहीं लौटता | तुम राम जी को सीता लौटा दो और उनसे मित्रता कर लो | तुम्हारे बाप से अच्छे तो तुम्हारे चाचा विभीषण निकले, जिन्होंने राम का स्वरुप पहचान कर उनसे मित्रता कर ली | तुम भी उनके विरुद्ध युद्ध में मत जाओ | अपने पिता से कहकर परायी नारी को  वापिस कर दो और लंका को बचा लो |"

अभिमान में चूर मेघनाद किसी तरह बड़ी मुश्किल से हँसी दबाकर बोला," माँ , ये तुम क्या कर रही हो ? पति निंदा तो महा पाप है | पिताजी ने आठों दिग्पालों को हराया है | मैंने इंद्र को पराजित किया है | जितने वैभव से इन्द्र की पत्नी रहती है, उससे सौ  गुना ज्यादा ऐश्वर्य  से तो तुम रहती हो | फिर परायी स्त्रियों के साथ ऐसा करना तो बलशाली पुरुषों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है | इंद्र को देख लो | वे देवराज हैं | गौतम के शिष्य होकर भी उनको अपने गुरु की पत्नी से ऐसा कृत्य करते  उन्हें शर्म नहीं आयी | चन्द्रमा तो ब्राह्मणों का देवता माना  जाता है | उसने अपने गुरु बृहस्पति की पत्नी का हरण किया और आज संसार में प्रकाश देता है | 

फिर आप पिता को दोष क्यों देती हो ? खर दूषण का वध करके राम ने पहले ही हमसे शत्रुता मोल ले ली थी | उसके बाद शूर्पणखा का अपमान - पिताजी ने क्या गलत किया है ?"

दो लाख विधवाएं बिलखने लगी | सब मेघनाद से अपनी करुण गाथाएं कहने लगीं | मेघनाद ने सबको सांत्वना देते हुए कहा," बस | आज ही राम और लक्ष्मण का वध करके मैं तुम लोगों का बदला पूरा करूँगा | अब रोओ  मत | माता, अब मुझे आज्ञा दो | मुझे निकुंभला का यज्ञ करना है | इष्टदेव की अर्चना मैं पहले ही इतना विलम्ब हो चुका है | "

ऐसा करके मेघनाद ने मां से विदा ली और यज्ञशाला में चले गया | 

रकवस्त्र , लाल पुष्पों की मालाएं , रक्त  चन्दन , सरकंडे के पत्ते, घी के घड़े लाये गए | उसके बाद लाये गए - काले बकरे | मंत्रोच्चार के साथ अग्नि प्रज्ज्वलित की गयी और एक के बाद दूसरे, काले बकरों की आहुति दी जाने लगी | यज्ञ की ज्वाला मंत्रोच्चार के साथ बढ़ते चले गयी | अंततः साक्षात् अग्निदेव प्रकट हुए और खुद यज्ञ में दी जाने वाली आहुति का सेवन करने लगे | 

इंद्रजीत ने जो वर माँगा , वह अनायास ही मिल गया | प्रफुल्लित इंद्रजीत अपनी सेना का सञ्चालन करने कूदकर रथ पर जा बैठा | सर पर चंड - मुण्ड छात्र थामे खड़े थे | आनन्- फानन में वह पूर्वी दरवाजे पर पहुँच गया | पूर्वी दरवाजे पर आक्रमण की बागडोर नील के हाथ में थी | इंद्रजीत को आते देखकर वानर सेना में भगदड़ मच गयी | वानर कुछ ही दिनों पूर्व इंद्रजीत के कोहराम को झेल चुके थे, जब गरुड़ ने नागपाश से राम लक्ष्मण समेत समस्त वानरों को नया जीवन दिया था | वही भयावह इंद्रजीत उनके सम्मुख था |  तितर - बितर होते हुए वानर सेना को नील ने सम्हाला | उसने इंद्रजीत को ललकारा | इंद्रजीत तुरंत  ही बादलों की आड़ में छिप गया और वहीँ से वानर सेना पर बाण चलाने लगा | 

तीखे बाणों से सारी वानर सेना धराशायी होने लगी | नील भी कब तक टिकता | जल्दी ही उसका लहूलुहान शरीर धरती पर गिर पड़ा | 

पूर्वी द्वार पर जीत प्राप्त करने के पश्चात इंद्रजीत दक्षिणी द्वार की और बढ़ा | अंगद सहित वानर वीर वहां दिन भर के युद्ध बाद आराम कर रहे थे | इंद्रजीत का सिंहनाद सुनकर वे झटपट उठ खड़े हुए | शरभ , देवेंद्र महेंद्र के साथ अंगद ने मेघनाद पर वाक्बाणों की बौछार सी कर दी | मेघनाद जरा भी विचलित नहीं हुआ | वह भी दुर्वचन कहता हुआ फिर बादलों के पीछे जाकर छिप गया और वानर सेना पर अमोघ बाण बरसाने लगा | उसने ब्रह्मास्त्र का भी प्रयोग कर दिया | वानर सेना भला कब तक टिकती ?

अब बारी उत्तरी द्वार की थी जहाँ वानरों के राजा सुग्रीव मोर्चा सम्हाले थे | दिन के युद्ध के पश्चात् वे भी विश्राम कर रहे थे | शिविर के रात्रि रक्षक के रूप में धूम्राक्ष  सजग थे | इंद्रजीत ने ललकार कर पूछा ," कौन कौन जाग रहा है ? पिछली बार तो तुम लोग लोग बच गए थे | गरुड़ ने बचा लिया था | देख लो, इस बार काल से तुमको कौन बचाता है |" धूम्राक्ष ने उलटकर जवाब दिया ,"अपने चाचा कुम्भकरण और भाइयों का हश्र देख चुके हो न ? छद्म युद्ध बार बार नहीं चलता |  हम सब लोग जाग रहे हैं | जब तक तेरे पिता को मारकर विभीषण को राजा न बना दें , हम चैन की नींद नहीं सोयेंगे |"

अट्टहास करता हुआ इंद्रजीत एक बार फिर बादलों के पीछे अदृश्य हो गया | वहां से वह तीखे  बाण छोड़ता हुआ वानरों को क्षत विक्षत  करते रहा | आखिर उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया | औरों के साथ राजा सुग्रीव भी बेसुध होकर धरती पर गिर पड़े 

बाकी रह गया पश्चिमी द्वार | वहां राम लक्ष्मण के साथ हनुमान भी थे } उस समय हनुमान जी ही रात्रि रक्षक थे | मेघनाद ने बादलों के पीछे से अदृश्य रहकर व्यंग्य से पूछा ,"पश्चिमी द्वार पर कौन कौन जग रहा है ?" मेघनाद था तो अदृश्य , किन्तु हनुमानजी भला उसकी आवाज़ पहचानने में कैसे चूक सकते थे | क्रोध से बोले," सब जाग रहे हैं मेघनाद और तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं | जब तक तुम्हारे पिता का वध नहीं हो जाता और विभीषण के सर पर राजछत्र सुशोभित नहीं होता, तब तक आराम वर्जित है |"

अदृश्य रहकर ही मेघनाद ने हनुमान को अपशब्द कहे और उनकी ओर ध्यान न देकर सीधे राम को ललकारा ,"जीवित अयोध्या लौटोगे ? भूल जाओ | मेरा नाम इंद्रजीत है |" और फिर वह अदृश्य रहकर राम और लक्षण को ही बाणों से बींधने लगा | राम जी पर असंख्य बाण छोड़ने के बाद उसने लक्ष्मण को सम्बोधित किया, "इसको झेल के देखो|" देखते ही देखते लक्ष्मण राम के बगल में गिर पड़े | क्षुरपार्श्व और अर्द्धचन्द्र नामक दो बाणों से आहत हो राम भी धरती पर गिर पड़े | वानर सेना में हाहाकार मच गया | 

इंद्रजीत ने थोड़ा रूककर इस बार ये सुनिश्चित किया कि राम और लक्ष्मण पिछली बार की तरह बच ना पाएं | उसने चारों द्वारों  पर वानर सेना को बुरी तरह पस्त किया था | 

निश्चित रूप से विजय पताका फहराने के बाद मेघनाद को पारितोषिक मिलना तय था | अधीर होकर वह राजमहल चले गया | पिता के चरणों में तीन बार प्रणाम  करने बाद उसने युद्ध की स्थिति के बारे में रावण को अवगत कराया | राम और लक्ष्मण से शुरू हुई एक लम्बी सूची ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी - सुग्रीव, हनुमान, अंगद , जांबवान शरभ, नील , सुषेण, गंधमादन .... |  मेघनाद को पर्याप्त राजप्रासाद प्राप्त हुआ || विचित्र रत्नमुकुट, माणिक्य, रत्न और सहस्त्रों विद्याधरी कामनियाँ  - सब मेघनाद को मिलीं | केवल नया छत्र और दंड नहीं दिया गया | पारितोषिक प्राप्त करने के पश्चात् मेघनाद अंतःपुर में गया और नारी मंडली के साथ पांसे खेलने बैठ गया | 

चारों द्वारों पर राम लक्ष्मण सहित वानर सेना गिरी पड़ी थी | ब्रह्मा का वरद-हस्त होने के कारण  केवल विभीषण और हनुमानजी बचे थे | हाथ में दीपक लेकर मंथर  गति से दोनों वानर सेना का निरीक्षण करने लगे - कोई तो जीवित बचा हो | 

असंख्य योद्धाओं के साथ उत्तरी द्वार पर सुग्रीव पड़े हुए थे | हाथ में वृक्ष लिए सेनापति नील पूर्वी द्वार पर पड़े थे | दक्षिणी द्वार पर बाणों से बिंधा पड़ा अंगद का धराशायी शरीर पड़ा था | पचिमी द्वार पर स्वयं राम और लक्ष्मण निश्चेष्ट पड़े थे |   पास ही बाणों से बिंधे हुए जांबवान भी पड़े थे | आँखें खुल नहीं रही थी | 

विभीषण की आवाज़ को उन्होंने पहचाना | जब विभीषण ने उनसे परामर्श माँगा तो उन्होंने कहा," मैं देख नहीं पा रहा हूँ | शरीर में लाखों बाण चुभे हुए हैं | क्या तुम पवनपुत्र हनुमान जी को कहीं देख पा रहे हो ?" 

विभीषण को बड़ा आश्चर्य हुआ | उन्होंने कहा, " लगता है, इंद्रजीत के बाणों से तुम्हारी मति मारी गयी है | जगत के पूज्य श्री राम और लक्ष्मण मूर्छित हैं | हमारे महाराज सुग्रीव जी रण भूमि में पड़े हैं | लगता है, पवनपुत्र हनुमानजी के सिवाय संसार में तुम्हारा कोई मित्र  ही नहीं है |"

जांबवान ने कहा,"इस समय मेरा मस्तिष्क काम नहीं कर रहा है | आप केवल हनुमानजी को बुला दो | अगर वे जीवित हैं तो वे ही राम लक्ष्मण सहित सारे वानरों को जीवनदान दे सकते हैं | "

हनुमानजी ने जांबवान के चरणस्पर्श कर अपना परिचय दिया | जांबवान ने मद्धिम आवाज़ में कहा ,"तुम तुरंत आकाश मार्ग से जाओ | हिमालय पर्वत लांघोगे , तो आगे धवन वर्ण का ऋष्यमूक पर्वत है | उसके दक्षिण पूर्व में कैलाश पर्वत है | ऋष्यमूक पर्वत पर चार तरह की औषधियां मिलेंगी | उनके नाम हैं, विशल्यकरणी , मृत संजीवनी, अस्थिसंचरणी और सुवर्णकरणी | ये चारों औषधियां जल्दी से ले आओ | "

हनुमानजी ने तुरंत पूँछ ऊपर की, दोनों कान खड़े किये और वे आकाश में उड़ चले | 

पल भर में वे समुद्र लांघ गए | कितनी ही नद-नदियां , पर्वत , जंगल उन्होंने रात में ही पार कर ली | वे अनवरत चलते ही गए | एक ही रात में वे बारह वर्षों का पथ पार कर गए | हिमालय पर्वत भी वे लांघ गए | कैलाश पर्वत के पास उन्हें धवल वर्ण का ऋष्यमूक पर्वत दिखाई पड़ा | आनन फानन में वे पर्वत पर चढ़ गए | अब दुविधा औषधियों को पहचानने की थी | औषधियां वे पहचान नहीं सके | रात बहुत बीत गयी और चार तो क्या, एक भी औषधि नहीं मिली | हनुमानजी को जांबवान पर क्रोध आया - "इंद्रजीत का बाण खाकर उनकी बुद्धि कुंठित हो गयी | और मैं भी एक जल्दबाज़ मूर्ख की तरह उनकी बातों में आकर कष्ट उठाकर यहाँ आ गया | फिर उन्होंने अपने आपको संयत किया | उनके मन में विचार आया, जांबवान अनुभव और बुद्धि के सागर हैं | लोग उन्हें व्यर्थ ही बुद्धिमान महामंत्री नहीं कहते | इस पर्वत ने ही वे औषधियां छुपाकर रखी हैं | इंद्र ने यों ही इन पर्वतों के पंख नहीं काटे थे | ये महादुष्ट होते हैं | "

हनुमानजी नीति के ज्ञाता थे | सबसे पहले उन्होंने हाथ जोड़कर पर्वत की वंदना की," पर्वत राज, रणभूमि में राम और लक्ष्मण घायल पड़े हैं | उनके लिये कितने ही नदियों, और वनों को लांघकर मैं यहाँ पहुंचा हूँ | कृपा कीजिये | तुम तो सुमेरु हो | बड़ा हृदय दिखाकर औषधि का दान करो तो सबके प्राण बच जायेंगे | "

जब साम से काम नहीं बना तो हनुमान जी सीधे दंड पर उतर आये ," पर्वतराज, मेरी बात सुनना  तो दूर, तुम मेरा उपहास  करते हो ? लो, अब देखो |" हनुमानजी ने पर्वत को पकड़कर खींचा तो पर्वत उखड़ने लगा | लताएं, टूटने लगी | आर्तनाद करते हुए जानवर इधर उधर भागे | यक्ष पुकारने लगे,"ईश्वर , रक्षा करो |" अंततः स्वयं पर्वतराज एक ऋषि का वेश बनाकर हनुमान जी के सम्मुख उपस्थित हुए | 

"हे महावीर, तुम कौन हो ? पर्वत से खींचतान क्यों कर रहे हो ? "

पीछा छुड़ाने के अंदाज़ में हनुमानजी ने संक्षेप में उत्तर दिया , "रावण के साथ युद्ध करते हुए अभी राम और लक्ष्मण युद्ध भूमि में मूर्छित हुए पड़े हैं | उनके लिए ही मैं औषधि लेने आया हूँ | मेरा नाम हनुमान है | इस अभिमानी पर्वत ने ठिठोली करते हुए औषधियां छुपकर रख दी हैं | कोई बात नहीं, मैं इसे उखाड़कर लंकापुरी ले जाऊंगा | "

"शांति रखो वत्स |" मुनिवर बोले,"मेरे साथ चलो | अभी मैं तुम्हें औषधि वाले वन दिखता हूँ |"

वे हनुमान जी का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें उस स्थान पर ले गए जहाँ वांछित औषधियां थीं | 

हनुमान जी ने चारों प्रकार की औषधियों की प्रचुर मात्रा इकठ्ठा की | वह एक छोटा-मोटा पर्वत ही बन गया | उसे उठाकर फिर उन्होंने कान सीधे किये , पूँछ ऊपर की और पलक झपकते ही लंकापुरी पहुँच गए | 

सबसे पहले वे औषधि लेकर पश्चिमी द्वार गए | "मृत संजीवनी" की सुगंध पाते ही राम और लक्ष्मण सहित सारे वानरों की मूर्छा दूर हो गयी | अस्थि संचारिणी से वानरों के कटे फटे अंग अपने आप जुड़ गए | "सुवर्णकरणी' की सुगंध से उनका पूर्व स्वरूप वापिस आ गया - सारे घाव भर गए |   वे उत्तरी द्वार गए और वनराज सुग्रीव सहित सब वानरों को औषधि सुंघाई | वे मानो नींद से जागकर उठ बैठे | दक्षिणी द्वार पर अंगार और सरे वानर और उत्तर द्वार पर नील - सब स्वस्थ हो गए और श्री रामचन्द्रजी की जयघोष करने लगे | 

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और देखें  -

मारुति का पर्वत उत्तोलन

वाल्मीकि रामायण 

राम चरित मानस (तुलसीदास)

कम्ब रामायण 




मारुति का पर्वत उत्तोलन - वृत्तांत ४ - कम्ब रामायण

 खर का एकमात्र पुत्र था - मकरन्न | पिता की मृत्यु के प्रतिशोध की अग्नि में झुलसता हुआ वह रणभूमि में राम जी के वध के लिए निकला | काफी वीरता दिखाई और एक समय उसने सम्पूर्ण वानर सेना की व्यूह रचना को छिन्न भिन्न  कर दिया था | फिर भी परिणीति वही हुई जो अपेक्षित थी | अंततः वह राम जी के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ | 

जब रावण को यह समाचार प्राप्त हुआ तो उसके क्रोध और शोक की कोई सीमा नहीं थी | उसने सीधे इंद्रजीत को बुलाया | इस युद्ध में एक वही था, जो हमेशा उसके साथ खड़े रहा | यही नहीं, वह एक बार रावण को करीब करीब विजय भी दिलवा चुका था | 

इंद्रजीत तत्काल वहां आ पहुंचा | उसने अपने पिता को ढाढस बँधाया, "पिताजी , आप चिंता मत कीजिये | आज ही के दिन आप देखेंगे , सीता देखेगी और अनगिनत देवता देखेंगे - वानरों के शवों का एक विशाल अम्बार, जिनके ऊपर दोनों धनुर्धर भाइयो का मृत शरीर पड़ा होगा | " यह कहकर उसने तीन बार अपने पिता की प्रदक्षिणा की, पाँव छुए और रणभूमि के लिए निकल पड़ा | 

इंद्रजीत जब रणभूमि में पहुँचा तो राक्षसों के शवों को देखकर अचंभित और क्रोधित हो गया | राक्षसों के मृत शरीरों का अम्बार मानो आकाश छू रहा था | एक ओर टूटे हुए रथों और मरे हाथियों का ढेर लगा था  | "वे दो मानव ", उसने गुस्से से दांत पीसे ,"उन्होंने धनुष बाण का उपयोग किया ? या फिर किसी माया या इंद्रजाल का प्रयोग किया ? इतने लोगों का वध वे कैसे कर सकते हैं ? आज मैं उनके इस कृत्य पर पूर्ण विराम लगाता हूँ |"

दूसरी ओर प्रतीकार की अग्नि  किसी और के मन में भी धधक रही थी | इंद्रजीत को रणभूमि में आते देखकर लक्ष्मण ने तत्काल राम से अनुमति मांगी, " भैया | आज्ञा दीजिये | आज हिसाब बराबर करने का सुनहरा अवसर है | वर्ना मैं जीवनपर्यन्त अपयश और उपहास का पात्र बने रहूँगा | लोग कहेंगे, देखो इस योद्धा को | नागपाश से अपनी रक्षा नहीं कर पाया तो भला दूसरों को क्या सुरक्षा प्रदान करेगा ? उस दिन नागपाश से वीर गति को प्राप्त हो गया होता तो कहीं ज्यादा अच्छा होता | अब जीवित हूँ तो अपयश के उस दाग को धोने के लिए मुझे इस राक्षस का वध करना पड़ेगा | वार्ना मौत आने पर यमदूत नहीं, कुत्ते मेरे शरीर को ले जायेंगे |"

राम की आज्ञा मिलते ही लक्षमण ने शंखनाद किया और सीधे इंद्रजीत पर टूट पड़ा | देखते ही देखते उसने इंद्रजीत की सेना को अस्त-व्यस्त कर दिया किन्तु इंद्रजीत अविचलित था | उसने पुकारकर कहा ,"तुम्हारा भाई कहाँ है ? क्या तुम दोनों एक साथ नहीं, एक-एक करके मरना पसंद करोगे ? तुम्हारी इच्छा |"

"किस तरह का युद्ध पसंद करोगे इंद्रजीत ?" लक्ष्मण ने प्रत्युत्तर में पुकार कर कहा, " तीर, कमान , तलवार या और कोई हथियार ? कहो तो मल्ल युद्ध हो जाये ? आज तो तुम बच कर नहीं जा पाओगे |"

"अरे हटो | मैं पहले तुम्हें मृत्युलोक भेजूँगा और फिर तुम्हारे भाई को | मुझे चाचा कुम्भकर्ण समझने की भूल मत करना | मैं इंद्रजीत हूँ | अब तक मेरे जितने भाई ,  रिश्तेदार मारे गए हैं, तुम दोनों भाइयों के रक्त से उनका तर्पण करूँगा |"

"तुम्हारे पूरे कुनबे के लिए विभीषण तर्पण करेगा |"  लक्ष्मण ने क्रोध से कहा | 

पल भर में वह वाक्युद्ध धनुर्युद्ध में परिवर्तित हो गया | 

इंद्रजीत ने राम, लक्ष्मण और वानरसेना के ऊपर बाणों की झड़ी लगा दी | किन्तु जैसे असंख्य झूठ भी एक सत्य के समक्ष ठहर नहीं सकते , लक्ष्मण ने उन बाण  वर्षा  को काट डाला | राम लक्ष्मण के पीछे जरूर खड़े रहे, किन्तु उन्होंने लक्ष्मण और मेघनाद के युद्ध में कोई हस्तक्षेप नहीं किया |  

युद्ध चलता ही रहा | दोनों योद्धा एक दूसरे से जूझते रहे | क्रोधवश लक्ष्मण ने राम से निवेदन किया," भैया , अब समय आ गया है कि इस राक्षस पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया जाये | "

राम एक क्षण हतप्रभ रह गए , फिर तत्काल उनके मुंह से निकला,"ये क्या कह रहे हो लक्ष्मण ? ब्रह्मा जी का अस्त्र क्या यों  ही चला दिया जाता है ? उसके कुछ नियम होते हैं | कितना विनाश होगा, तुम्हें कुछ अंदाज़ भी है ? वे सब निरपराध सैनिक , जो अपने स्वामी की युद्ध में रक्षा कर रहे हैं,  एक क्षण में भस्म हो जायेंगे |हो सकता है, हमारी वानर सेना के भी कुछ वानर चपेट में आ जाएँ | भूल जाओ ब्रह्मास्त्र को | ऐसे ही युद्ध करते रहो |"

तब तक मेघनाद अदृश्य हो चुका था | उसने सारी बातें सुन ली और सीधे रावण के पास चले गया |  उसके जाने पर देवता बड़े खुश हो गए | वानरों ने भी राहत की साँस ली | उन्होंने क्रोधवश मेघनाद को मनचाहे अपशब्द सुनाये और अस्त्र शस्त्र इधर उधर फेंककर बेखबर से हो गए |

"पिताजी, क्या मैं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करूँ ?" मेघनाद ने रावण से पूछा | 

रावण ने प्रतिवाद तो नहीं किया, किन्तु उपदेश जरूर सुना दिए," पुत्र, तुमने विचार तो किया है कि ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का परिणाम क्या होगा ? ये कोई ऐसा अस्त्र तो है नहीं, जिसे हलके में लिया जाए |"

"पिताजी, विद्वान कहते हैं कि मरने से बेहतर है कि मार दिया जाए | यदि उन्हें मेरे प्रयोजन का पता चला तो वे मुझे पहले मार देंगे , चाहे उन्हें स्वयं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग ही क्यों न करना पड़े | मैं अदृश्य रहकर बाण का संधान करूँगा ताकि लक्ष्य चुनने में व्यवधान न हो | उसके प्रयोग के पूर्व मैं पूजा कर लेना चाहता हूँ | "

"पिताजी, जब तक मैं पूजा करूँ, थोड़ी सी सेना युद्ध क्षेत्र में भेज दीजिये | ताकि वानर सेना को थोड़ी सी भी भनक न हो |"

रावण ने बड़े पेट वाले महोदर को थोड़ी सी सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में भेज दिया | वानर सेना बिना इंद्रजीत के सेना आते देख अचरज में पड़  गयी | 

"कहाँ है इंद्रजीत ? जरूर वह अदृश्य होकर युद्ध करेगा | सम्हल कर रहना | " सब एक दूसरे से कहते रहे | 

इंद्रजीत था कहाँ ?

वह यज्ञ की अग्नि में सामने बैठा था | राई और धतूरे के फूल चढाने के बाद काले बकरे की बलि दी गयी | उसके सींग और सारे दांत सुरक्षित रखकर उसका सर धड़ से अगल कर दिया गया और घी से साथ उसकी  यज्ञ की अग्नि में आहुति दे दी गयी | मंद सुगन्धित वायु ने यज्ञ की सुगंध सब ओर फैला दी | प्रसन्न चित्त इंद्रजीत ने इसे शुभ शकुन ही माना | अब ब्रह्मास्त्र उठाकर वह अदृश्य होकर रणभूमि में चले गया | 

और आकाश में अदृश्य रहकर उसने वह ब्रह्मास्त्र चला ही दिया | 

सबसे पहले लक्ष्मण आकाश से बरसते बाण से धराशायी हुए | देखकर हनुमानजी को बड़ा क्रोध आया ,"इंद्र की ये मजाल ? ऐरावत समेत मैं उसे मटियामेट कर दूंगा | " अगले ही क्षण असंख्य शरों से बिंधकर वे भी भूमि पर गिर पड़े | सुग्रीव कुछ समझ पाते, इससे पहले बाणों की वर्षा से वे भी अचेत हो गए | अंगद, जांबवान, नील - सबका वही हाल हुआ | 

"तो छोटे भाई तो वानर सेना के साथ मटियामेट हो गए | " इंद्रजीत ने अपना शंख बजाया | 

अब वह यह समाचार देने रावण के पास चले गया | 

"क्या राम भी मारा गया ?" रावण ने सीधे प्रश्न किया | 

"नहीं पिताजी | वह वहां नहीं था | वर्ना उसका भी वही हश्र होता जो उसके भाई और मित्रों का हुआ | " इस उद्घोषणा के बाद इंद्रजीत प्रसन्नचित्त होकर अपने महल में चले गया | 

श्री रामचन्द्र जी थे कहाँ ?

उधर रणभूमि में त्राहि-त्राहि मची थी | राम , जिन्होंने अभी अस्त्रपूजा संपन्न ही की थी , अपने साथियों का साथ देने रणभूमि में पहुंचे | उन्होंने जो दृश्य देखा, वे किंकर्तव्यमूढ़ हो गए | जहाँ तक दृष्टि जाती थी, निर्जीव शरीर पड़े हुए थे | सबसे पहले उन्होंने वानरराज सुग्रीव को पहचाना | पास ही हनुमान जी का पार्थिव शरीर देखकर वे भावुक हो गए , "पवनपुत्र, तुम वही हो न - मेरे लिए जिसने सागर लांघा , लंकापुरी तहस नहस की , सीता को ढांढस बंधाया | और अब तुम इस अवस्था में पड़े हो | देवताओं का वर, ऋषियों की मंगलकामनाएं, सीता का आशीर्वाद - कुछ भी तुम्हारे काम नहीं आया | क्या मेरे पापों का बोझ इतना भारी है ? मेरे कारण पिताजी ने प्राण त्याग दिए | मेरी सहायता करते करते जटायु मृत्यु को प्राप्त हुए और अब मेरे ये मित्र  - इस अवस्था में ..  मेरा जन्म ही लोगों को दुःख देने के लिए हुआ है | "

तभी  सबसे बड़े सदमे से उनका सामना हुआ | शवों के ढेर के ऊपर लक्ष्मण जी का  पार्थिव शरीर पड़ा हुआ था | 

रघुनाथ जी के मुख से एक शब्द भी नहीं निकला और अगले ही क्षण वे कटे हुए वृक्ष की भांति मूर्छित होकर गिर पड़े| |

न तो कोई उन्हें सम्हालने वाला ही  बचा था, न कोई सांत्वना देने वाला | रणभूमि में  लाल आँखों वाली कुछ राक्षस नारियां ही थीं, जो अपने  पतिदेव को खोज रही थी | सियार हर्ष से ऊँची आवाज़ में बोलियां बोल रहे थे | देवता ही नहीं, पाप और मक्कारी भी मूर्त रूप धारण कर शोक में आंसू बहा रहे थे  | 

कुछ समय पश्चात् श्री रघुनाथ जी की मूर्छा टूटी | लक्ष्मण को गले लगाकर वे आर्तनाद करने लगे | 

उन्हें अपने दुखों का अंत होता नहीं दिख रहा था | विलाप करते करते वे फिर मूर्छित हो गए | 

इसी बीच विभीषण , जो सेना के लिए भोजन का प्रबंध करने निकले थे , वापिस आ गए | किन्तु अब भोजन की आवश्यकता किसे थी ? सारी सेना तो मृतप्राय थी | विभीषण ने सबसे पहले श्री रघुनाथ जी को ढूँढना प्रारम्भ किया | जल्दी ही उन्होंने लक्ष्मण के बगल में उनका शरीर देखा | ध्यान से देखने पर उन्होंने पाया कि उनके शरीर पर एक भी बाण नहीं लगा है | विभीषण ने राहत की सांस ली | 

"राम जी सदमे से मूर्छित जरूर हैं, लेकिन जीवित हैं | वे होश में आ जायेंगे |" आशावादी विभीषण ने सोचा | उनकी आशावादी सोच तो वहां तक थी कि वे सोचने लगे, "जब ये सारी  वानरसेना नागपाश के फंदे से निकल सकती है तो इस अस्त्र से मुक्ति क्यों नहीं पा सकती ? जरूर सब लोग स्वस्थ हो जायेंगे | लेकिन पहले देखता हूँ कि आखिर और कौन कौन से लोग जीवित हैं |"

वे मशाल लेकर खोजते रहे | जल्दी ही उन्होंने बाणों से बिंधे हुए हनुमानजी को खोज निकाला | उनकी नाड़ी वगैरह टटोलने के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हनुमान जी जीवित हैं | वे तत्काल शीघ्रता किन्तु सावधानी से हनुमानजी के शरीर से एक एक करके बाण निकालने लगे | 

फिर वे थोड़ा सा जल ले आये और उसे हनुमानजी के चेहरे पर छिड़का | 

"राम |" कराहते हुए हनुमान जी के मुख से निकला | विभीषण की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा | शनैः - शनैः हनुमानजी कुछ बोलने की स्थिति में आ गए | 

"हमारे स्वामी कुशल से तो हैं ?" उन्होंने पूछा | 

"अभी वे लक्ष्मण जी के पास गहरी मूर्छा में पड़े हैं | जब उन्हें होश आएगा, तभी हम लोग जान सकेंगे कि हमारे लिए अगला कदम क्या होगा ?" विभीषण ने कहा | 

हनुमानजी समय की कीमत जानते थे | वे यह भी जानते थे कि  इस संकट की घडी में मार्ग कौन प्रशस्त कर सकता है | 

"जांबवान जी कहाँ हैं ? " उन्होंने पूछा | 

"पता नहीं | " विभीषण ने कहा ," मैं अभी आया हूँ |"

हनुमानजी और विभीषण मिलकर जांबवान को खोजने लगे | 

"मृत्यु उनके पास भी नहीं फटक सकती | उन्हें जल्दी ढूंढ निकालना आवश्यक है | वे ही उन दोनों भाइयो को मूर्छा से बाहर निकालने का उपाय सुझा सकते हैं | "

बाणों से बिंधे हुए जांबवान जी आखिर मिल गए | 

"निस्संदेह इंद्रजीत ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है |' जांबवान ने कहा,"किन्तु कोई भी अस्त्र श्री रघुनाथजी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता |"

आप ठीक कहते हैं |" विभीषण ने कहा , "वे इस समय लक्ष्मण जी के पास मूर्छित अवस्था में पड़े हैं |"

"कोई आश्चर्य की बात नहीं है | " जांबवान ने कहा,"उनके प्राण अलग अलग थोड़े ही हैं ?

फिर जांबवान हनुमानजी की ओर मुड़े,"हनुमान , तुमसे ही आशा है | यह समय व्यर्थ गंवाने का नहीं है | तुम तत्काल औषधि लेकर आओ |"

हनुआनजी कुछ समझे नहीं।  "कौन सी औषधि ? कहाँ से ?"

"तुम उत्तर दिशा की ओर नौ हज़ार योजन जाओ | तुम हिमालय पर्वत पर पहुँच जाओगे, जिसकी चौड़ाई दो हज़ार योजन है | वहां से तुम्हें फिर नौ हज़ार योजन आगे  जाना है | वहां तुम्हें स्वर्ण पर्वत मिलेगा | वहां से भी नौ हजार योजन आगे बढ़ने पर लाल रंग का निदत पर्वत मिलेगा | बिना विश्राम किये बढ़ते जाना | नौ हजार योजन और आगे बढ़ने पर मेरु पर्वत मिलेगा | अविरत चलते जाना मारुति ! नौ हजार योजन के पश्चात् नील पर्वत मिलेगा | अगले चार हजार योजन के पश्चात् मेघ की तरह श्याम पर्वत मिलेगा | यही तुम्हारी मंज़िल होगी | वह काला पर्वत औषधियों का भण्डार है | "

"तुम्हें कुल चार औषधि लानी है | पहली औषधि मृत शरीर में जान फूँक देगी | दूसरी औषधि शरीर की टूटी अस्थियां तुरंत जोड़ देगी | तीसरी औषधि शरीर में चुभे हुए सारे अस्त्र-शस्त्र पल भर में निकाल देगी और चौथी औषधि सारे घावों को भरकर काया पूर्वावस्था में ले आएगी |"

उन्होंने हनुमान को उन चार औषधियों की पहचान बताई | 

"हनुमान, उन औषधियों की जड़ें समुद्र तक हैं | उनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय समय हुई थी | "

विभीषण और हनुमान को आश्चर्य में पड़े देखकर जांबवान ने आगे कहा, "तुम्हें लग रहा होगा, ये सब मैं कैसे जानता हूँ ? जब आदियुगीन देवता पृथ्वी का  भ्रमण करते  हुए  नापजोख कर रहे थे तो नगाड़ा बजाते हुए मैं उनके आगे आगे चल रहा था | तब मैंने इन औषधियों को देखा और जिज्ञासावश उनसे पूछ लिया | उन्होंने जो उत्तर दिया , वह युगों युगों से ऋषिगण जानते हैं | परन्तु सावधान रहना | अनगिनत रक्षक तीक्ष्ण हथियार लिए उसकी रक्षा करते हैं | चिंता मत करो | जैसे ही उन्हें ज्ञात होगा, तुम किस प्रयोजन से आये हो, वे तुम्हारे लिए रास्ता छोड़ देंगे |"

हनुमान को अपनी शक्तियों का पता तब चलता था, जब उन्हें उसका आभास कराया जाता था | अब वह प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी | जांबवान ने उन पर पूरा विश्वास जताया था कि वे ही यह दुर्गम कार्य कर सकते हैं | 

"यदि मृतकों में प्राण फूंकने के लिए इतना सा ही कार्य है तो मैं अवश्य उसे पूर्ण करूँगा | अब आज्ञा दीजिये |" हनुमानजी ने जांबवान को प्रणाम किया और लम्बी यात्रा पर निकल गए | 

देखते ही देखते हनुमानजी का शरीर बढ़ने लगा | उनका सर मानो आकाश छूने लगा | कंधे मानो बादल की तरह फ़ैल गए | उनकी पूँछ गोलाकार हुई , भुजाये सामने फैली | दीर्घ सांस लेकर हनुमान ने जैसे ही छलांग भरी , लंका एक नौका की भांति डगमगाने लगी | 

सागर में उथल पुथल मचाते हुए, बादलों को चीरते हुए, देखते ही देखते हनुमान जी हिमालय के ऊपर पहुँच गए | वहां रहने वाले ऋषियों  ने आशीर्वाद दिया ,"तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो हनुमान |"

अगले ही क्षण वे कैलाश के ऊपर से गुजर रहे थे | शिव जी को देखते ही उन्होंने प्रणाम किया और शिवजी ने मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन स्वीकार किया | फिर पार्वती को पुकारकर हनुमान जी की ओर संकेत किया, "देखो, वे रामदूत पवनपुत्र हैं |"

पलक झपकते ही हनुमान  निदत पर्वत के ऊपर पहुँच गए | विष्णु भगवान के चक्र की गति से चलते हुए वे मेरु पर्वत तक जा पहुंचे जो पृथ्वी और स्वर्ग में दूरी मापने के लिए स्वीकार्य मापक माना  जाता था |  

अब वे उस द्वीप के ऊपर से गुजरे जिसमें जम्बू वृक्ष लगा था  वहीं पर्वत के शिखर पर उन्हें ब्रह्माजी के दर्शन हुए | उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम किया | 

मेरु पर्वत को पार करते ही हनुमानजी हताश हो गए | सामने सूरज अपनी किरणे बिखेर रहा था | 

"अब कुछ नहीं हो सकता |" हनुमानजी दुःख के सागर में डूब गए ,"औषधि सुबह होने के पूर्व पहुंचनी थी और सुबह हो चुकी है |"

अचानक उन्हें याद आया, " अरे, मेरु पर्वत के बाद तो समय परिवर्तित हो जाता है | यानी, अभी लंका में रात ही होगी | " उन्होंने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गए | 

अब वे श्याम पर्वत के पास पहुँच गए | वह पर्वत इतना काला था कि रात्रि भी शर्मा  जाए | 

हनुमान जी पर्वत पर कूद पड़े | देखते ही देखते वे तीक्ष्ण हथियारों से लैस रक्षकों से घिर गए | 

"कौन हो तुम?" एक रक्षक दहाड़ा," क्या चाहिए तुम्हें ?'

हनुमानजी कुछ कहते, इसके पूर्व ही विष्णु का चक्र प्रकट हुआ और हनुमान जी के चारों ओर घूमने लगा | अब हनुमानजी से कुछ पूछना रक्षकों को बेमानी लगा | 

"ठीक है , जो तुम्हें चाहिए, ले जाओ |" रक्षकों ने कहा ,"लेकिन याद रहे | इस स्थान को कोई क्षति नहीं पहुँचनी  चाहिए |" 

किन्तु हनुमान जी कहाँ मानने वाले थे ? रक्षकों के अदृश्य होने की देर थी कि हनुमान जी ने पूरा पर्वत उखाड़ लिया | 

"औषधियों को भला कहाँ ढूंढते फिरूं ?" हनुमानजी ने मन ही मन सोचा ,"समय महत्वपूर्ण है |" और देखते ही देखते पर्वत के साथ वे लंका की ओर उड़ चले | 

इधर हनुमान जी औषधि लेने निकले, उधर लंका में विभीषण और लड़खड़ाते हुए जांबवान लक्ष्मण के पास मूर्छित पड़े हुए राम जी के पास पहुंचे | उनकी सांस चल रही थी | दोनों ने राम जी के चरणों की मालिश की | धीरे धीरे राम जी ने आँखें खोली, विभीषण और जांबवान को पहचाना | उन्होंने अपने आसपास पड़े मृत शरीरों को देखा, लक्ष्मण की ओर देखा और शोक सागर में डूब गए | 

"सब कुछ नष्ट हो गया मित्रों | देखो तो , इतने सारे मृतक शरीर पड़े हैं  | क्या दोष था इनका ? यही न, कि इन लोगों ने मेरे पराक्रम पर विश्वास करके मेरे कार्य को संपन्न करने के लिए मेरा साथ देना स्वीकार किया ?"

"मेरा सम्पूर्ण जीवन  ही गलतियों से भरा है | सब कुछ जानते हुए, कि यह छल कपट है, सीता की प्रीत के कारण उसकी बात मानते हुए मैंने छद्म मृग का पीछा किया | भाई लक्ष्मण की बात नहीं मानी और आज देखो - उस मूर्खतापूर्ण कार्य के कारण कितने लोग काल के गाल में चले गए |"

"याद आता है तुम्हें उस दिन का भीषण युद्ध जो मेरे और रावण के बीच हुआ था ? उस दिन विजय श्री मेरे सामने खड़ी थी | चाहता तो मैं उसका वध कर सकता था | क्या सोच कर मैंने उसे छोड़ दिया ? और अब परिणाम देखो | मृतकों को गिनना मुश्किल है |"

उस राक्षस के ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के पूर्व लक्ष्मण ने स्वयं मुझसे ब्रह्मास्त्र के प्रयोग की अनुमति मांगी थी और मैंने नीति का अनुसरण करते हुए मना कर दिया | और उस राक्षस ने उचित-अनुचित का विचार किये बिना ही ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया | अब गलती किसकी मानोगे ?" 

"उसके बाद अपने भाई के साथ खड़े रहने के बजाये मैं शस्त्र पूजा करने चले गया | जब लौट के आया तो सब वानरों के साथ मेरा भाई भी चिरनिद्रा में सोया हुआ था |"

"भाई तो चले गया | इंद्रजीत का वध करने का उसका प्रण अधूरा रह गया | अब मैं जीकर क्या हासिल करूँगा ? राक्षसों का समूल नाश करके मुझे क्या मिलेगा ? कौन सा यश मिलेगा ? भरत मुझे राज सौंप देगा तो लेकर मैं क्या करूँगा ? क्या सत्य की राह पर चलने वाला आदर्श बनकर ही रह जाऊंगा ? जिसने नीति के लिए अपना भाई खो दिया ?"

"लोग तो यही कहेंगे न, अपने पिता तुल्य जटायु को खोया, मित्रों को खोया और अपने भाई को भी खो दिया , इस तृण के बने इंसान ने - किसलिए ? अपनी पत्नी के लिए |"

"ऐसे मिथ्या जीवन से तो मृत्यु ही अच्छी है | " राम जी विलाप करने लगे | 

जांबवान से रहा नहीं गया | वे उसके चरणों में गिरकर बोले, "प्रभो, कुछ करने के पहले मेरी एक बात सुन लीजिये | आप कौन हैं, क्या हैं - ये मेरे कहने की न तो आवश्यकता है और न ही इसकी अनुमति है | इतना ही कहूंगा भगवन ! थोड़ा सोचिये | जिस ब्रह्मास्त्र से हम सब की ये दशा हुई, जिससे वानर, राक्षस - कोई नहीं बच सकता, उससे आपको तनिक भी क्षति नहीं हुई | लक्ष्मण जी और ये सब वानर मृतप्राय अवश्य हैं, इसमें संदेह नहीं, किन्तु मृत नहीं हैं | इनके प्राण वापस आ जायेंगे | हनुमान जी औषधि लेकर आने ही वाले हैं | उनमें से एक औषधि मृत-संजीवनी है जो इन सब के प्राणों की रक्षा करेगी | दूसरी इनकी अस्थियों को जोड़ देगी | तीसरी औषधि , हे प्रभु, इनके शरीर से सारे बाण निकाल देगी | चौथी औषधि इनके सारे घाव भर देगी और शरीर पहले की तरह हो जायेगा | "

ये बातें अभी हो ही रही थी कि समुद्र के उत्तरी तट पर ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगी , जैसे मानो भयंकर तूफान आ गया  हो | आसमान में सितारे भटक गए | जंगल में मादा हिरणों ने मानो नर हिरण की छवि चन्द्रमा में देख ली हो और वे भयभीत होकर इधर उधर भागने लगी | 

अगले ही क्षण पर्वत के साथ हनुमानजी सामने खड़े थे | 

पर यह क्या ? वह दैवीय पर्वत ने मानो लंका की अपवित्र भूमि को स्पर्श करने से ही मना कर दिया | वह अधर में ही लटके रहा | 

पवनदेव ने ही वह छोटा सा संकट दूर  किया | 

उन औषधियों को, जिन्हें हनुमान जी पहचान न सके, खोजने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी | वायु के संचरित होने से ज्यों ज्यों उन औषधियों की सुगंध सब योद्धाओं के नथुनों में घुसी , वे एक एक करके उठने लगे , मानो गहरी नींद से जाग रहे हों | लक्ष्मण सुग्रीव और सारे वानरवीर - सब स्वस्थ हो गए | 

किन्तु वहां वानर सेना ही मृत संजीवनी से लाभान्वित हुई | राक्षस सेना के मृत शरीर  तो रावण की आज्ञा से समुद्र में बहा दिए जाते थे | 

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और देखें  -

मारुति का पर्वत उत्तोलन

वाल्मीकि रामायण 

राम चरित मानस (तुलसीदास)

कृत्तिवास रामायण